लुधियाना के गुरुदेव नगर में 80 साल की मां रात के 2 बजे उठती है। घुटने का दर्द असहनीय है। बाम की शीशी कहीं ऊंची अलमारी पर रखी है। बेटा-बहू टोरंटो में हैं। पोती व्हाट्सएप पर ‘लव यू दादी’ भेजती है, पर उस रात अंधेरे कमरे में उस बुजुर्ग मां की दर्द से कराहती सांसें हैं। कई करोड़ों भारतीय घरों की रात की यह स्याह सच्चाई किसी एक परिवार की लापरवाही नहीं है। यह एक पूरी व्यवस्था की विफलता है, जो बच्चों को कोडिंग और आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस (ए.आई.) तो सिखाती है, पर  बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी कहीं पीछे छूट गई। जो देश-समाज अपने बुजुर्गों की देखभाल नहीं कर सकता, वह विकसित नहीं, सिर्फ आंकड़ों में अमीर है।

भारत में 60 साल से ऊपर के 17.3 करोड़ से अधिक नागरिक हैं। वर्ष 2050 तक ये 34.7 करोड़ को पार कर जाएंगे, यानी हर 3 भारतीयों में से 1 बुजुर्ग होगा। हैल्पेज इंडिया की 2023 की रिपोर्ट की मानें तो देश के 65 प्रतिशत बुजुर्ग शूगर, हाई ब्लड प्रैशर, हृदय रोग, गठिया आदि रोगों से पीड़ित हैं। लॉन्गिच्यूडिनल एजिंग स्टडी ऑफ इंडिया के अनुसार, 27 प्रतिशत से अधिक वृद्धों को चलने, नहाने से लेकर दवाई लेने में नियमित रूप से किसी और की मदद की जरूरत पड़ती है। 17 करोड़ से अधिक बुजुर्गों के लिए 140 करोड़ आबादी वाले देश में 30,000 से भी कम प्रशिक्षित एवं प्रमाणित केयरगिवर यानी देखभालकत्र्ता हैं।  संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की इंडिया एजिंग रिपोर्ट के मुताबिक, 40 प्रतिशत से ज्यादा बुजुर्ग बिना किसी वयस्क संतान के सहारे जी रहे हैं। इनमें से अधिकांश वे हैं, जिनके बच्चे बिजनैस या नौकरी के फेर में महानगरों या विदेश में हैं। परिवार टूटा नहीं है, बस बिखर गया है। रिश्ते हैं, पर साथ नहीं, सहारे के लिए हाथ नहीं।

देश की संसद ने 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण कानून पारित किया। 2019 में इसमें संशोधन भी हुआ। कानून स्पष्ट है, संतान या उत्तराधिकारी अपने बुजुर्ग माता-पिता को भरण-पोषण देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो 3 महीने की जेल या 10 हजार रुपए का जुर्माना हो सकता है। 2019 के संशोधन में यह भी जोड़ा गया कि बच्चे बुजुर्गों को उनके घर से नहीं निकाल सकते। कानून के मुताबिक हर जिले में मेंटेनैंस ट्रिब्यूनल का प्रावधान है और हर राज्य में वैल्फेयर ऑफिसर हो। जमीनी हकीकत यह है कि  देश के अधिकांश जिलों में ट्रिब्यूनल बने ही नहीं, जहां बने हैं तो काम नहीं करते। वैल्फेयर ऑफिसर की नियुक्ति अधिकांश राज्यों में कागजों में हैं। हैल्पेज इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि 23 प्रतिशत बुजुर्ग अपने ही बच्चों द्वारा शारीरिक, मानसिक या आर्थिक दुव्र्यवहार के शिकार हैं, पर उनमें से 90 प्रतिशत से अधिक मामले कभी किसी थाने तक नहीं पहुंचते।

जब बेटा दुबई में हो और बेटी सिएटल में, तो कौन-सा ट्रिब्यूनल उन्हें वापस बुलाएगा? कौन-सा जुर्माना उस मां की रात की तन्हाई भरेगा? कानून भी वहां कारगर नहीं होता, जहां बच्चों में ही अपने बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी की भावना न हो। जब देखभाल के लिए घर में कोई नहीं होता, तो मजबूर बुजुर्ग वृद्धाश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं। एक दशक पहले जहां देश में 728 रजिस्टर्ड वृद्धाश्रम थे, आज यह संख्या 1,800 से अधिक हो चुकी है। इनमें से बड़ी संख्या रजिस्टर्ड नहीं  है, यानी किसी सरकारी निगरानी से परे, बगैर जवाबदेही के वृद्धाश्रम धड़ल्ले से चल रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट में कई वृद्धाश्रमों की स्थिति ‘अमानवीय’ बताई गई। अपर्याप्त भोजन, अप्रशिक्षित स्टाफ, गंदे शौचालय और भीषण गर्मी में पंखे तक नहीं तो कड़ाके की ठंड में ओढऩे को कंबल नहीं। सबसे क्रूर सच्चाई हैल्पेज इंडिया के एक सर्वेक्षण में सामने आई है कि ‘34 प्रतिशत वृद्धाश्रम निवासियों ने कहा कि वे अपने घर वापस लौटना चाहते हैं, पर उन्हें बुलाने वाला कोई नहीं’। घर छूटना सिर्फ पता बदलना नहीं, यह एक असहाय बुजुर्ग का भीतर से टूटना है।

इस पूरे संकट का समाधान हमारे बीच है, पर न उसकी सही पहचान है और न ही सम्मान। भारत के केयरगिवर एवं वैलनैस सैक्टर में 66 प्रतिशत महिलाएं काम करती हैं, जो देश का सबसे अधिक महिला केंद्रित रोजगार क्षेत्र है, पर के.पी.एम.जी. की स्किल गैप स्टडी ने साफ चेतावनी दी है कि इस विशाल सैक्टर में अधिकांश कर्मचारी अप्रशिक्षित और अनसॢटफाइड हैं। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पी.एम.के.वी.वाई.) के तहत वैलनैस सैक्टर स्किल काऊंसिल ने एक दशक में केवल 4.89 लाख लोगों को प्रशिक्षित कराया, जबकि 2030 तक 3 करोड़ प्रशिक्षित कर्मियों की जरूरत होगी। छोटे शहरों व कस्बों में यह खाई और भी गहरी है। कई कस्बों में सरकारी फिजियोथैरेपी सैंटरों में मशीनें हैं, मरीज हैं, पर थैरेपिस्ट नहीं। वैलनैस सैंटर खुला, पर कुछ ही महीनों में बंद हो गया क्योंकि प्रशिक्षित स्टाफ नहीं मिला। एक सर्टिफाइड केयरगिवर या फिजियोथैरेपी असिस्टैंट उन बुजुर्ग की आवाज और सहारा बन सकते हैं, जिनकी सुनने वाला उनका कोई अपना साथ नहीं होता। यह संकट सिर्फ जिम्मेदार देखभाल का नहीं, पहचान और सम्मान का भी है।

जिस देश में 3-4 साल की पढ़ाई से सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन सकते हैं, वहां मात्र 6 महीने में बुजुर्ग की संभाल के लिए प्रमाणित, हुनरमंद एवं भरोसेमंद देखभालकत्र्ता क्यों नहीं तैयार किए जा सकते? इसके लिए कोई उच्च तकनीक नहीं, सिर्फ सही नीति और नीयत चाहिए। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण कानून के तहत मेंटेनैंस ट्रिब्यूनल सक्रिय किया जाए। वृद्धाश्रमों के लिए अनिवार्य पंजीकरण व मानवाधिकार ऑडिट हो। प्रशिक्षित केयरगिवर को सामाजिक सम्मान और न्यूनतम वेतनमान की गारंटी मिले।-दिनेश सूद

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