पिछले लगभग 3 माह से चल रहे युद्ध के चलते देश के समक्ष एक बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है, जो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, बाधित आपूर्ति आदि के कारण देश में महंगाई बढऩे लगी है। इसलिए दीर्घकाल के लिए जो प्रयास हो रहे हैं, वे अल्पकाल के लिए शायद काफी नहीं हैं। देश में आने वाले कुछ समय तक पेट्रोलियम पदार्थों की कमी को भी दूर करना जरूरी है…
एक ओर अमरीका और इजरायल तथा दूसरी ओर ईरान के बीच युद्ध को लगभग तीन महीने होने जा रहे हैं और यह तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा। अमरीका को अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए ईरान ने खाड़ी के देशों पर भी हमले किए हैं। लगभग 20 देश युद्ध की विभीषिका झेल रहे हैं। उधर युद्ध रुकवाने के लिए अमरीका पर दबाव बनाने और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने हेतु एक महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को ईरान ने लगभग बंद कर दिया है। गौरतलब है कि दुनिया के कुल तेल और गैस की 20 फीसदी आवाजाही इस मार्ग से होती है। ऐसे में भारत सहित कई देश तेल और गैस की कमी के कगार पर खड़े हैं। साथ ही साथ युद्ध के चलते तेल और गैस की आवाजाही के बाधित होने से तेल और गैस की कीमतों में भी खासी वृद्धि हुई है और यह लगातार जारी है। भारत में सरकार द्वारा एक्साईज ड्यूटी घटाकर तेल की कीमतों को स्थिर रखने का बड़ा प्रयास किया गया, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होती वृद्धि के कारण अब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी वृद्धि प्रारंभ हो गई है। कॉमर्शियल गैस के सिलेंडरों की कीमतों में तो पहले से ही भारी वृद्धि हो चुकी है। हालांकि रसोई गैस की कीमतों को अभी तक नहीं बढ़ाया गया है, लेकिन उसमें कभी भी वृद्धि हो सकती है।
दूसरी तरफ चूंकि देश की कच्चे तेल की लगभग 88 प्रतिशत पूर्ति आयात से होती है, तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हो रही लगातार वृद्धि के कारण भारत का तेल आयात बिल बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण एक तरफ रुपए में गिरावट हो रही है तो दूसरी तरफ देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी खाली होता जा रहा है। युद्ध के प्रथम तीन महीनों में ही भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 47 अरब डालर कम हो चुका है। इन सब बातों के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता से अपील की है कि वे पेट्रोलियम पदार्थों के उपयोग को उत्तरोत्तर कम करने का प्रयास करें। इस कारण उन्होंने जनता से वर्क फ्रॉम होम, अधिक सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल की भी अपील की है। साथ ही विदेशी मुद्रा बचाने के लिए भी उन्होंने सोने की खरीद को कम करने, विदेशी यात्राओं से परहेज करने आदि के लिए भी जनता से गुहार लगाई है। इन परिस्थितियों में मई 2026 के तीसरे सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 5 देशों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), नीदरलैंड, स्वीडन, नार्वे और इटली की महत्वपूर्ण यात्राएं आज बड़ी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालांकि इन यात्राओं का रणनीतिक संदर्भ भी है। लेकिन माना जा रहा है कि इन यात्राओं के पीछे एक बड़ी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी सहयोग भी है। पश्चिमी एशिया में क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक तेल बाजारों में उथल-पुथल के चलते यह स्पष्ट है कि भारत इस यात्रा को परंपरागत तेल की आपूर्ति और भविष्य के लिए हरित ऊर्जा के क्षेत्र में संभावनाओं को बढ़ाने में सफल हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात भारत के तेल आयात का चौथा सबसे बड़ा स्रोत है, जहां से भारत की कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का 11 प्रतिशत प्राप्त होता है। तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में यूएई का तीसरा स्थान है और भारत यूएई की गैस का सबसे बड़ा खरीददार है। एलपीजी के लिए भी यूएई भारत का सबसे बड़ा स्रोत है।
दूसरी तरफ भारत द्वारा परिष्कृत पेट्रोलियम और लुब्रीकेंट का निर्यात भी यूएई में बड़ी मात्रा में होता है और इस संदर्भ में भी उसका दूसरा सबसे बड़ा स्थान है। भारतीय कंपनियों ने बड़ी मात्रा में यूएई की ऊर्जा परिसंपत्तियों में निवेश किया हुआ है। यूएई की कंपनी ‘मसदर’ ने राजस्थान में 60 गीगावाट की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता निर्माण के लिए समझौता किया है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री की यात्राओं में यूएई की यात्रा प्रारंभ में शामिल नहीं थी, और अंतिम समय पर 15 मई के लिए यूएई की यात्रा को प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में जोड़ा गया। यात्रा क्रम में इस बदलाव को कूटनीतिक और आर्थिक हलकों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सबसे खास यह रही कि आपातकाल में भारत के पेट्रोलियम भंडार की आवश्यकता पूर्ण करेगा और ऐसी किसी भी स्थिति में भारत को गारंटी के साथ तेल की आपूर्ति की जा सकेगी। हालांकि भारत के पास तेल के भंडारण की काफी क्षमता है, लेकिन उसके बावजूद भी युद्धकाल में ऐसा देखा गया कि यह क्षमता युद्ध की स्थिति में अपर्याप्त है। अबूधाबी नेशनल आयल कंपनी और इंडियन आयल लिमिटेड के बीच एक सहयोग समझौता हुआ, जिससे भारत की एलपीजी आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित होगी। यूएई की यात्रा में खास बात रणनीतिक प्रतिरक्षा साझेदारी का फ्रेमवर्क भी शामिल है। इसके अंतर्गत दोनों देशों के बीच प्रतिरक्षा और प्रौद्योगिक सहयोग को मजबूत किया जाएगा। जलपोत मरम्मत हेतु गुजरात में एक कलस्टर भी बनाया जाएगा। यूएई द्वारा भारत में निवेश के संदर्भ में भी समझौते हुए। कुल मिलाकर भारत और यूएई के बीच आर्थिक सहयोग का एक नया अध्याय इसके साथ शुरू हो गया है। यह सही है कि चाहे लंबे समय से देश की अधिकांश ऊर्जा की आवश्यकताएं आयातित पेट्रोलियम पदार्थों से पूरी होती रही हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि देश ने ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में भी काफी प्रगति की है। आज देश में जितनी बिजली उत्पादन की क्षमता है, उसका 51 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, पनबिजली योजनाओं, न्यूक्लियर ऊर्जा आदि से आता है।
इसमें देश लगातार प्रगति कर रहा है और नवकरणीय ऊर्जा क्षमता जो वर्तमान में 288 गीगावाट है, वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट तक पहुंचने का लक्ष्य है। इससे न केवल भारत ऊर्जा की दृष्टि से केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि ऊर्जा की आवश्यकताएं जो अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों से पूर्ण होती हैं, अब नवीकरणीय ऊर्जा से पूर्ण हो सकेंगी। पिछले कुछ वर्षों में बैटरी चलित वाहन जैसे ई-रिक्शा, कारें, छोटे और बड़े ट्रक, बस आदि में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। एक तरफ नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि और दूसरी ओर विद्युत चालित वाहनों में प्रगति देश को ऊर्जा की दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन अल्पकाल में देश ऊर्जा की दृष्टि से पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। पिछले लगभग 3 माह से चल रहे युद्ध के चलते देश के समक्ष एक बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है, जो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, बाधित आपूर्ति आदि के कारण देश में महंगाई बढऩे लगी है। इसलिए दीर्घकाल के लिए जो प्रयास हो रहे हैं, वे अल्पकाल के लिए शायद काफी नहीं हैं। देश में आने वाले कुछ समय तक पेट्रोलियम पदार्थों की कमी को भी दूर करना जरूरी है। गत सप्ताह प्रधानमंत्री द्वारा की गई खाड़ी देशों की यात्राएं इस संदर्भ में अहम मानी जा रही हैं। प्रधानमंत्री की यात्राओं को देश के समक्ष खड़ी समस्याओं के संदर्भ में देखना होगा।
वैश्विक मानचित्र में भारत की मजबूत होती स्थिति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की विदेश यात्राएं, जैसे संयुक्त अरब अमीरात, नॉर्वे, इटली और अन्य रणनीतिक साझेदार देशों की यात्राएं, एक तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करने के एक सोचे-समझे प्रयास को दर्शाती हैं। ये यात्राएं केवल औपचारिक नहीं हैं, वे भारत की आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतों, तकनीकी प्रगति और भू-राजनीतिक प्रभाव से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इन यात्राओं से ऊर्जा साझेदारियों को मजबूती तो मिली ही, दीर्घकालिक समझौते और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में सहयोग से भारत को वैश्विक कीमतों में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव और आपूर्ति में रुकावटों में भी राहत मिलेगी।-डा. अश्वनी महाजन

