क्या महिला आरक्षण बिल यानी अब नारी वंदन अधिनियम-2023 राजनीति का शिकार हो गया है या फिर सभी की अनिच्छा के चलते महज औपचारिक हो-हल्ले के बीच खानापूर्ति कर ली गई। यदि कहें कि इस पर किसी भी दल ने गंभीरता नहीं बरती तो गलत नहीं होगा। भले पक्ष-विपक्ष दोनों में ही इस पर तकरार करें लेकिन नीयत किसी की समझ नहीं आती। हालांकि इतना समझ आता है कि अभी इसके कार्यान्वयन में देरी का कारण मुख्यत: राजनीतिक लाभ और परिसीमन है। सत्तारूढ़ दल एक तीर से दो शिकार करना चाहता था तो विपक्ष इसके पीछे छिपी नीयत को उजागर करना। हां, पक्ष-विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी राजनीति जरूर कर रहे हैं, पर शिकार नारी वंदन अधिनियम बिल हुआ। 

जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उससे लगता है कि 33 प्रतिशत का महिला आरक्षण अब जनगणना और परिसीमन की आड़ में 2029 तक टल गया है। वजह जो भी हो, जनता और विशेषकर देश की आधी आबादी को सब समझ आ रहा है क्योंकि बीते 30 वर्षों में 7 बार ऐसा हो चुका है। इस पर अब तक हुई राजनीति को भी समझना होगा। महिला आरक्षण पर संसद में पहली बार 1990 के दशक में ङ्क्षचता की गई। 1996 में पहली बार एच.डी. देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार में नाकाम कोशिशें हुईं और 12 सितम्बर, 1996 को 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश हुआ। तब भी भारी हंगामे के बीच गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया लेकिन लोकसभा भंग होने से विधेयक लैप्स हो गया।

1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में दूसरी बार तत्कालीन कानून मंत्री एम. थंबीदुरई ने पेश किया। तब के विपक्षी दल राजद और सपा ने ‘कोटा के भीतर कोटा’ की मांग को लेकर भारी विरोध किया और 12वीं लोकसभा भंग होने से यह दूसरी बार गिर गया। तीसरी कोशिश 1999 में वाजपेयी की एन.डी.ए. सरकार ने एक बार फिर पेश किया। लेकिन संसद में धक्का-मुक्की और बिल की प्रतियां फाडऩे जैसी अप्रिय घटनाओं के चलते आम सहमति के अभाव में सफलता नहीं मिली। वर्ष 2002-2003 में यू.पी.ए.-1 की सरकार के कार्यकाल में चौथी कोशिश हुई लेकिन अकारण राजनीतिक गतिरोधों के चलते सदन के पटल पर पहुंचने के बाद भी सफलता नहीं मिली। 

पांचवीं बार एक बार फिर मनमोहन सिंह की यू.पी.ए.-2 के दौरान 2010 में बिल को किसी तरह राज्यसभा में पहली बार सफलता मिली। लेकिन काफी हो-हल्ला और हंगामा हुआ। नौबत मार्शल बुलाने तक की आई। इससे डरी सरकार लोकसभा में इसे लाने का साहस नहीं कर पाई क्योंकि तब सहयोगी दलों ने समर्थन वापसी की धमकी दे दी थी और 2014 में लोकसभा भंग होने के चलते बिल फिर लैप्स हो गया। छठवीं कोशिश 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान फिर हुई और लगा कि इस बार सफलता तय है। 20 सितम्बर, 2023 को नए संसद भवन के पहले सत्र में मोदी सरकार ने इसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से पेश किया। दोनों सदनों में पारित होकर कानून भी बना। लेकिन इसमें एक शर्त जोड़ दी गई कि यह परिसीमन और जनगणना के बाद ही लागू होगा इसलिए लटक गया। सातवीं बार 17 अप्रैल, 2026 को फिर इस पर असफलता हाथ लगी। लोकसभा में इस कानून को तत्काल प्रभावी बनाने और परिसीमन से जुड़े संशोधनों पर मतदान हुआ। जरूरी बहुमत से सरकार 54 वोट पीछे रह गई और बिल का वही हश्र हुआ जो छ: बार हो चुका था।

इस सच्चाई को भी समझना होगा कि अभी लोकसभा में महिलाओं की संख्या करीब 14 प्रतिशत और राज्यसभा में लगभग 17 प्रतिशत है, जबकि राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी औसत महज 10 प्रतिशत के आसपास ही है। आधिकारिक तौर पर भारत की संसद में वर्तमान में महिलाओं के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं है। निश्चित रूप से इसे विडंबना कहें या साजिश या फिर कुछ और लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। हां, यह पहला मौका भी नहीं था और जिस तरह की राजनीति समझ आ रही है शायद आखिरी भी न हो, जब यह बिल लोकतंत्र के मंदिर में सम्मान पूर्वक पारित हो सके। 

दरअसल, ‘महिला आरक्षण विधेयक’ एक ऐसा अध्याय बन चुका है, जो बार-बार संसद की दहलीज तक तो पहुंचता है लेकिन किसी सकारात्मक निर्णय पर पहुंचने के पहले ही राजनीति का शिकार हो जाता है। क्या यह देश की आधी आबादी के प्रति दिखावा है या मंशा कुछ और ही है। बीते 7 बार का घटनाक्रम देखें तो इतना तो समझ आता है कि सरकार में भले ही कोई रहे, महिलाओं के हक को लेकर बात करने वालों के हाथी के दांत खाने के कुछ और, दिखाने के कुछ और समझ आते हैं। कितना अच्छा होता कि बिना किसी विवाद के पूरी पारदॢशता से नारी वंदन की सोच कानून बन पाती और आधी आबादी की खातिर कम से कम 33 प्रतिशत सीटें सुरक्षित हो जातीं। लेकिन सच्चाई यही है कि यह बिल फुटबाल होकर रह गया है और कभी इस गोल में तो कभी उस गोल में फैंका जा रहा है। बस इंतजार है कि फैसला हो ही जाए और नारी का सचमुच वंदन हो जाए।-ऋतुपर्ण दवे

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