How Summer Heat Affects Lung Health: देश का एक हिस्सा इस समय गर्मी से बेहाल है. कई जिलों में पारा 46- 47 डिग्री तक पहुंच गया है, लोग घर से निकलने से परहेज करने लगे हैं. ऐसे में बढ़ती गर्मी सिर्फ असहजता ही नहीं बढ़ा रही, बल्कि फेफड़ों की सेहत के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है. डॉक्टरों के मुताबिक अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज , एलर्जी और अन्य सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए तेज गर्मी और उमस गंभीर परेशानी पैदा कर सकती है.  बढ़ता तापमान, हवा में नमी, प्रदूषण, धूल, छोटे कण और स्मॉग मिलकर फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत बढ़ सकती है और रेस्पिरेटरी अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है. 

तापमान से कैसे पड़ता है फेफडों पर असर

पटना स्थित ऑरो सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल की विशेषज्ञ डॉ. अंजली सौरभ बताती हैं कि अत्यधिक गर्मी केवल शरीर का तापमान ही नहीं बढ़ाती, बल्कि यह सीधे फेफड़ों की काम करने की क्षमता, ऑक्सीजन लेवल और एयरवे इंफ्लेमेशन को भी प्रभावित करती है. शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा मेहनत करता है, जिससे हार्ट रेट और सांस लेने की गति बढ़ जाती है. स्वस्थ लोगों को यह केवल बेचैनी जैसा महसूस हो सकता है, लेकिन अस्थमा औरक्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के मरीजों में यह स्थिति सांस फूलने और थकान को गंभीर बना सकती है. 

क्यों बढ़ जाती है जलन?

डॉक्टरों के अनुसार उमस यानी ह्यूमिडिटी समस्या को और बढ़ा देती है. नमी वाली भारी हवा में सांस लेना मुश्किल महसूस होता है क्योंकि इससे पसीना जल्दी नहीं सूखता और शरीर को ठंडा होने में परेशानी होती है. यही नहीं, ज्यादा नमी प्रदूषण, धुएं और एलर्जी पैदा करने वाले कणों को जमीन के करीब रोककर रखती है, जिससे सांस की नलियों में जलन बढ़ सकती है.

एक्सपर्ट बताते हैं कि गर्मियों में खासतौर पर भीड़भाड़ वाले शहरों में ग्राउंड लेवल ओजोन और स्मॉग तेजी से बनता है. यह स्थिति खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न और अस्थमा अटैक का कारण बन सकती है. अस्थमा के मरीजों में गर्म और उमस भरा मौसम एयरवे को ज्यादा संवेदनशील बना देता है. वहीं क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज मरीजों में सांस फूलना, ज्यादा खांसी, थकान और बलगम बनने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

किन लोगों को होती है सबसे ज्यादा दिक्कत?

डॉक्टरों के मुताबिक बुजुर्ग, छोटे बच्चे, धूम्रपान करने वाले लोग, हार्ट डिजीज से पीड़ित मरीज, बाहर काम करने वाले कर्मचारी और प्रदूषित शहरों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं. जिन लोगों की लंग्स की क्षमता पहले से कमजोर होती है, उन्हें थोड़ी देर की गर्मी भी गंभीर परेशानी में डाल सकती है. एक्सपर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर तेज सांस फूलना, लगातार घरघराहट, सीने में जकड़न, बात करने में दिक्कत, होंठ नीले पड़ना, चक्कर आना या लगातार खांसी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. समय रहते इलाज मिलने से गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है. 

क्या कर सकते हैं बचाव

डॉक्टरों की सलाह है कि दोपहर 11 बजे से शाम 4 बजे तक घर के अंदर रहें, एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नजर रखें और ज्यादा प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलने से बचें. घर के अंदर की हवा को साफ और ठंडा रखने के लिए खिड़कियां बंद रखें, पर्दों का इस्तेमाल करें और धूम्रपान से दूरी बनाए रखें. एक्सपर्ट का कहना है कि छोटी-छोटी सावधानियां गर्मियों में फेफड़ों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.

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