भुवनेश्वर से लगभग 20 किलोमीटर दूर हीरापुर में चौसठ योगिनी मंदिर है। यह चौसठ योगिनी मंदिर भारत में बचे हुए चार चौसठ योगिनी मंदिरों में से एक है। बाकी तीन में से एक ओडिशा के बोलांगीर जिले में है, जबकि बाकी दो मध्य प्रदेश में हैं। इस मंदिर को स्थानीय लोग ‘चौसठी योगिनी’ के नाम से जानते हैं, जिसका अर्थ है 64 योगिनियां (देवी दुर्गा के अवतार)।

इस पवित्र स्थान की मुख्य देवी महामाया हैं, जिन्हें योगिनियों में से एक माना जाता है। इसलिए, इस मंदिर को महामाया मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर में रोज़ाना होने वाली पूजा और अनुष्ठानों में ‘भूमंडल’ की पूजा शामिल है, जो प्रकृति के पांच तत्वों – जल, आकाश, अग्नि, पृथ्वी और ईथर (आकाश तत्व) – का प्रतीक है। योगिनी परंपरा में योग के साथ-साथ तंत्र-साधना भी शामिल रही है, और इसका आदिवासी व ग्रामीण परंपराओं से गहरा संबंध है।

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से 20 किमी दूर हीरापुर इलाका पड़ता है। यहां पर दोपहर को लोग बेचैन होने लगते हैं। यहां के लोग आने-जाने वालों को सलाह देते हैं कि वे यहां ज़्यादा देर न रुकें। आस-पास के सभी लोग जानते हैं कि महामाया तालाब के पास वाले खेत में शाम ढलने पर क्या होता है। चौसठ योगिनी मंदिर देखने में ऐसा नहीं लगता कि इससे किसी को बेचैनी हो। यह छोटा सा मंदिर है। मंदिर की बलुआ पत्थर की दीवारें जमीन से सिर्फ आठ फीट ऊंची हैं। लेकिन बिना छत वाले और खुले आसमान के नीचे बने इस मंदिर में कुछ ऐसा है जो तर्कशील दिमाग को बेचैन कर देता है।

स्थानीय लोग इसे ‘डायन का मंदिर’ कहते हैं। विद्वान इसे भारत के सबसे अनोखे तांत्रिक मंदिरों में से एक मानते हैं। लोग सन्नाटे में यहां जाने से कतराते हैं। शाम को अंधेरा होने के साथ ही गांव के लोग इस तरह नहीं जाते हैं, यहां तक की बाहर से आए लोगों को भी मंदिर की तरफ न जाने की सलाह देते हैं।

चौसठ योगिनी मंदिर, कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी पुराना है, जो कोणार्क मंदिर से लगभग 40 किलोमीटर दूर है। जब यह ढांचा कलिंग की धरती पर बना था, तब कोणार्क महज़ एक गांव हुआ करता था। ज़्यादातर विशेषज्ञ इसके निर्माण का समय 9वीं सदी AD मानते हैं और इसका श्रेय भौमकारा राजवंश की रानी हीरादेवी को देते हैं। इस राजवंश ने 736 AD से 950 AD के बीच ओडिशा पर राज किया था। माना जाता है कि हीरापुर गांव का नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा गया है।

यह भारत में बचे हुए केवल चार योगिनी मंदिरों में से एक है। दूसरा मंदिर ओडिशा के बोलांगीर जिले में स्थित रानीपुर-झरियाल में है और बाकी के दो मध्य प्रदेश में हैं। इन सभी मंदिरों में से, हीरापुर का मंदिर सबसे छोटा है और कई लोगों का मानना ​​है कि यह सबसे पुराना भी है। यह मंदिर एक ऐसी आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा है जो ‘योगिनी’ की अवधारणा पर आधारित है। जो लोग इससे परिचित नहीं हैं, उनके लिए बता दें कि योगिनी एक दिव्य स्त्री शक्ति है, जिसे अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। यह तांत्रिक पूजा से जुड़ी है और मुक्ति तथा सुरक्षा के लिए इसका आह्वान किया जाता है।

इस मंदिर की एक और दिलचस्प बात है, इसकी छत। या यूं कहें कि इस मंदिर में छत ही नहीं है। यह मंदिर ‘हाइपेथ्रल’ (खुली छत वाला) है। यानी, यह आसमान की तरफ खुला है और ऐसा किसी आर्किटेक्चरल गलती की वजह से नहीं है। इसका डिज़ाइन जान-बूझकर ऐसा बनाया गया है। तांत्रिक मान्यता है कि योगिनियां उड़ सकती हैं, और बिना छत वाला मंदिर उन्हें अपनी मर्ज़ी से आने-जाने की सुविधा देता है। ऊपर से देखने पर, इसका गोल ढांचा ‘योनि’ जैसा दिखता है, जो स्त्रीत्व का पवित्र प्रतीक है।

यह मंदिर सदियों तक खोया रहा, जैसे अपने ही खंडहरों के नीचे दब गया हो। इसे 1953 में दोबारा खोजा गया, जब ओडिशा राज्य संग्रहालय के पुरातत्वविद् केदारनाथ महापात्र को हीरापुर के खेतों में बलुआ पत्थर के बिखरे हुए टुकड़े मिले। मंदिर को फिर से जोड़ा गया, और तब से यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की देखरेख में है। हर दिसंबर में होने वाले तीन दिवसीय सांस्कृतिक उत्सव ‘चौसठ योगिनी महोत्सव’ में देश भर से शास्त्रीय नर्तक और संगीतकार यहां अपनी कला का प्रदर्शन करने आते हैं। इसमें देश भर से लोग शामिल होते हैं।

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