तिरुवनंतपुरम: केरल सरकार ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बी. अशोक को निलंबित कर दिया है। सरकार के इस फैसले से बड़ा विवाद खड़ा होने की संभावना जताई जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित होने वाले हैं। सैनिक कल्याण विभाग में प्रधान सचिव के पद पर कार्यरत बी अशोक पर मीडिया से बातचीत करने और सरकारी नीतियों की आलोचना करने का आरोप है। इन्हीं आरोपों के आधार पर सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की है।

हालांकि, यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब केरल में आदर्श आचार संहिता लागू है और चुनाव परिणाम आने वाले हैं। इसे लेकर विपक्षी हलकों और प्रशासनिक वर्ग में सवाल उठने लगे हैं। निलंबन के तुरंत बाद बी अशोक ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके खिलाफ नियमों की अनदेखी कर कार्रवाई की गई है।

सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का आरोप

केरल सरकार का कहना है कि बी अशोक की सार्वजनिक टिप्पणियां, जिनमें उन्होंने नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की आलोचना की थी, सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन हैं। हाल के दिनों में अशोक ने मीडिया से बातचीत में शासन व्यवस्था की कमियों को उजागर किया था, जिससे सरकार असहज स्थिति में आ गई थी।

ट्रांसफर को लेकर हुआ था विवाद

बी अशोक और राज्य सरकार के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। केरल राज्य बिजली बोर्ड के अध्यक्ष और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने कई बार ऐसे फैसले लिए, जो सरकार की आधिकारिक लाइन से अलग माने गए। इससे पहले कृषि विभाग से उनका तबादला भी राजनीतिक गलियारों में दंडात्मक कार्रवाई के रूप में देखा गया था। अशोक ने उस ट्रांसफर को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) में चुनौती दी थी और उनके पक्ष में फैसला आया था।

सस्पेंडेड आईएएस एन प्रशांत का मिला समर्थन

एक अन्य मामले में भी सीएटी ने उनकी याचिका पर फैसला देते हुए कहा था कि राज्य के कैडर पदों पर केवल आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति हो सकती है। इस मुद्दे पर पहले से निलंबित आईएएस अधिकारी एन प्रशांत ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अगर सच्चाई सामने रखी जाए तो यही अंजाम होता है। हमने पहले भी ऐसा देखा है। सिविल सेवा अधिकारियों को बोलने का अधिकार है, ताकि जनता को सरकार के भीतर की स्थिति पता चल सके।

इस ताजा कार्रवाई के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में बहस तेज हो गई है। कई लोग इसे प्रतिशोधात्मक कदम बता रहे हैं। चुनाव नतीजों से पहले हुए इस घटनाक्रम ने राज्य में तनाव का नया माहौल पैदा कर दिया है और नौकरशाही की स्वायत्तता तथा सिविल सेवा में असहमति की सीमाओं पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

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