कोलकाता : ममता बनर्जी भवानीपुर और बंगाल में चुनाव हारने के बाद भी सीएम पद से इस्तीफा देने के लिए राजी नहीं हैं। टीएमसी चीफ का आरोप है कि बीजेपी ने चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा बलों के जरिये चुनाव में धांधली की है। चुनाव परिणाम में तृणमूल कांग्रेस के आंकड़े कम हुए हैं, मगर उनकी नैतिक जीत बीजेपी की नहीं हुई है। बंगाल चुनाव में टीएमसी ने 8 फीसदी वोट और 135 विधानसभा सीटें गंवा दी। इस चुनाव में ममता बनर्जी के हाथ से सिंगूर भी निकल गया, जहां आंदोलन के बाद 15 साल पहले उन्होंने आंदोलन से सत्ता की बुनियाद रखी थी। राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ी शिकस्त के बाद उनकी चुनौतियां बढ़ गईं हैं।

टीएमसी कार्यकर्ताओं ने भी उड़ाए गेरूआ गुलाल

पश्चिम बंगाल के ट्रेंड में चुनाव हारने वाली पार्टी के सामने जनाधार के साथ जमीन पर कार्यकर्ताओं को खोने का खतरा बरकरार रहता है। 2011 में टीएमसी की जीत के बाद ऐसा ही हुआ। लेफ्ट समर्थक लाल झंडा थामने वाले गुट टीएमसी के पाले में चले गए। 4 मई को बीजेपी की जीत के बाद कई इलाकों में टीएमसी कार्यकर्ताओं ने रातों रात भगवा गुलाल उड़ाना शुरू कर दिया। अब सवाल यह है कि क्या ममता इतनी बड़ी हार के बाद अपनी पार्टी को बचा पाएंगी। 2026 के चुनाव में टीएमसी पर तोलाबाजी, कट मनी और करप्शन के आरोप लगे थे। ग्राउंड पर जनता के बीच टीएमसी शासन के दौरान करप्शन बड़ा मुद्दा रहा। स्कूल भर्ती घोटाला ने इस धारणा को और मज़बूत किया कि सत्ता में बैठी टीएमसी रोजगार के मौके छीन रही है। रही सही कसर आरजी कर रेप केस ने पूरी कर दी।

  • तोलाबाजी , कट मनी और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर टीएमसी सरकार फेल रही
  • अल्पसंख्यक तुष्टिकरण ने भी पार्टी का नुकसान किया, हिंदू एकजुट हो गए
  • बीजेपी ने पहले चरण की वोटिंग में 109 और दूसरे चरण में 98 सीटें जीतीं

काबा-मदीना के चक्कर में 8 जिलों में साफ हुई टीएमसी

टीएमसी ने रोजगार भत्ते देकर नौकरी के मुद्दे को ठंडा करने की कोशिश की, मगर बंगाल से पलायन के आंकड़े के सामने यह लॉलीपॉप ही साबित हुआ। चुनाव प्रचार के दौरान सयोनी घोष के काबा-मदीना वाला गाना और खुद ममता बनर्जी का मुसलमानों को लेकर दिए गए बयान ने ध्रुवीकरण को हवा दे दी। बहुसंख्यक हिंदू वोट एकजुट हुआ और बीजेपी दोनों चरणों में जीत गई। बीजेपी ने कुल 8 जिलों अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, कलिम्पोंग, दार्जिलिंग पुरुलिया, बांकुड़ा, पूर्वी बर्दवान और झाड़ग्राम में टीएमसी का सफाया कर दिया। कूच बिहार में तृणमूल कांग्रेस को केवल एक सीट मिली। बीजेपी ने पहले चरण में जिन 152 सीटों पर मतदान हुआ, उनमें से उसने 109 सीटें जीतीं। दूसरे चरण की घोषित 141 सीटों में से 98 सीटें अपने नाम कीं।

बीजेपी कर सकती है बंगाल में महाराष्ट्र वाला खेल

ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ा खतरा पार्टी के बिखरने का है। लेफ्ट के सत्ता से बाहर होने के बाद जो टीएमसी के पक्ष में आए थे, वह बीजेपी में जा सकते हैं। रसूख और दबंगई के साथ बूथ मैनेजमेंट करने वाल तबका भी टीएमसी के पाले से खिसक सकता है। उससे भी बड़ी चिंता विधानसभा और संसद में पार्टी की बचाने की होगी। महाराष्ट्र में बीजेपी ने शिवसेना और एनसीपी को तोड़कर राजनीति ही बदल दी। अब वहां ठाकरे और पवार ब्रांड कमजोर हो चुका है। दोनों पार्टियों के दूसरे नेता बड़े धड़े का नेतृत्व कर रहे हैं, जो बीजेपी के साथ है। बंगाल में टीएमसी के साथ ऐसा नहीं होगा, इसकी संभावना कम है। पिछले चुनाव के बाद बीजेपी विधायकों को तोड़कर खुद ममता बनर्जी ने इस परंपरा की शुरुआत की थी।

2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी गांव से शहर तक बंगाल के सभी पांच क्षेत्रों उत्तर बंगाल, दक्षिण बंगाल, चिकन नेक, जंगल महल और कोलकाता-हावड़ा के इलाके में पहुंच गई। बीजेपी का वोट शेयर 45.84 हो गया, जो टीएमसी से पांच प्रतिशत ज्यादा है। 80 सीटें हासिल करने वाली तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। वोट प्रतिशत का अंतर अगले चुनावों बाउंस बैक के हिसाब से ज्यादा नहीं है। बीजेपी सरकार अगर राजनीतिक चूक करती है तो टीएमसी फिर से दोबारा खड़ा हो सकती है।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट

विधानसभा में तेज तर्रार नेता प्रतिपक्ष कौन होगा

अभी तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व का ट्रांसफर का दौर चल रहा है। डायमंड हार्बर के सांसद और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी नंबर दो बन चुके हैं। अगर बंगाल में चौथी बार टीएमसी को सत्ता मिलती तो अभिषेक अगले पांच साल में नेता के तौर पर स्थापित हो जाते। मगर खेल बदल चुका है। 71 साल की ममता बनर्जी ने इस्तीफा नहीं देकर संघर्ष के तेवर बरकरार रखने के संकेत दिए हैं, मगर इसे पांच साल तक कायम रखना आसान नहीं है।

अभिषेक बनर्जी ने कभी राजनीतिक संघर्ष की राजनीति नहीं की। जब टीएमसी विधानसभा में विपक्ष की हैसियत में होगी, तब वहां न तो ममता बनर्जी होंगी और न ही अभिषेक बनर्जी। उन्हें ऐसे विधायकों की जरूरत होगी जो विधानसभा के भीतर बीजेपी को चुनौती दे सके। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर भी ममता बनर्जी को झटका लग सकता है। अब तक कांग्रेस पर भारी रही टीएमसी को राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ सकता है।

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