राजस्थान, सुप्रीम कोर्ट ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत एक पिता की संपत्ति से बेटे को बेदखल करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें पिता के पक्ष में बेदखली का आदेश दिया गया था।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए बेटे को कड़ी फटकार लगाई। सुनवाई के दौरान जस्टिस नाथ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तुम किस तरह के बेटे हो? अपने ही पिता से लड़ रहे हो? यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। जाओ और अपने पिता की देखभाल करो। उनके जीवन का जितना भी समय बचा है, उन्हें शांति से जीने दो। जब याचिकाकर्ता के वकील वरुण भाटी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल का भी इस विवादित संपत्ति पर अधिकार है, तो जस्टिस नाथ ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि नहीं, अगला केस। वकील ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के ऊपर अपनी पत्नी और बेटे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है, लेकिन अदालत ने इस मामले में दखल देने से साफ इनकार कर दिया।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला राजस्थान के बिलाड़ा स्थित एक आवासीय संपत्ति से जुड़ा है। पिता ने भरण-पोषण न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया था कि उनका बेटा उन्हें परेशान करता है। पिता ने अपने ही घर में शांति से रहने के लिए सुरक्षा की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने फरवरी 2024 में पिता की अर्जी को स्वीकार करते हुए बेटे को घर खाली करने का आदेश दिया था। बाद में राजस्थान हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच और फिर डिवीजन बेंच ने भी इस आदेश पर मुहर लगा दी थी।

पैतृक संपत्ति पर मेरा भी हक

सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में बेटे ने दावा किया कि यह घर एक पैतृक और अविभाजित पारिवारिक संपत्ति है, जिसे मूल रूप से 1986 में उसकी दादी के नाम पर खरीदा गया था। उसका तर्क था कि दादी के निधन के बाद यह संपत्ति कई कानूनी उत्तराधिकारियों को मिल गई, इसलिए इसे केवल उसके पिता की निजी संपत्ति नहीं माना जा सकता। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सालों से वहां रह रहा है और संपत्ति में उसका भी हक है। घर खाली करने के आदेश से उसके परिवार से उनका एकमात्र निवास छिन गया है। वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का इस्तेमाल संपत्ति के मालिकाना हक और विरासत जैसे जटिल पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए दीवानी अदालत के विकल्प के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना कोई तर्क

याचिका में इस बेदखली के कारण याचिकाकर्ता की पत्नी और बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता जताई गई थी। साथ ही यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या संपत्ति के मालिकाना हक का विधिवत फैसला हुए बिना किसी सह-मालिक को इस तरह की संक्षिप्त कार्यवाही के जरिए घर से निकाला जा सकता है? हालांकि, सुप्रीम कोर्ट को राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई ठोस आधार नजर नहीं आया। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए वरिष्ठ नागरिक पिता के पक्ष में दिए गए बेदखली के आदेश को अंतिम रूप से सही ठहराया।

Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
September 2026
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930  
Exit mobile version