BJP Big Gains In Himachal MC Election: हिमाचल प्रदेश नगर निगम चुनाव में भाजपा ने 63 में से 37 सीटें जीतकर कांग्रेस सरकार की चूलें हिला दी है. उत्तर भारत में कांग्रेस इसी एकमात्र प्रदेश में सत्ता में है. लेकिन, मंडी, धर्मशाला, सोलन नगर निगमों में भाजपा के कब्जे ने 2027 के चुनाव का ट्रेलर दिखा दिया है
BJP Big Gains In Himachal MC Election: उत्तर भारत में कांग्रेस पार्टी के एकमात्र गढ़ या किले में अब सेंध लगती दिख रही है. यह गढ़ है हिमाचल प्रदेश. इसके अलावा उत्तर भारत के किसी भी राज्य में इस वक्त कांग्रेस सत्ता में नहीं है. लेकिन, इस गढ़ में भी पार्टी की पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है. दरअसल, प्रदेश के चार नगर निगमों के चुनाव परिणामों ने एक बड़ा संदेश दे दिया है. मंडी, धर्मशाला और सोलन नगर निगम पर भाजपा की जीत तथा केवल पालमपुर में कांग्रेस की सफलता ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या उत्तर भारत में कांग्रेस का आखिरी मजबूत किला भी दरकने लगा है? 2022 में सत्ता में लौटने वाली कांग्रेस के लिए ये नतीजे सिर्फ स्थानीय निकाय चुनाव की हार नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मिलने वाली गंभीर राजनीतिक चेतावनी भी है.
चार नगर निगमों की 63 सीटों में से भाजपा ने 37 सीटें जीतकर स्पष्ट बढ़त हासिल की, जबकि कांग्रेस 23 सीटों पर सिमट गई. सबसे बड़ा झटका मंडी में लगा, जहां कांग्रेस लगभग साफ हो गई. धर्मशाला और सोलन जैसे शहरी क्षेत्रों में भी भाजपा ने सत्ता परिवर्तन कर दिया. भाजपा अब इन नतीजों को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह के रूप में पेश कर रही है.
2022 की जीत के बाद क्यों कमजोर पड़ती गई कांग्रेस?
दिसंबर 2022 में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर बड़ी जीत हासिल की थी. उस समय पार्टी ने पुरानी पेंशन योजना, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर जनता का भरोसा जीता था. लेकिन सत्ता में आने के बाद कांग्रेस उस राजनीतिक ऊर्जा को बरकरार रखने में सफल नहीं दिखी. 2024 के लोकसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. भाजपा ने हिमाचल प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लिया. इतना ही नहीं, उपचुनावों में भी कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिली. इससे साफ संकेत मिला कि विधानसभा चुनाव में मिली जीत को कांग्रेस स्थायी जनसमर्थन में नहीं बदल सकी. नगर निगम चुनावों के ताजा नतीजे इसी गिरावट की अगली कड़ी के रूप में देखे जा रहे हैं.
सुक्खू सरकार की सबसे बड़ी चुनौती राज्य की वित्तीय स्थिति है. हिमाचल प्रदेश लंबे समय से भारी कर्ज और सीमित राजस्व संसाधनों की समस्या से जूझ रहा है. पिछले दो वर्षों में कई बार ऐसी खबरें सामने आईं कि सरकार को वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है. विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि राज्य सरकार के पास विकास योजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को भुगतान में देरी की खबरों ने भी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है. हिमाचल जैसे छोटे राज्य में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों का बड़ा प्रभाव है और उनकी नाराजगी चुनावी समीकरण बदल सकती है. यदि अगले करीब 18 महीने में आर्थिक हालात में उल्लेखनीय सुधार नहीं होता तो भाजपा इसे नवंबर 2027 के चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बना सकती है.
कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई
कांग्रेस की मुश्किलें सिर्फ सरकार चलाने तक सीमित नहीं हैं. पार्टी के भीतर गुटबाजी लगातार खुलकर सामने आती रही है. पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का परिवार आज भी हिमाचल कांग्रेस की राजनीति में बड़ा प्रभाव रखता है. उनकी पत्नी और प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष प्रतिभा सिंह तथा उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह कई मौकों पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से असहमति जाहिर कर चुके हैं. 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान जो राजनीतिक संकट पैदा हुआ था, उसने कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया था. पार्टी हाईकमान भले ही हालात संभालने में सफल रहा हो, लेकिन जमीनी स्तर पर गुटबाजी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. भाजपा इसी कमजोरी का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है.
भाजपा को क्यों दिख रही सत्ता में वापसी की उम्मीद?
भाजपा के लिए नगर निगम चुनावों के नतीजे मनोवैज्ञानिक जीत हैं. विपक्ष में रहते हुए पार्टी ने यह दिखाया है कि उसका संगठन काफी मजबूत है और वह कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में सफल रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन और कांग्रेस सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष को भाजपा अपने पक्ष में बदलने की कोशिश करेगी. मंडी, धर्मशाला और सोलन में मिली जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ा है. राजनीतिक रूप से देखें तो भाजपा अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर पहले से ज्यादा आत्मविश्वास में दिखाई दे रही है.
क्या धुंधली हो रही है 2027 की तस्वीर?
राजनीति में डेढ़ साल का समय लंबा होता है और केवल नगर निगम चुनावों के आधार पर विधानसभा चुनाव का परिणाम तय नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि चुनावी संकेतों को नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए खतरनाक हो सकता है. सुक्खू सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है. एक तरफ उसे आर्थिक मोर्चे पर प्रदर्शन करना होगा, दूसरी तरफ पार्टी के भीतर एकजुटता भी कायम रखनी होगी. यदि इन दोनों मोर्चों पर सुधार नहीं हुआ तो कांग्रेस के लिए सत्ता बचाना कठिन हो सकता है.
क्या ढह जाएगा उत्तर भारत में कांग्रेस का आखिरी गढ़?
आज उत्तर भारत में कांग्रेस की स्थिति पहले जैसी नहीं रही. राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और पंजाब में पार्टी सत्ता से बाहर है. ऐसे में हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के लिए सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि उसकी उत्तर भारतीय राजनीति का प्रतीक बन चुका है. इसीलिए 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा होगा.

