राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा थाना क्षेत्र के सूर्य चौहान की हत्या ने फिर देश को डराया है। बकरीद के दिन खोड़ा के नवनीत विहार में असद ने सूर्य चौहान के जिस तरह पेट में चाकू घोंपकर, घुमाकर हत्या की, उसमें सामान्य अपराध का भाव था ही नहीं। आप सोचिए, हत्यारे असद ने सूर्य से हत्या से पहले पूछा कि कभी बकरे को हलाल होते देखा है? यह किस तरह का प्रश्न है? उसने चाकू घोंपा और उसके पेट में घुमाया। यानी उसे चाकू घुमाने से सामने वाला जीवित नहीं बच सकेगा, इसकी पूरी जानकारी थी या फिर उसका प्रशिक्षण था। असद बाद में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। अगर वह जिंदा होता तो उसके बयान से हमें फिर उसी सोच की जानकारी मिलती जो हमने उदयपुर के कन्हैयालाल दर्जी से लेकर कोल्हापुर के उमेश कोल्हे और इसी वर्ष राजधानी दिल्ली के उत्तम नगर में तरुण बुटोलिया आदि हत्याकांड में मिली। आपको यह सुनकर हैरत होगी कि असद को उसके पिता ने हत्या के लिए प्रेरित किया और कहा कि इसका काम तमाम कर दो। 

इस तरह की घटनाओं और विश्व भर में बढ़ते मजहबी कट्टरवाद की प्रतिक्रिया में पूरे देश में छोटे-बड़े गैर मुस्लिम या ङ्क्षहदू संगठन खड़े हो गए हैं। उनके लोग ऐसी घटनाओं पर सक्रिय होते हैं। इनसे परिवारों को थोड़ी ताकत मिलती है तथा प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ता है। खोड़ा में भी हमने ऐसे संगठनों के कार्यकत्र्ताओं को तुरंत सक्रिय देखा। असद की मुठभेड़ में मृत्यु हुई तथा उसके पिता सहित 2 लोग गिरफ्तार हैं। उसके घर को अवैध करार देकर गिराने का नोटिस दिया जा चुका है। उस क्षेत्र में अवैध रूप से चल रहे मदरसों को सील किया गया है। क्षेत्र के हिस्ट्रीशीटरों की गतिविधियों को खंगाल कर कार्रवाई हो रही है। हालांकि यह प्रश्न बना रहता है कि इसी पुलिस प्रशासन के रहते हुए आखिर अवैध मकान व मदरसे या ऐसी गतिविधियां कैसे चलती रहती हैं? बकरीद के दिन कोई हिंदू युवक अपने मुस्लिम दोस्त से गले मिलता है, दुकान पर कोल्ड ङ्क्षड्रक पीता है और फिर धोखे में पेट में चाकुओं से वार होता है। आरंभ में कुछ समाचार पत्रों और चैनलों ने इसे सामान्य बाइक का झगड़ा करार दिया। कुछ लोगों का कहना है कि बाइक का झगड़ा भी जानबूझकर किया गया। कुल मिलाकर षड्यंत्र के तहत उस लड़के को बुलाया गया और फिर जब वह षड्यंत्र में तत्काल नहीं फंसा तो उसे तलाश कर उसकी हत्या कर दी गई।  

4 मार्च को राजधानी के उत्तम नगर में तरुण की हत्या के पीछे क्या कारण था? उसके परिवार की एक छोटी बच्ची ने होली को रंग से भरा हुआ गुब्बारा नीचे फैंका जो कुछ मुस्लिम समुदाय के लोगों पर गिर गया। उसे उन्होंने मजहब के विरुद्ध बताया और हंगामा करने लगे। पहले घर पर हमले हुए, लोग डर से घरों में दुबके रहे। बाद में तरुण वापस आ रहा था तो उसे घेर कर भीड़ ने हत्या कर दी। ये घटनाएं न अकेली हैं और न केवल भारत तक सीमित हैं। 28 जून, 2022 को उदयपुर में कन्हैयालाल दर्जी की गला रेत कर हत्या करते हुए वीडियो बनाकर जारी किया गया। हत्यारे ने कहा कि उसने नूपुर शर्मा के समर्थन में पोस्ट लिखा, जबकि उसके बेटे ने उसके मोबाइल से एक पोस्ट को शेयर किया था और हंगामा होने पर कन्हैयालाल ने उसे डिलीट कर दिया था। हत्यारों का कहना था कि इसने इस्लाम मजहब और पैगंबर साहब की तौहीन की है और इसकी सजा मौत है। इसी प्रकरण में उसके बाद 2 जुलाई, 2022 को महाराष्ट्र के अमरावती में एक कैमिस्ट उमेश कोल्हे की इसी तरह घेर कर हत्या की गई और हत्या करने वाले सब उसके परिचित निकले। इन घटनाओं की जांच में बिल्कुल साफ था कि इस्लाम मजहब की सोच के तहत हत्या हुई। 18 अक्तूबर, 2019 को लखनऊ में एक हिंदू संगठन चलाने वाले कमलेश तिवारी की उसके कार्यालय में घुसकर हत्या की गई और जब उसकी जांच हुई तो पता चला कि इस्लाम के नाम पर इनके जाल गुजरात तक फैले हुए हैं। 

उत्तर प्रदेश के कासगंज में चंदन गुप्ता 26 जनवरी, 2018 को तिरंगा यात्रा में शामिल थे। मुस्लिम बहुल इलाके में जलूस पर हमले हुए और उनकी मृत्यु हो गई। 1 फरवरी, 2018 को अंकित सक्सेना की हत्या उसकी मुस्लिम लड़की दोस्त के कारण राजधानी दिल्ली के टैगोर गार्डन में सरेआम कर दी गई। नवम्बर 2019 में हैदराबाद के शमशाबाद टोल प्लाजा के पास डॉक्टर प्रीति रैड्डी के साथ मुख्य अभियुक्त मोहम्मद पाशा ने 3 साथियों के साथ गैंगरेप किया और पैट्रोल से आग लगा दी। पिछले वर्ष ही इस्लाम धर्म छोड़ चुके गाजियाबाद के यूट्यूबर सलीम वास्तविक पर उसके घर में घुसकर नकाबपोशों ने चाकू से वार किया। सलीम वास्तविक का दोष यह था कि वह इस्लाम मजहब के कुछ पहलुओं पर प्रश्न उठाते थे तथा मदरसों आदि की गतिविधियों की आलोचना करते थे। 

किसी भी सभ्य समाज में, असहमति और विरोध का तरीका हत्या और उसमें आनंद अनुभव करना नहीं हो सकता। प्रश्न है कि क्या इसका कोई समाधान है? अनेक घटनाओं को इस्लाम विरोधी मानकर सरेआम हजारों लोग सड़कों पर ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सिर तन से जुदा, सिर तन से जुदा’ का नारा लगाते हैं। वारदात के बाद तो कानूनी कार्रवाई संभव है, किंतु इस जहरीली मजहबी सोच और व्यवहार का उपचार कैसे हो, इसका सीधा उत्तर किसी के पास नहीं। भारत में तो लोग सामान्यत: न सड़कों पर उतरते हैं और न सामूहिक रूप से संपूर्ण देश में विरोध प्रदर्शन होता है। दुर्भाग्य से यहां कार्रवाई भी सरकारों की राजनीतिक विचारधारा पर निर्भर करती है। अगर देश सोच बदलकर सामूहिक व्यवहार करने का अभ्यस्त नहीं होगा, तो यश चौहान, तरुण बुटोलिया, अंकित सक्सेना, ध्रुव त्यागी आदि न केवल शिकार होते रहेंगे, बल्कि इसका और तेजी से विस्तार होगा।– अवधेश कुमार

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