पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की है। वहीं तृणमूल कांग्रेस को 80 सीटें मिली है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के एक दिन बाद मंगलवार को ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान उन्होंने बीजेपी और चुनाव आयोग पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र की हार है।

साथ ही सीएम पद से इस्तीफा देने के सवाल पर भी ममता बनर्जी ने प्रतिक्रिया दी। ममता बनर्जी ने कहा कि मैं मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दूंगी, क्योंकि जब मैं हारी नहीं तो इस्तीफे का सवाल ही नहीं। मुझसे जबरदस्ती कोई इस्तीफा नहीं ले सकता। नैतिकता के तौर पर मैं कह रही हूं कि मैं जीती हूं, इसलिए लोकभवन जाकर इस्तीफा नहीं दूंगी।

क्या कह रहे विशेषज्ञ

वहीं ममता बनर्जी के सीएम पद से इस्तीफा नहीं देने की बात पर विशेषज्ञों की भी राय सामने आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुद्दे में न तो कोई संवैधानिक अनिश्चितता है और न ही कोई कानूनी जटिलता।

उन्होंने कहा कि संविधान और संबंधित प्रावधानों में इस तरह की स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, लेकिन चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जब सरकार अल्पमत में आ जाती है, तो उसकी संवैधानिक वैधता सीमित मानी जाती है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि चुनाव के बाद निवर्तमान कैबिनेट की शक्तियां समाप्त हो जाती हैं और मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का प्रश्न संवैधानिक रूप से प्रभावी नहीं रहता।

संविधान के अनुच्छेद 163 का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल को विवेकाधिकार प्राप्त होता है, जिनमें ऐसी स्थितियां भी शामिल हो सकती हैं जो संविधान में स्पष्ट रूप से परिकल्पित नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी नेता को परिणामों से असहमति है, तो उन्हें कानूनी विकल्पों का सहारा लेना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सत्ता में बने रहना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा है कि संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री (CM) डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर के तहत काम करता है, यानी वह तभी तक पद पर रह सकता है जब तक उसकी सरकार के पास विधानसभा में बहुमत हो।

उन्होंने बताया कि पहले भी ऐसे मामले हुए हैं जब किसी मुख्यमंत्री ने बहुमत खो दिया, लेकिन उसने इस्तीफा देने से इनकार किया। तब राज्यपाल ने नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने के लिए किसी दूसरे नेता को बुलाया था।

उन्होंने कहा कि अगर ऐसी स्थिति बनती है, तो राज्यपाल के पास यह अधिकार होता है कि वह सबसे बड़ी पार्टी या बहुमत वाले गठबंधन के नेता को नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें।

विकास सिंह ने यह भी कहा कि अगर ममता बनर्जी इस्तीफा देने से इनकार करती हैं, तो उन्हें संवैधानिक रूप से नई सरकार बनने से रोकने का अधिकार नहीं होगा। यह अधिकतर एक राजनीतिक बयान या जनता की सहानुभूति पाने की कोशिश जैसा माना जाएगा, न कि कोई कानूनी कदम।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर सामान्य परिस्थितियों में लागू नहीं होता, जब तक मुख्यमंत्री के पास बहुमत होता है। लेकिन अगर सरकार बहुमत खो देती है, तो राज्यपाल स्थिति के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं और नए नेता को शपथ दिलाकर सरकार बनवा सकते हैं। 

राज्यपाल के पास क्या है अधिकार

किसी भी राज्य में राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होते हैं और सरकार से जुड़े बड़े फैसलों में उनकी अहम भूमिका होती है। अगर मुख्यमंत्री का बहुमत कमजोर हो जाए या स्थिति बदल जाए, तो राज्यपाल ये कदम उठा सकते हैं—

1. इस्तीफा और फ्लोर टेस्ट कराना

राज्यपाल मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग सकते हैं। अगर मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देते, तो विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराया जाता है। इससे साफ हो जाता है कि किसके पास बहुमत है।

2. नई सरकार बनाने का मौका देना

अगर किसी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत (जैसे 207 सीटें) है, तो राज्यपाल उस पार्टी के नेता को सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं। साथ ही, मौजूदा सरकार को भी बहुमत साबित करने का मौका दिया जा सकता है।

3. मंत्रिपरिषद को हटाना

अगर सरकार बहुमत खो देती है और हालात बिगड़ते हैं, तो राज्यपाल मंत्रिपरिषद को बर्खास्त भी कर सकते हैं। यह कदम बहुत कम लिया जाता है, लेकिन संविधान में इसका प्रावधान है।

4. राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना

अगर कोई भी सरकार स्थिर नहीं बन पाती, तो राज्यपाल केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजकर राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लगाने की सिफारिश कर सकते हैं। हालांकि, अगर किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत हो तो इसकी जरूरत आमतौर पर नहीं पड़ती।

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