जगत प्रकाश नड्डा

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के 10 वर्ष: बस्तर के दूरस्थ गांवों से लेकर सरगुजा की पहाड़ियों तक मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की नई कहानी

किसी भी राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक पैमाना उसकी सड़कों, भवनों और उद्योगों से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से तय होता है जो अपने सबसे संवेदनशील नागरिकों की रक्षा करती है। गर्भवती महिलाएं और नवजात शिशु किसी भी समाज की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होते हैं। जब एक मां सुरक्षित रहती है तो केवल एक जीवन नहीं बचता, बल्कि एक पूरे परिवार, समाज और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
भारत ने पिछले एक दशक में मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में जिस परिवर्तनकारी यात्रा को तय किया है, वह विश्व स्वास्थ्य क्षेत्र में एक उल्लेखनीय उदाहरण के रूप में उभरी है। इस परिवर्तन के केंद्र में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) है, जिसने गर्भवती महिलाओं तक विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की दिशा में एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया है। इस अभियान की सफलता की सबसे प्रभावशाली कहानियों में से एक छत्तीसगढ़ की है, जहां घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और दूरस्थ आदिवासी अंचलों के बीच मातृ स्वास्थ्य सेवाओं ने नई पहचान बनाई है।
दस वर्ष पहले जिन क्षेत्रों में गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य जांच की कल्पना भी कठिन थी, वहां आज हर महीने की 9 तारीख मातृ स्वास्थ्य जागरूकता और चिकित्सकीय सेवाओं का प्रतीक बन चुकी है। यह बदलाव केवल योजनाओं का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, तकनीकी नवाचार, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता और जन-भागीदारी के सामूहिक प्रयासों की कहानी है।
नौ तारीख बनी सुरक्षित मातृत्व का प्रतीक
9 जून 2016 को शुरू हुए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की अवधारणा सरल लेकिन प्रभावशाली थी। गर्भावस्था के नौ महीनों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक माह की नौ तारीख को गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष प्रसव पूर्व जांच दिवस के रूप में निर्धारित किया गया। इस दिन सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा निःशुल्क जांच, परामर्श और आवश्यक परीक्षणों की व्यवस्था की जाती है।
इस पहल ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को नियमितता और पहचान दी। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और उनके परिवारों के लिए यह समझना आसान हुआ कि प्रत्येक माह की नौ तारीख स्वास्थ्य जांच के लिए निर्धारित है। परिणामस्वरूप प्रसव पूर्व जांच की पहुंच और स्वीकार्यता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
आज देशभर में करोड़ों महिलाओं ने इस अभियान का लाभ उठाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान समय पर जांच और जोखिमों की पहचान ने मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
छत्तीसगढ़ के लिए चुनौती थी भूगोल, समाधान बना समुदाय
छत्तीसगढ़ की भौगोलिक परिस्थितियां देश के अनेक राज्यों से भिन्न हैं। बस्तर, बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और कांकेर जैसे जिलों के बड़े हिस्से वनाच्छादित हैं। कई गांव ऐसे हैं जहां बरसात के मौसम में पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है। वर्षों तक इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती रहा।
आदिवासी अंचलों में पारंपरिक मान्यताओं और घरेलू प्रसव की प्रथा भी लंबे समय तक मातृ स्वास्थ्य सुधार की राह में बाधा बनी रही। कई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान किसी प्रकार की चिकित्सकीय जांच नहीं कराती थीं। जटिलता होने पर अस्पताल पहुंचने में देर हो जाती थी और कई बार स्थिति गंभीर हो जाती थी।
यहीं से प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान ने बदलाव की शुरुआत की। राज्य सरकार और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने संयुक्त रूप से रणनीति तैयार की कि जोखिम सामने आने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले उसकी पहचान की जाए। मोबाइल मेडिकल यूनिट्स, हाट-बाजार क्लीनिक, विशेष स्वास्थ्य शिविर और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से विशेषज्ञ सेवाओं को गांवों तक पहुंचाया गया।
आज स्थिति यह है कि जिन क्षेत्रों में कभी स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सीमित थी, वहां गर्भवती महिलाओं का नियमित पंजीकरण, जांच और फॉलोअप संभव हो रहा है।
समय रहते जोखिम की पहचान बनी सबसे बड़ी ताकत
मातृ स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश गंभीर प्रसूति जटिलताएं अचानक नहीं होतीं। उनके संकेत गर्भावस्था के दौरान दिखाई देने लगते हैं। यदि समय पर पहचान हो जाए तो अधिकांश जोखिमों को नियंत्रित किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान है। गंभीर एनीमिया, उच्च रक्तचाप, गर्भकालीन मधुमेह, पूर्व प्रसव संबंधी जटिलताएं, कम उम्र या अधिक उम्र में गर्भधारण तथा जुड़वा गर्भ जैसी स्थितियों को विशेष रूप से चिन्हित किया जाता है।
छत्तीसगढ़ में अभियान के अंतर्गत बड़ी संख्या में उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान की गई है। इन मामलों को चिन्हित करने के बाद उन्हें उच्च स्तरीय स्वास्थ्य संस्थानों से जोड़ा जाता है ताकि प्रसव के समय किसी प्रकार की आपात स्थिति उत्पन्न न हो।
यही कारण है कि राज्य के दूरस्थ जिलों में भी जटिल प्रसवों के सुरक्षित प्रबंधन की संभावना बढ़ी है। चिकित्सकों के अनुसार, समय पर रेफरल और नियमित निगरानी ने अनेक माताओं और नवजातों का जीवन बचाया है।
डिजिटल ट्रैकिंग ने स्वास्थ्य सेवाओं को दिया नया आयाम
पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल तकनीक ने मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों को नई गति प्रदान की है। पीएमएसएमए पोर्टल के माध्यम से गर्भवती महिलाओं की नाम आधारित ट्रैकिंग संभव हुई है। किसी भी स्वास्थ्य केंद्र में जांच के बाद जानकारी तत्काल ऑनलाइन दर्ज की जाती है।
यदि किसी महिला को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा जाता है तो उसकी जानकारी संबंधित चिकित्सकीय इकाइयों तक पहुंच जाती है। इससे स्वास्थ्य तंत्र को पहले से तैयारी करने का अवसर मिलता है। प्रसव की संभावित तिथि, चिकित्सकीय स्थिति और आवश्यक सुविधाओं की जानकारी उपलब्ध रहने से आपातकालीन परिस्थितियों का बेहतर प्रबंधन संभव हो पाता है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां दूरी और परिवहन लंबे समय तक बड़ी चुनौती रहे हैं, डिजिटल निगरानी प्रणाली ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक जवाबदेह और प्रभावी बनाया है।
गांव की पगडंडी से अस्पताल तक, आशा कार्यकर्ताओं का असाधारण योगदान
यदि इस परिवर्तन की असली कहानी लिखी जाए तो उसमें सबसे प्रमुख स्थान अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का होगा। आशा, एएनएम, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी इस पूरे अभियान की रीढ़ हैं।
आशा कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण करती हैं, उन्हें नियमित जांच के लिए प्रेरित करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचाने में सहायता करती हैं। कई दूरस्थ गांवों में उन्होंने सामाजिक मान्यताओं को बदलने और संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पोषण संबंधी निगरानी करती हैं, जबकि एएनएम टीकाकरण, प्राथमिक जांच और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करती हैं। हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों में कार्यरत सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी प्रारंभिक स्तर पर जोखिमों की पहचान कर विशेषज्ञ चिकित्सकों से समन्वय स्थापित करते हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इन कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता के बिना मातृ स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार की कल्पना संभव नहीं थी।
जब योजनाएं साथ आईं तो बना सुरक्षा का व्यापक कवच
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की सफलता केवल एक योजना की उपलब्धि नहीं है। इसकी प्रभावशीलता विभिन्न स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के समन्वय से बढ़ी है।
जननी सुरक्षा योजना संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहन देती है। जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम सरकारी अस्पतालों में प्रसव, दवाइयों, जांचों और परिवहन को निःशुल्क उपलब्ध कराता है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना पोषण संबंधी सहायता प्रदान करती है, जबकि आयुष्मान भारत गंभीर मामलों में आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
इन सभी योजनाओं ने मिलकर गर्भवती महिलाओं के लिए एक ऐसा सुरक्षा तंत्र तैयार किया है जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर आर्थिक सहायता और पोषण तक सभी पहलुओं को शामिल किया गया है।
बस्तर की कहानी, जहां अस्पताल अब भरोसे का नाम है
बस्तर संभाग के कई गांवों में आज भी ऐसे परिवार मिल जाते हैं जो कुछ वर्ष पहले तक अस्पताल में प्रसव कराने से हिचकते थे। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां बदली हैं।
सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में नियमित स्वास्थ्य शिविरों और सामुदायिक संवाद कार्यक्रमों ने विश्वास का वातावरण बनाया। जिन महिलाओं को पहले अस्पताल जाने में संकोच होता था, वे अब गर्भावस्था की शुरुआत से ही स्वास्थ्य जांच करा रही हैं।
कई मामलों में समय पर जांच के दौरान गंभीर एनीमिया, उच्च रक्तचाप या भ्रूण की असामान्य स्थिति की पहचान हुई और सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित किया जा सका। ऐसी हजारों कहानियां आज छत्तीसगढ़ के गांवों में सुनाई देती हैं जहां मातृत्व अब भय नहीं, बल्कि विश्वास और सुरक्षा से जुड़ा अनुभव बन रहा है।
अगले दशक की दिशा : शून्य रोकी जा सकने वाली मातृ मृत्यु का लक्ष्य
मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। दूरस्थ क्षेत्रों तक वर्षभर निर्बाध स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाना, प्रसवोत्तर देखभाल को और मजबूत बनाना तथा शहरी गरीब बस्तियों तक सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना अभी भी प्राथमिकताएं हैं।
ड्रोन आधारित आपूर्ति प्रणाली, टेलीमेडिसिन, डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड और प्रशिक्षित मिडवाइफरी सेवाओं का विस्तार आने वाले वर्षों में मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों को और मजबूत बना सकता है।
छत्तीसगढ़ ने यह सिद्ध किया है कि कठिन भूगोल और सीमित संसाधनों के बावजूद यदि नीति, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी एक साथ काम करें तो स्वास्थ्य क्षेत्र में असाधारण परिवर्तन संभव है।
आज जब हर महीने की 9 तारीख को राज्य के हजारों स्वास्थ्य केंद्रों में गर्भवती महिलाएं जांच के लिए पहुंचती हैं, तो यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है कि सुरक्षित मातृत्व प्रत्येक महिला का अधिकार है। बस्तर के जंगलों से लेकर सरगुजा की पहाड़ियों तक फैलती यह नई स्वास्थ्य चेतना वास्तव में विकसित भारत और सशक्त छत्तीसगढ़ की आधारशिला बन रही है।
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(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और रसायन एवं उर्वरक मंत्री हैं)

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