लेफ्टिनेंट जनरल देवेंद्र प्रताप पांडे (सेवानिवृत्त)

बदलते राजनैतिक-सैन्य लक्ष्यों के बीच युद्ध लड़ने के अमेरिका, इजराइल और रूस के प्रयोगों ने यह दर्शाया है कि 21वीं सदी के युद्ध और संघर्ष अक्सर लंबे एवं अस्पष्ट अभियानों में बदल रह गए हैं। इनके नतीजे संबंधित क्षेत्र के लिए विनाशकारी बन गए हैं और अखिरकार पहल करने वाले को ही इनका फायदा नहीं मिल पाया है। तालिबान, इराक, यूक्रेन, गाजा और अब ईरान का संघर्ष यह बतलाता है कि सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य अनिश्चित काल तक दबाव बनाए रखना नहीं होता है। इसका उद्देश्य निर्णायक रणनीतिक नतीजे हासिल करना और फिर ज्यादा ताकतवर सैन्य शक्ति द्वारा तय की गई अनुकूल शर्तों पर पीछे हट जाना होता है।
ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत द्वारा व्यक्त की गई प्रतिक्रिया ने दुनिया की सैन्य शक्तियों, खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने अपनाए जाने लायक एक ठोस विकल्प पेश किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने अनगिनत बार युद्धविराम का झूठा श्रेय लिया है। लेकिन वही राष्ट्रपति ईरान को सैन्य एवं आर्थिक रूप से तबाह कर देने के बावजूद युद्धविराम का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए हैं। ऑपरेशन सिंदूर सुनियोजित बल प्रयोग का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया और उन उद्देश्यों को हासिल कर लेने के बाद अनुशासित संयम भी बरता गया।
ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के स्थापित सुरक्षा प्रतिष्ठान द्वारा की गई उकसावे की एक क्रूर हरकत के बाद शुरू किया गया था। इस हरकत के तहत दिए गए निर्देशों अनुसार काम करने वाले आतंकवादियों ने धर्म के आधार पर केवल पुरुषों की उनके परिवार के सदस्यों, पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के सामने बेरहमी से हत्याएं कीं। इस घटना के बाद न तो भावावेश में आकर तनाव बढ़ाया गया और न ही अंधाधुंध प्रतिशोध लिया गया। बल्कि एक सुनियोजित तरीके से जवाब दिया गया। हर कदम सोच-समझकर, लेकिन तेजी से उठाया गया। ये कदम दंडात्मक और विध्वंसात्मक, दोनों ही थे। इन कदमों को अलग-अलग ठिकानों को तबाह करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। यह क्षमता और इरादे, दोनों का संकेत था। फिर भी, तनाव घटाने के लिए भी एक अलग से गुंजाइश रखी गई थी। यह किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि नियंत्रण का सबूत था। यह भावना नहीं, बल्कि वह निष्ठुरता थी जो न्यायसंगत युद्ध के अधिकार (जस एड बेलम) और क्षमताओं में विश्वास एवं भरोसे की वजह से आती है।
भारत की रणनीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता राजनैतिक-सैन्य उद्देश्यों को लेकर स्पष्टता थी। इसका लक्ष्य सीमा-पार आतंकवाद के लिए जिम्मेदार बुनियादी ढांचे एवं तत्वों पर तत्काल और ठोस प्रहार करना तथा प्रतिरोध को फिर से स्थापित करना था। यह सब परमाणु सुरक्षा कवच और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में रहते हुए किया गया। अहम परिसंपत्तियों को तेजी से नष्ट करके और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को मनोवैज्ञानिक आघात पहुंचाकर इन लक्ष्यों को हासिल करने के बाद, भारत ने संघर्ष को रोक दिया।
कुल 88 घंटों के भीतर, भारतीय सशस्त्र बलों ने इस मिशन के उद्देश्यों को पूरा करके राजनीतिक प्रतिष्ठान को सौंप दिया। राजनीतिक प्रतिष्ठान ने सशस्त्र बलों को साफ और सुस्पष्ट निर्देश दिए थे। पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान ने युद्धविराम की गुहार लगाई। उन्हें यह गलतफहमी थी कि वे कोई नतीजा भुगते बिना उकसावे की हरकत बेलगाम जारी रख सकते हैं। लेकिन उन्हें घुटने टेककर कदमों में गिरना पड़ा। उनके राजनेता लाइव मीडिया के सामने डरे हुए दिखाई दिए और सैन्य कमांडर छिप गए।
यह बेहद नाजुक क्षण था। इसने एक संरचनात्मक हकीकत को उजागर किया। भले ही पाकिस्तान की रणनीति लंबे समय से “हजारों घावों से लथपथ करके भारत को धीरे-धीरे कमजोर करने” की नीति पर केन्द्रित रही है, लेकिन उसमें सीधे उसकी सत्ता के मूल केन्द्रों को निशाना बनाने वाले संक्षिप्त, तेज और उच्च तीव्रता वाले हमलों का सामना करने की क्षमता नहीं है। भारत के प्रति उसकी निरंतर शत्रुता केवल वैचारिक ही नहीं, बल्कि संस्थागत भी है। पाकिस्तान की सेना का राज्य पर प्रभुत्व संघर्ष की इसी रणनीति पर टिका हुआ है।
भारत का रणनीतिक समुदाय यह अच्छी तरह समझता है कि पाकिस्तान से उसकी रणनीतिक दिशा में मौलिक बदलाव की अपेक्षा करना अव्यावहारिक है, क्योंकि शत्रुता आकस्मिक नहीं बल्कि अस्तित्वगत है। इसलिए भारतीय प्रतिक्रिया ने पाकिस्तान के मसले को “हल” करने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि तत्काल दंड लगाकर और अंतहीन तनाव के चक्र में फंसे बिना प्रतिरोध को बहाल किया। यह अंतर महत्वपूर्ण है। चूंकि पाकिस्तान की सेना का राज्य पर प्रभुत्व अस्तित्वगत खतरे और धार्मिक पहचान पर आधारित संघर्ष के प्रतिमान के जरिए कायम है, इसलिए रणनीतिक परिपक्वता वैचारिक आधारों को बदलने में नहीं बल्कि विश्वसनीय, सीमित और दोहराए जाने योग्य कार्रवाइयों के जरिए उसके व्यवहार को आकार देने में थी। वैचारिक आधारों को बदलना अक्सर एक असंभव कार्य होता है।
अमेरिकी योजनाकारों के लिए, यह कदम हालिया सैन्य अभियानों से बिल्कुल अलग स्थिति पेश करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने बार-बार अपनी जबरदस्त सैन्य श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया है, लेकिन सामरिक प्रभुत्व को स्पष्ट रणनीतिक नतीजों में बदलने के लिए उसे काफी जूझना पड़ा है। यदि अभियानों को नियंत्रित न किया जाए, तो उनका दायरा हमेशा बढ़ता जाता है और उद्देश्य अस्पष्ट हो जाते हैं। यही नहीं, वे अपने शुरुआती लक्ष्यों से कहीं दूर आगे जाकर फैल जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप रणनीतिक थकान, संसाधनों की बर्बादी और कुछ मामलों में विश्वसनीयता में कमी आती है। ईरान के साथ चल रहे मौजूदा युद्ध में भी संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ ठीक यही हुआ है। इसमें कोई नई बात नहीं है। बल्कि यह इराक, अफगानिस्तान और अन्य युद्धों या संघर्षों की पुनरावृत्ति है जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका को उलझना पड़ा।
जरा ईरान के साथ चल रहे युद्ध में ऑपरेशन सिंदूर के नमूने के काल्पनिक इस्तेमाल पर विचार करें। आण्विक बुनियादी ढांचे, मिसाइल क्षमताओं और शासन के प्रमुख नेतृत्वकारी केन्द्रों को निशाना बनाने का लक्षित अभियान कुछ ही हफ्तों में पूरा हो चुका था और यही इसकी रणनीतिक सफलता भी थी। स्पष्ट रूप से सूचित और प्रभावी ढंग से अंजाम दिए गए निर्णायक हमले ने युद्ध को आगे बढ़ाने की ईरान की क्षमता को पहले ही कुंद कर दिया था। इसके बाद, इस मिशन की सफलता की घोषणा और अनिश्चितकालीन सैन्य उपस्थिति के बजाय राजनयिक और आर्थिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने से राजनैतिक-सैन्य लक्ष्य हासिल हो जाते। यह विचार इस लेखक ने मार्च 2026 में भारतीय थिंक टैंक ‘क्लॉज’ में प्रकाशित अपने इश्यू ब्रीफ 496 में व्यक्त किया था।
ईरान भी शुरुआत से ही उबरने का कोई रास्ता तलाश रहा था, लेकिन अमेरिकी लक्ष्य बदलकर पूर्ण विनाश या अधीनता की दिशा में चला गया। इस विकल्प को आजमाया गया। संपूर्ण राजनीतिक परिदृश्य को बदलने के उद्देश्य वाले एक लंबे अभियान के परिणामस्वरूप द्वितीय और तृतीय स्तर के नतीजे सामने आए। आखिरकार यही नतीजे अब अमेरिकी हितों और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लंबे सैन्य अभियान असंतुलित जवाबी कार्रवाई को न्योता देते हैं, घरेलू समर्थन को कम करते हैं और ऐसे भू-राजनैतिक शून्य पैदा करते हैं जिन्हें संभालना मुश्किल होता है। ईरान ने इन सभी उपायों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। पराजित, बर्बाद एवं तबाह होने के बावजूद, वह सदृढ़ और विजयी बनकर उभरा है। इसके उलट, स्पष्ट उद्देश्यों पर आधारित एक संक्षिप्त एवं कारगर उपाय वांछित नतीजे हासिल करने के साथ-साथ रणनीतिक लचीलापन भी बनाए रख सकता था।
भारत का दृष्टिकोण युद्ध में तनाव को नियंत्रित रखने के महत्व को रेखांकित करता है, क्योंकि आधुनिक युद्ध केवल बल प्रयोग तक ही सीमित नहीं होते हैं। बल्कि इसमें शत्रु और अंतरराष्ट्रीय समुदाय, दोनों की धारणाओं को नियंत्रित करना भी शामिल होता है। अपनी प्रतिक्रिया को संतुलित रखकर, भारत ने कोई जल्दबाजी दिखाए बिना दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया। इससे यही संकेत मिला है कि भारत निर्णायक कार्रवाई करने को जितना तैयार है, उतना ही वह अनियंत्रित संघर्षों को रोकने के लिए भी प्रतिबद्ध है।
जहां कई विश्लेषक तनाव बढ़ाने की वकालत कर रहे थे, वहीं भारतीय नेतृत्व ने टकराव की मुद्रा में बने रहने के बजाय अपनी व्यापक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, विशेष रूप से दीर्घकालिक विकास को ध्यान में रखा। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, देश ने अपनी आजादी की सौवीं वर्षगांठ यानी 2047 के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पेश की है। आर्थिक विकास, तकनीकी उन्नति और वैश्विक एकीकरण इस मिशन के केन्द्र में हैं। ऑपरेशन सिंदूर पर विराम लगाने के बाद, देश ने पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान को यह चेतावनी देते हुए दीर्घकालिक लक्ष्यों की ओर कदम बढ़ाया है कि यदि उसने कोई और गलती करने की हिम्मत की, तो उसे करारा जवाब दिया जाएगा। युद्धविराम के प्रस्ताव एवं विराम को स्वीकार करके और इस प्रकार लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष से बचकर, भारत ने आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करने की उस क्षमता को बनाए रखा जो उसके दीर्घकालिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अनिवार्य है। इसके उलट, लंबे समय तक सैन्य संघर्षों में उलझे रहने वाले राष्ट्रों के घरेलू एजेंडे अक्सर हाशिए पर चले जाते हैं, उनके संसाधन दूसरी ओर मोड़ दिए जाते हैं और निरंतर युद्धरत रहने की छवि से उनकी वैश्विक हैसियत जटिल हो जाती है।
ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सैन्य प्रभावशीलता का एक उदाहरण भर नहीं है, बल्कि कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पाठ भी है। यह दर्शाता है कि सिर्फ एक निरर्थक एवं निरंकुश हथियार के बजाय नीति के एक सटीक साधन के रूप में बल का प्रयोग कैसे किया जा सकता है। यह साबित करता है कि संयम को जब क्षमता के साथ प्रयोग किया जाता है, तो यह विश्वसनीयता को कम करने के बजाय बढ़ाता है। और यह इस विचार को पुष्ट करता है कि किसी सैन्य अभियान को सही समय पर समाप्त करना उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना कि उसकी शुरुआत करना।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है। जटिल और अक्सर अनसुलझे संघर्षों से भरी दुनिया में, सफलता संघर्ष की अवधि से नहीं बल्कि उद्देश्यों और नतीजों के बीच के सामंजस्य से निर्धारित होती है। भारत की संयमित लेकिन प्रभावी प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि निर्णायक प्रहार करना, प्रतिद्वंद्वी को अपने रुख में बदलाव के लिए मजबूर करना और फिर अपनी शर्तों पर पीछे हटना संभव है।
ऑपरेशन सिंदूर की पूरी संरचना न केवल एक अच्छी रणनीति थी, बल्कि चतुराई भरी शक्ति का सबसे अनुशासित रूप में इस्तेमाल भी थी।
लेखक- लेफ्टिनेंट जनरल देवेंद्र प्रताप पांडे, पीवीएसएम, यूवाईएसएम, एवीएसएम, वीएसएम (सेवानिवृत्त), चार दशकों से अधिक की सेवा अवधि के साथ कश्मीर में सात कार्यकाल के दौरान सेवारत, सियाचिन में तैनाती और चीन के खिलाफ कई अभियानों में भाग ले चुके हैं। उन्होंने श्रीनगर में चुनौतीपूर्ण 15-कोर की कमान संभाली और विश्व प्रसिद्ध आर्मी वॉर कॉलेज के कमांडेंट रहे। वाशिंगटन डीसी स्थित नेशनल वॉर कॉलेज सहित दो मास्टर डिग्री धारक, रक्षा और सामरिक रणनीति में एमफिल की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने “रिफ्लेक्शंस ऑन स्ट्रैटेजी” नामक पुस्तक, लगभग 50 शोध-पत्र और थिंक टैंक तथा अन्य मंचों पर लेख प्रकाशित किए हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित विषय पर 200 से अधिक पॉडकास्ट हो चुके हैं और कर्नल अजय रैना द्वारा लिखित पुस्तक “सोल्जरिंग विद पैशन” में भी उनका उल्लेख है। वे राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक के रूप में दिखाई देते हैं और विभिन्न मंचों पर रणनीति, भू-राजनीति एवं नेतृत्व पर व्याख्यान देते हैं। युवाओं के बीच लोकप्रिय, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके काफी फॉलोअर्स हैं।

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