जब भारत सरकार ने 2021 में सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम पेश किए, तो विशेषज्ञों ने विस्तारित कार्यकारी प्रभाव के बारे में चिंताएं जताईं, जो ऑनलाइन अभिव्यक्ति के संबंध में ‘संवैधानिक अतिरेक’ के समान था। तब से, संशोधनों, परामर्शों और कार्यकारी हस्तक्षेपों के माध्यम से इन नियमों में लगातार विकास हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी नियम द्वितीय संशोधन, 2026 का मसौदा एक और बड़ा महत्वपूर्ण मोड़ है, जो नागरिकों, प्लेटफार्मों और नियामकों के बीच संबंधों को नया रूप दे सकता है। मेइती (इलैक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) के अनुसार, प्रस्तावित संशोधन प्रकृति में स्पष्टीकरण और प्रक्रियात्मक हैं, जिनका उद्देश्य मध्यवर्ती अनुपालन को मजबूत, कानूनी निश्चितता में सुधार करना और ऑनलाइन सामग्री विनियमन से संबंधित निगरानी तंत्र को बढ़ाना है। हालांकि, बारीकी से पढऩे पर कार्यकारी निगरानी के दायरे और वैध ऑनलाइन अभिव्यक्ति तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी पर संशोधनों के संभावित प्रभाव के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठते हैं।

ऑनलाइन अभिव्यक्ति विनियमन के दायरे को व्यापक बनाना : सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक, नियमों का विस्तार प्रकाशकों से सामान्य उपयोगकत्र्ताओं तक करना है। संशोधित नियम 8(1) गैर-प्रकाशक उपयोगकत्र्ताओं द्वारा पोस्ट की गई ‘समाचार और समसामयिक विषयों की सामग्री’ को आई.टी. नियमों के भाग III के नियामक ढांचे के तहत लाने का प्रयास करता है। इसका मतलब यह है कि मूल रूप से डिजिटल प्रकाशकों और ओ.टी.टी. प्लेटफार्मों के लिए डिज़ाइन किया गया तंत्र अब संभावित रूप से उन व्यक्तिगत नागरिकों पर लागू हो सकता है, जो ऑनलाइन टिप्पणी, विश्लेषण या राय पोस्ट करते हैं, जो किसी व्यक्ति की भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने वाली सैंसरशिप का सबसे चरम रूप है।

कार्यकारी निगरानी तंत्र का विस्तार : संशोधनों का एक अन्य उल्लेखनीय पहलू अंतर-विभागीय समिति (आई.डी.सी.) की विस्तारित भूमिका है, जो एक कार्यकारी नेतृत्व वाली संस्था है, जो डिजिटल सामग्री की निगरानी करती है। संशोधित नियम 14(2) मंत्रालय को किसी पीड़ित पक्ष की शिकायत न होने पर भी सीधे आई.डी.सी. को मामले भेजने की शक्ति देगा। यह सामग्री निगरानी की संरचना में एक उल्लेखनीय बदलाव का प्रतिनिधित्व करेगा। पहले, ढांचा कम से कम नाममात्र के लिए शिकायतों और शिकायत तंत्र पर निर्भर था। नया प्रस्ताव कार्यकारी जांच के एक अधिक सक्रिय मॉडल की ओर बढ़ता हुआ प्रतीत होता है, जहां अधिकारी उपयोगकत्र्ता की शिकायत के बिना भी सामग्री की समीक्षा शुरू कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में स्वतंत्र या न्यायिक निगरानी की कमी गंभीर संवैधानिक चिंताएं पैदा करती है। प्रस्तावित संशोधन ऐसे समय में भी आए हैं, जब 2021 के आई.टी. नियमों के कई प्रावधान पहले से ही संवैधानिक अदालतों के समक्ष न्यायिक चुनौती के अधीन हैं। 

नियत सावधानी का विस्तार : संभवत: सबसे महत्वपूर्ण संशोधन नियम 3(4) को जोडऩा है, जो मध्यवर्ती ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा को सरकार द्वारा जारी परामर्शों, स्पष्टीकरणों, दिशा-निर्देशों, निर्देशों और मानक संचालन प्रक्रियाओं के अनुपालन से जोड़ता है। मंत्रालय द्वारा जारी विभिन्न कानूनी स्थिति वाले कार्यकारी निर्देशों के अनुपालन की आवश्यकता के कारण, यह संशोधन प्लेटफार्मों के लिए अति-अनुपालन करने का एक मजबूत प्रोत्साहन पैदा कर सकता है। परिणामस्वरूप, मध्यस्थ ‘सेफहार्बर’ खोने के जोखिम को कम करने के लिए संभावित रूप से विवादास्पद सामग्री, विशेष रूप से केंद्र में सत्तारूढ़ व्यवस्था की आलोचना करने वाली सामग्री के प्रति अधिक एहतियाती दृष्टिकोण अपना सकते हैं। कानूनी अनिश्चितता का सामना करने पर, प्लेटफार्मों द्वारा सामग्री को समय से पहले हटाने या भाषण को पूरी तरह से दबाने की अधिक संभावना है।

सूचना प्रौद्योगिकी नियम द्वितीय संशोधन, 2026 का मसौदा, तेजी से जटिल होते डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में प्लेटफॉर्म जवाबदेही, ऑनलाइन सुरक्षा और संवैधानिक स्वतंत्रता को संतुलित करने की बढ़ती वैश्विक चुनौती को दर्शाता है। यदि सार्थक सुरक्षा उपायों के बिना इसे लागू किया जाता है, तो यह एक अधिक प्रतिबंधात्मक डिजिटल स्थान को सामान्य बनाने का जोखिम उठाता है, जहां प्लेटफॉर्म सामग्री हटाने के पक्ष में गलती करते हैं और उपयोगकत्र्ता वैध अभिव्यक्ति का प्रयोग करने में अधिक सतर्क हो जाते हैं।-मनीष तिवारी

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