एआईयूडीएफ के मैदान में आ जाने के बाद असम में मुस्लिम लीग ने चुनाव में भाग लेना बंद कर दिया है ताकि मुसलमानों के वोट विभाजित न हो जाएं….

असम, पश्चिमी बंगाल, केरल, पुडुच्चेरी और तमिलनाडु की विधानसभाओं के लिए हुए चुनाव के नतीजे भारत की राजनीति को भीतर तक और दूर तक प्रभावित करने वाले हैं। सबसे पहले तमिलनाडु। तमिलनाडु में 1969 से लेकर 2026 तक द्रविड़ राजनीति का कब्जा रहा। उससे पहले 1947 से 1969 तक कांग्रेस का वर्चस्व था। द्रविड़ राजनीति की शुरुआत जस्टिस पार्टी के रामास्वामी पेरियार ने ब्रिटिश काल में की थी। इस राजनीति का आधार आर्य बनाम द्रविड़, जिसे उत्तर बनाम दक्षिणी कहा जाता है, था। इस सिद्धान्त के अनुसार आर्य यूरोप के थे जिन्होंने मध्य एशिया के रास्ते भारत पर सप्त सिन्धु क्षेत्र से हमला किया था और यहां के स्थानीय निवासियों को पराजित कर दक्षिण में धकेल दिया था। इस आधार पर पेरियार ने मद्रास प्रेसिडेंसी में आर्य बनाम द्रविड़ राजनीति का ताना-बाना बुना था। इस सिद्धान्त का प्रचार अंग्रेजों ने किया था, जिसे कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया था। डा. भीमराव रामजी अंबेडकर ने ब्रिटिश काल में ही इस सिद्धान्त का खंडन किया था और बाकायदा इसके लिए एक किताब लिखी थी। लेकिन तब कांग्रेस ने अंबेडकर को अंग्रेजों का पि_ू कहा था। पेरियार से अंबेडकर का इसी विषय को लेकर गहरा मतभेद था। लेकिन पेरियार ने अपनी इस भेदकारी राजनीति को आधार देने के लिए द्रविड़ कडग़म पार्टी का गठन किया। उसके आन्दोलन का मुख्य आधार था कि हिन्दी आर्यों की भाषा है, इसलिए तमिलनाडु में उसे नहीं घुसने दिया जा सकता। लेकिन जब उसने 1949 में 70 साल की आयु में 32 साल की अपनी ही सचिव से शादी कर ली तो जन सामान्य ने इसे उसके नैतिक पतन के तौर पर देखा।

इसके कारण उसके शिष्यों ने उससे अलग होकर पार्टी का नाम द्रविड़ मुनेत्र कडग़म यानी डीएमके कर दिया। 1967 में पार्टी ने हिन्दी के विरोध में आन्दोलन चलाया और 1969 के विधानसभा चुनावों में डीएमके की सरकार बनी। बाद में डीएमके के एक हिस्से ने अलग होकर अपना नाम अन्ना डीएमके यानी एडीएमके रख लिया। लेकिन दोनों की राजनीति का आधार आर्य/द्रविड़, हिन्दी विरोध, मंदिर विरोध ही रहा। इस प्रकार 1969 से लेकर 2026 तक डीएमके/एडीएमके का शासन ही रहा। अब पहली बार लगभग 57 साल के बाद तमिलनाडु द्रविड़ राजनीति के इस विभाजनकारी चक्रव्यूह से मुक्त हुआ है। यहां तक कि वहां के मुख्यमंत्री स्टालिन भी हार गए हैं। विजय की नई पार्टी टीवीके जीत गई है। यकीनन इसे तमिलनाडु के एक काले अध्याय का अन्त मानना चाहिए। पुडुच्चेरी 1947 से पहले फ्रांस के अधीन था। लेकिन मूलत: यह क्षेत्र तमिलनाडु का ही हिस्सा है और यहां की भाषा भी तमिल ही है। इसलिए यहां भी द्रविड़ राजनीति का प्रभाव है। यहां भी लम्बे अरसे तक डीएमके/अन्ना डीएमके का शासन रहा। लेकिन पिछले दशक से एन रंगास्वामी ने अपने ही नाम से एन रंगास्वामी कांग्रेस पार्टी का गठन कर भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राजनीति का संचालन किया। इन चुनावों में भी पुडुच्चेरी की तीस सदस्यीय विधानसभा में इन दोनों दलों के गठबंधन ने बहुमत हासिल किया। भारतीय जनता पार्टी के चार विधायक जीते। केरलम में लंबे अरसे से एलडीएफ और यूडीएफ गठबन्धनों का कब्जा है। यूडीएफ का नेतृत्व सोनिया कांग्रेस व मुस्लिम लीग करती हैं और एलडीएफ का नेतृत्व सीपीएम और सीपीआई करती हैं। भारतीय जनता पार्टी प्रदेश के कुछ छोटे दलों को साथ लेकर प्रदेश की राजनीति में तीसरा स्तम्भ स्थापित करने का प्रयास करती रही है। केरलम में पिछले दस साल से एलडीएफ की सरकार है। लेकिन इन चुनावों में सोनिया कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने 140 सदस्यीय विधानसभा में 85 सीटें जीत कर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। एलडीएफ में सीपीएम और सीपीआई केवल 34 सीटें जीत सके। भारत में कम्युनिस्टों का यह अंतिम गढ़ भी धराशायी हो गया। जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, उसे तीन सीटों पर विजय मिली। कुछ स्थानों पर उसके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे, लेकिन लगभग 90 स्थानों पर उसके प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे।

लेकिन भाजपा ने केरलम में 11.42 फीसदी मत हासिल कर राज्य में तीसरे मोर्चा का आगाज कर दिया है। अब अन्त में पश्चिमी बंगाल की चर्चा। बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी ने 207 और ममता बनर्जी की टीएमसी ने 80 सीटें जीतीं। लेकिन ममता बनर्जी खुद भाजपा प्रत्याशी सुवेन्दु अधिकारी से भवानीपुर में पराजित हो गईं। सीपीएम एक, सोनिया कांग्रेस दो सीटें जीत सकीं। ममता बनर्जी पिछले पन्द्रह साल से बंगाल में राज कर रही थीं। उससे पहले 34 साल बंगाल में कम्युनिस्टों का राज रहा था। इस प्रकार पिछले चालीस साल से बंगाल पर जिन दलों का राज रहा, उन्होंने पड़ोसी बंगलादेश से मुसलमानों को पश्चिमी बंगाल में घुसने को प्रोत्साहित ही नहीं किया, बल्कि उन्हें कानूनी दस्तावेज मुहैया करवाने में सहायता भी की। इसके चलते बंगाल में मुसलमानों की संख्या लगभग 33 फीसदी को भी पार कर गई थी। ममता बनर्जी का तो चुनावी मुद्दा ही यही था कि बंगलादेशी मुसलमानों को बंगाल से निकालने नहीं देंगे। चालीस साल बाद इस दुर्नीति का अंत हुआ। इतिहास में बिहार, बंगाल और ओडिशा को अंग, बंग और कलिंग कहा जाता है। सम्राट अशोक का साम्राज्य इस सम्पूर्ण क्षेत्र में था। पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने अंग, बंग और कलिंग पर सरकार बना कर इतिहास रच दिया है। भाजपा को बंगाल में लगभग 46 फीसदी मत मिले। एक दूसरा चौंकाने वाला तथ्य भी। पश्चिमी बंगाल विधानसभा में इस बार 38 मुस्लिम विधायक चुनाव जीते हैं। इनमें से दो सोनिया कांग्रेस के, एक सीपीएम का, दो हुमांयू कबीर की पार्टी के, एक एआईएसएफ का (ये चारों पार्टियां केवल 6 सीटें जीतीं और सभी मुसलमान प्रत्याशी हैं) और शेष 32 ममता बनर्जी की टीएमसी के हैं। टीएमसी कुल 80 सीटें जीत सकी और उनमें से 32 विधायक मुसलमान हैं। इसका स्पष्ट अभिप्राय यही है कि प्रदेश के मुसलमानों ने टीएमसी को अपनी पार्टी माना है। अन्त में असम। असम में भारतीय जनता पार्टी लगातार तीसरी बार जीती। 126 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के अपने प्रत्याशी 90 थे। उनमें से 82 प्रत्याशी विजयी रहे। पार्टी ने लगभग 38 फीसदी वोट हासिल किए। उसके दो सहयोगी दलों असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने दस-दस सीटें जीतीं। कांग्रेस ने केवल 19 सीटें जीतीं। असम में बदरूद्दीन अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को दो सीटें मिलीं। उसने 27 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। असम में यह माना जाता है कि यह बंगलादेश से आए अवैध घुसपैठियों की पार्टी है। एक बार असम विधानसभा में इस पार्टी के 18 प्रत्याशी चुनाव जीत गए थे।

तब यह चर्चा होने लगी थी कि यदि यदि त्रिशंकु विधानसभा आ जाती है तो असम में मुख्यमंत्री बनाने की कुंजी बांग्लादेशियों के पास आएगी। एआईयूडीएफ के मैदान में आ जाने के बाद असम में मुस्लिम लीग ने चुनाव में भाग लेना बंद कर दिया है ताकि मुसलमानों के वोट विभाजित न हो जाएं। हैदराबाद के ओवैसी देश भर में मुसलमानों को संगठित करने के लिए अपने प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारते हैं, लेकिन उन्होंने असम विधानसभा के लिए अपने प्रत्याशी इसलिए नहीं उतारे क्योंकि इससे मुस्लिम वोटों के विभाजित होने का खतरा था। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि 2026 के विधानसभा चुनावों में बांग्लादेशी मुसलमानों की मुख्य पार्टी बदरूद्दीन की यही एआईयूडीएफ पार्टी थी। लेकिन इसके बावजूद इस पार्टी के केवल दो प्रत्याशी ही विधायक बन सके। इसका क्या कारण हो सकता है? क्या मुसलमानों ने एआईयूडीएफ को नकार दिया? ऐसा नहीं है। असम में सोनिया कांग्रेस भी मुसलमानों की पक्षधर होने का दावा कर रही है। इस बार वहां मुसलमानों ने सोनिया कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया है। वह मुस्लिम लीग की पर्याय बन गई है।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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