देश में कुल 11 प्रतिशत जनजातीय समाज है, जिसमें 98 प्रतिशत आतंकवाद, स्वदेश से अलग होने के विद्रोही ङ्क्षहसक आंदोलन, विदेशी धन और विदेशी विचारों का प्रकोप है, इसका भान बहुधा देशवासियों को नहीं होता। गृह मंत्रालय की प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन सूची में केवल उत्तर-पूर्वांचल के जनजातीय क्षेत्रों में सक्रिय ज्यादा संगठन हैं और शेष भारत में जनजातीय क्षेत्रों में व्याप्त विद्रोही देश विरोधी आतंकवादी संगठनों को जोड़ा जाए तो आधे से ज्यादा संगठन केवल और केवल 11 प्रतिशत जनजातीय क्षेत्रों में हैं। इनमें भोली-भाली, निश्छल, सहज विश्वासी एवं गरीबी की शिकार जनजातियों की संख्या अधिकतम है। इस कारण विदेशी षड्यंत्रों को इन क्षेत्रों में पांव पसारने में आसानी होती है। ईसाई धर्मान्तरण, कम्युनिस्ट माओवादी आतंकवाद का प्रसार, सरकार के विरुद्ध असंतोष को बढ़ावा, उनके धर्म और संस्कृति का रोमनीकरण, उनकी भाषा और भूषा का विलुप्त होना, यह सब संकट इस 11 प्रतिशत समाज में व्याप्त हो गए।

अब विश्व के सबसे बड़े गैर ईसाई जनजातीय संगठन वनवासी कल्याण आश्रम के नेतृत्व में 5 लाख जनजातीय समाज के लोग देश के कोने-कोने से दिल्ली के लाल किले पर आजादी के बाद के सबसे बड़े प्रदर्शन के लिए आए हैं, जिसको गृह मंत्री अमित शाह और हर जनजातीय क्षेत्र के नेता सम्बोधित करेंगे। उत्तर-पूर्वांचल के आठों प्रदेशों में म्यांमार, बंगलादेश, भूटान, थाईलैंड और पाकिस्तान की सीमा पर बसे  लाखों जनजातीय स्त्री-पुरुष दिल्ली की भीषण गर्मी में एक ही बात चाहते हैं-उनके धर्म, सांस्कृतिक परम्पराओं की रक्षा की जाए, जो लोग जनजातीय समाज छोड़ कर धर्मान्तरित हो जाते हैं, उनको दोगुना लाभ-अल्पसंख्यक और जनजातीय मिलना असंवैधानिक  है, उस पर रोक लगनी चाहिए।

श्रीमती इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में सदस्य, लोहरदगा क्षेत्र के विद्वान जनजातीय नेता श्री काॢतक उरांव ने सबसे पहले इस मांग को उठाया था कि जो व्यक्ति जनजातीय धर्म और परंपरा को छोड़ कर ईसाई या मुसलमान बन जाता है, उसको जनजातीय सूची से अलग कर देना चाहिए। डा. भीम रॉव आंबेडकर का भी यही मत था। उन्होंने 235 लोकसभा सांसदों के हस्ताक्षरों से युक्त एक ज्ञापन तथा अनुसूचित जनजाति संशोधन अधिनियम भी श्रीमती इंदिरा गांधी को सौंपा था, परन्तु वह ईसाई सांसदों के दबाव में आ गईं और इस पर कुछ नहीं किया।देश के हर सीमान्त क्षेत्र में बसे प्रत्येक गांव में, यानी जैसलमेर, जोधपुर से लेकर तवांग (अरुणाचल) और लद्दाख से लेकर अंडेमान तक, केवल जनजातीय समाज के लोग रहते हैं। वे सीमान्त के प्रथम प्रहरी होते हैं, शत्रु का सामना, सेना से पहले जनजातीय समाज के लोग करते हैं। कारगिल के समय पाकिस्तानी घुसपैठ की पहली सूचना वहां बसे जनजातीय समाज के चरवाहों  ने दी थी। यदि जनजातीय समाज विचलित होता है, उसमें विदेशी षड्यंत्रों को पनपने दिया जाता है, तो उससे पूरा देश प्रभावित होता है।

भारत के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह और खूनी अराजकता फैलाने वाले नक्सल-माओवादी कम्युनिस्ट आतंकवाद के अग्रगामी थे। उनका एक तरह से प्रांतों के जनजातीय क्षेत्रों में पिछले 40 वर्षों से आधिपत्य चल रहा था। हजारों करोड़ रुपए उनके प्रति सुरक्षा बल लगाने में खर्च किए गए। पाकिस्तान और चीन से विभिन्न युद्धों से अधिक सुरक्षा सैनिक इन माओवादियों द्वारा भारत के भीतर बलिदान किए गए। देश में पहली बार अमित शाह की खुली छूट के बाद इन माओवादियों का अंत किया गया और जनजातीय समाज को उनके शिकंजे से मुक्त किया गया।प्रधानमंत्री मोदी द्वारा झारखंड के देवता, ‘धरती के आबा’ बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस घोषित करना इस बात की प्रतिष्ठापना थी कि अंग्रेजों तथा उनके नेतृत्व में जनजातियों के धर्म और संस्कृति के विरुद्ध आक्रमणों का सामना करने वाले महावीर बिरसा के आदर्श इस सरकार  को प्रेरणा देते हैं। बिरसा का जीवन और बलिदान धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए था।

जनजातीय समाज का लाल किले पर प्रदर्शन वास्तव में राष्ट्रीय आत्मा का क्रंदन है। यह वह समाज है, जिसने लंका विजय के लिए भगवान राम का साथ दिया, शिवाजी और राणा प्रताप को विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध समर्थन दिया, नागालैंड, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, असम और त्रिपुरा के महान वीरों और खेल के शीर्ष विजेताओं ने भारत का मान बढ़ाया। ये लोग केवल 26 जनवरी की शोभा नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा और सभ्यता के प्रहरी प्रतीक हैं। इनकी बात को अनसुना करना पूरे भारत के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।-तरुण विजय 

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