अमरीका के विदेशमंत्री मार्को रूबियो ने अपनी चार दिवसीय भारत यात्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भेंट से शुरू की जिसके दौरान उन्होंने कहा कि,‘‘भारत-अमरीका की हिंद प्रशांत नीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है।’’ गत वर्ष से भारत में क्वाड सम्मिट न होने के बाद क्वाड के सदस्य जिसमें ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमरीका शामिल हैं, अब 23 से 26 मई तक मार्को रुबियो की भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री स्तर पर मिलेंगे परंतु चूंकि इस वर्ष के अंत में ऑस्ट्रेलिया में होने वाला क्वाड नेताओं का शिखर सम्मेलन अभी तय नहीं है, लिहाजा ऐसा लग रहा है कि क्वाड दम तोड़ रहा है।

असल में 2007 में चीन का मुकाबला करने के लिए बनाया गया क्वाड, ऑस्ट्रेलिया के ठंडे पड़ जाने के बाद ‘मरणासन्न’ हो गया था और फिर डोनाल्ड ट्रम्प ने 2017 में पहली बार अमरीका के राष्टï्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद इसे फिर से खड़ा करने के लिए तेजी से कदम उठाए। पिछले कुछ समय से क्वाड क्यों लडख़ड़ा रहा है? इसका एक कारण भारत-अमरीका के रिश्तों में आई गिरावट तथा क्वाड की संरचना में मौजूद कमजोरियां भी हैं। तेजी से बढ़ते चीन का मुकाबला करने के मकसद से बनाया गया क्वाड हमेशा इस लक्ष्य को लेकर चुप रहा। 
इसके संयुक्त बयानों में कभी भी चीन का नाम नहीं लिया गया। हालांकि नवम्बर, 2017 की शुरुआती मीटिंग तक क्वाड का ध्यान सिक्योरिटी पर ही  केंद्रित रहा और भारत ने कभी भी चीन के प्रति आक्रामक तेवर नहीं अपनाए। लगभग एक दशक की एक्टिविटी के बाद, क्वाड कुछ ही जरूरी ‘पब्लिक गुड्स डिलीवरेबल्स’ पर अपनी छाप छोड़ सका है। वादे और परफॉर्मैंस के बीच इस अंतर को हैल्थ सैक्टर का उदाहरण दिखाता है। 

महामारी के दौरान, क्वाड ने 2022 के अंत तक दुनिया भर में वैक्सीन की कम से कम 1.2 बिलियन खुराकें दान करने का वादा किया था। इसमें भारत की बड़ी उत्पादन क्षमता के साथ-साथ अन्य तीन सदस्य देशों से फाइनैंसिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट का फायदा उठाने के बावजूद केवल 800 मिलियन खुराकें ही डिलीवर की जा सकीं। ऐसा भी नहीं है कि क्वाड के पास अच्छे प्रोजैक्टों की कमी है। कृषि, जलवायु परिवर्तन, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्पेस, टैलीकम्युनिकेशन और कई दूसरी चीजें इसके एजैंडे में हैं। हालांकि, भारत के लिए, ताइवान या दक्षिण चीन सागर अब तक चीन से टकराव की सबसे ज्यादा संभावना वाली जगहें—आऊट ऑफ एरिया थिएटर हैं, नई दिल्ली पहले से ही चीन के साथ लगती अपनी सीमा पर चीन की दखलअंदाजी से जूझ रही है और उसे पाकिस्तानी सेना के हैडक्वार्टर रावलपिंडी के साथ बीजिंग का सैनिक गठजोड़ नजर और समझ आ रहा है। इस वजह से, असल दुनिया की लड़ाई के हालात में क्वाड की मिलिट्री एक्सरसाइज का प्रैक्टिकल इस्तेमाल शक के दायरे में है।

पहले सोचा गया था कि क्वाड को चीन की सैन्य शक्ति का मुकाबला करने के लिए खड़ा किया जाए लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाया तो यह सोचा गया कि इसे एक आर्थिक संगठन बना दिया जाए परंतु उसमें भी यह काम थोड़ा ढीला रहा परंतु भारत पर उसका कोई विशेष प्रभाव पडऩे वाला नहीं है। वैसे भी हमने अपनी ओर से आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व जापान के साथ अपने सम्बन्ध पक्के कर लिए हैं, अत: ऐसा नहीं है कि हमें क्वाड की जरूरत पड़ेगी या हमारे लिए यह कोई ऐसी संस्था है जिसके बगैर हम चल नहीं सकते। जिस प्रकार भारत ने 4 अन्य देशों के साथ मिल कर निर्गुट संगठन बनाया था और फिर ब्रिक्स बनाया, उसी प्रकार एक क्वाड भी बना था परंतु भारत की कूटनीति इन सब बातों पर नहीं, हमारी अपनी क्षमता पर निर्धारित है। यदि युद्ध की स्थिति आ भी जाए, भारत की सेना की क्षमता तथा अनुभव इतना है कि वह स्वयं की रक्षा कर सकता है। वैसे तो हमारी शुरू से ही हर देश के साथ दोस्ती बढ़ाने की नीति रही है। 

क्वाड के मजबूत होने से यदि चीन के साथ किसी के सम्बन्ध बिगड़ते हैं तो वह है भारत। चूंकि चीन के साथ हमारी इतनी बड़ी सीमा होने के कारण हमें उसका कोई खास लाभ होगा नहीं और इसीलिए क्वाड मजबूत हो यह अच्छी बात है परंतु क्वाड के कमजोर होने का भारत पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। क्वाड जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत व अमरीका में एक बहुपक्षीय समझौता है लेकिन अब यह व्यापार के साथ-साथ सैनिक सांझेदारी को मजबूती देने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है ताकि इलाके में शक्ति संतुलन बरकरार रखा जा सके। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘नाटो’ जैसे पुराने संगठन को कमजोर करने के बाद क्वाड को भी कमजोर कर दिया है परंतु मंत्री स्तर की बैठकों के लिए अब रुबियो के भारत आने से एक उम्मीद जगी है। 

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