उम्मीद करें कि सरकार महंगे ईंधन से बढ़ती महंगाई को तात्कालिक उपायों से नियंत्रित करके आम आदमी को राहत देगी। उम्मीद करें कि महंगे तेल का यह दौर देश में नवीनकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के ऐसे नए दौर को आकार देगा, जिससे पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में कमी आएगी और विदेशी मुद्रा में बड़ी बचत होगी…

यकीनन इस समय भारत समेत पूरी दुनिया के लोग महंगे ईंधन की चुनौती का सामना कर रहे हैं। हाल ही में अमरीका व ईरान के बीच ताजा झड़पों से तेल और गैस की कीमतों में फिर उछाल देखने को मिला है। 7 जून से घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत में 29 रुपए की बढ़ोतरी की गई है। पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक अभी तक पेट्रोल-डीजल में की गई चार मूल्यवृद्धि के बाद भी सरकारी क्षेत्र की तीनों तेल कंपनियों इंडियन आयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम को संयुक्त तौर पर हर दिन 750 करोड़ रुपए से अधिक का घाटा हो रहा है। ऐसे में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने 2 जून को अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो तेल कंपनियां अपना घाटा कम करने के लिए आने वाले दिनों में कुल बढ़ोतरी को 2.50 रुपए से लेकर 10 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ा सकती हैं। प्रमुख कंसल्टेसी फर्म ईवाई इंडिया की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में वित्त वर्ष 2026-27 में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से महंगाई दर 6 प्रतिशत से अधिक का स्तर छू सकती है। अब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर भारत में ईंधन की कीमत में कोई और वृद्धि आम आदमी के लिए महंगाई की मुश्किलें और बढ़ा सकती है। इस बात को ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि पहले भी पिछले पांच दशकों में तेल के कई झटके आम आदमी की मुश्किलों सहित देश की विकास दर में तेज गिरावट के कारण बने हैं।

ऐसे में तेल के झटकों से निजात के मद्देनजर महंगाई से गरीबों को बचाने के तात्कालिक उपायों के साथ दीर्घकालीन रणनीति पर आगे बढऩा जरूरी है। इस परिप्रेक्ष्य में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली के दौरान वैश्विक ऊर्जा संकट के मद्देनजर देशवासियों से पेट्रोल, डीजल और गैस का संयम से इस्तेमाल करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि भारत के पास तेल के बड़े कुएं नहीं हैं। ऐसे में पश्चिम एशियाई संकट के कारण नागरिकों को यह जिम्मेदारी निभानी होगी कि वे जहां तक संभव हो, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें। इलेक्ट्रिक कारों और कार पूलिंग को प्राथमिकता दें। साथ ही कोरोना काल की तरह वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन मीटिंग्स को बढ़ावा दें। ऐसे में लोगों के द्वारा पेट्रोल-डीजल का किफायत से उपयोग किया जाना जरूरी है। देश में पेट्रोल-डीजल की महंगाई से आम आदमी को राहत देने के लिए केंद्र सरकार के द्वारा भी टैक्स में कमी तथा राज्य सरकारों के द्वारा वैट में कमी सहित अन्य उपायों पर आगे बढ़ा जाना होगा। वस्तुत: तेल के झटकों पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता। यदि हम पिछले कुछ दशक में तेल की कीमतों से आए बड़े झटकों को देखें तो पाते हैं कि वर्ष 1973 में तेल संकट के समय तेल की कीमतें चार गुना होकर 3 डॉलर प्रति बैरल से 12 डॉलर तक पहुंच गईं और महंगाई करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ गई। तेल का दूसरा झटका वर्ष 1979 में लगा और तेल के दाम दोगुने से अधिक 30 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गए। साथ ही भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 5 फीसदी की गिरावट आ गई। तेल का तीसरा झटका वर्ष 1990 में लगा और तेल की कीमतें फिर दोगुना हो गई। इसके बाद 2012 में लगे झटके से तेल की कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। साथ ही 2014 तक तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर बनी रहीं। उसके बाद एक लंबे समय तक तेल की कीमतों में कमी का परिदृश्य दिखाई दिया। निश्चित रूप से सरकार के द्वारा तेल के झटकों से बचने के लिए दीर्घकालीन रणनीति पर भी आगे बढऩा जरूरी है। पेट्रोल-डीजल के नवीनकरणीय विकल्पों पर आगे बढऩा होगा।

पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण 20 प्रतिशत से बढ़ाया जाना होगा। सरकार के द्वारा शीघ्रतापूर्वक पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल की बिक्री की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी होगी। डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाना अनिवार्य किया जाना होगा। तेल की मांग में कमी करने हेतु इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) के उपयोग में तेजी लाई जानी होगी। एथेनॉल और इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल से जहां आम आदमी को सस्ता और प्रदूषणमुक्त सफर मिलेगा, वहीं कच्चे तेल का आयात कम होने से देश का पैसा बचेगा और किसानों की कमाई भी बढ़ेगी। भारत के पास इस समय पेट्रोल-डीजल पर अपनी निर्भरता कम करने और क्लीन एनर्जी की तरफ तेजी से बढऩे का स्वर्णिम अवसर है। ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ईंधन संकट को भांपते हुए भारत सरकार ईवी सेक्टर के लिए 1 अरब डॉलर से अधिक के प्रोत्साहन पैकेज पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य कमर्शियल वाहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक बसों और ट्रकों को तेजी से अपनाना है। अब ओडिशा सरकार के द्वारा ईंधन की खपत घटाने के लिए जारी किए गए उस 8-सूत्रीय निर्देश को अन्य सरकारों के द्वारा भी आदर्श मानना होगा, जिसके तहत सभी सरकारी विभागों में पेट्रोल-डीजल वाहनों की खरीद पर रोक लगा दी गई है और केवल इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) खरीदने को अनिवार्य कर दिया गया है। अब भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को नई रफ्तार दी जानी होगी।

सरकार को इलेक्ट्रिक कार तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि इलेक्ट्रिक बसों व ट्रकों को भी बढ़ावा देना होगा। यद्यपि कच्चे तेल की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होगी, मगर उस पर निर्भरता घटाना होगी और अब नवीकरणीय ऊर्जा को भारत का सबसे बड़ा नया सुरक्षा कवच बनाया जाना होगा। यद्यपि देश में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी कुल बिजली उत्पादन में इसका एक चौथाई भाग ही है। अब 2030 तक इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने के लक्ष्य की ओर तेजी से बढऩा होगा। अब परिवहन क्षेत्र का अधिकतम विद्युतीकरण जरूरी है। रेलवे अपने लगभग सभी इंजन बिजली से चलाने लगा है। सडक़ परिवहन में बिजली का इस्तेमाल बढ़ाया जाना होगा। सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों की संख्या भी बढ़ाना होगी। घरों में खाना पकाते समय भी बिजली का इस्तेमाल बढ़ाना होगा। हाइड्रोकार्बन पर चलने वाली कई औद्योगिक प्रक्रियाएं भी बिजली पर चलाना होंगी। परिवहन को हरित बनाने के लिए अतिरिक्त बिजली का उत्पादन सौर, पवन या परमाणु ऊर्जा से किया जाना होगा। अब देश भर में सरकारी और निजी क्षेत्रों की कंपनियों के द्वारा वर्चुअल मोड (ऑनलाइन) पर आधिकारिक बैठकें, समीक्षाएं और ट्रेनिंग सेशन आयोजित किए जाने को प्राथमिकता दी जानी होगी। पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में शामिल किए जाने की राह पर भी आगे बढ़ा जाना होगा।

चूंकि पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्यों को मिलने वाला वैट उनके लिए महत्वपूर्ण आय का स्रोत है, इसलिए पेट्रोल-डीजल को तुरंत बिना शर्त जीएसटी में शामिल करने के बजाय संतुलित और चरणबद्ध रूप से अपनाने के लिए कोई उपयुक्त फॉर्मूले के साथ आगे बढ़ा जाना होगा। उम्मीद करें कि सरकार महंगे ईंधन से बढ़ती महंगाई को तात्कालिक उपायों से नियंत्रित करके आम आदमी को राहत देगी। उम्मीद करें कि महंगे तेल का यह दौर देश में नवीनकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के ऐसे नए दौर को आकार देगा, जिससे पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में कमी आएगी और विदेशी मुद्रा में बड़ी बचत होगी। उम्मीद करें कि भारत में ईवी, बैटरी, सोलर एनर्जी और एनर्जी स्टोरेज का भविष्य केवल मांग, पूंजी या नीति से तय नहीं होगा, बल्कि क्रिटिकल मिनरल्स, बैटरी मटीरियल, रिफाइनिंग, मैन्युफैक्चरिंग उपकरण और प्रोसेस नॉलेज की योजना और निवेश से भी तय होगा। उम्मीद करें कि ऐसे बहुआयामी रणनीतिक प्रयासों से भारत तेल के झटकों से निर्मित महंगाई की चुनौतियों का प्रभावी रूप से मुकाबला कर पाएगा।-डा. जयंती लाल भंडारी

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