पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक ममता बनर्जी की पार्टी इस समय अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। बंगाल में टीएमसी विधायकों के दो गुट हो गए है। 80 में से 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता माना है और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भी मान्यता मिल गई है। इसी बीच अब संसद में भी टीएमसी सांसदों में भी दो गुट हो गए हैं। दरअसल, सोमवार को TMC के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र देकर मोदी सरकार का समर्थन करने और अलग समूह के रूप में गठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई है। वहीं, राज्य सभा में टीएमसी के वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे से भी NDA की स्थिति और मजबूत होने वाली है।

विधेयकों को पारित करने में होगी आसानी

लोकसभा में NDA के बढ़ते संख्याबल से केंद्र सरकार को कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में आसानी हो सकती है। वर्तमान में 543 सदस्यीय लोकसभा में NDA के पास 293 सांसद हैं, जबकि 245 सदस्यीय राज्य सभा में उसके 149 सदस्य हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भाजपा अन्य गैर-गठबंधन दलों के समर्थन की भी कोशिश कर रही है। इनमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का नाम भी चर्चा में है।

जानकारी के मुताबिक, टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने NDA को समर्थन देने का फैसला किया है। वहीं, राज्य सभा में टीएमसी के 12 सदस्य हैं। दूसरी ओर, DMK के पास लोकसभा में 22 और राज्य सभा में 8 सांसद हैं।

बीजेपी ने क्या कहा? 

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि टीएमसी में असंतोष और नेतृत्व को लेकर नाराजगी के कारण यह स्थिति बनी है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने किसी प्रकार का विभाजन नहीं कराया है और जो सांसद NDA में शामिल होना चाहते हैं, उनका स्वागत है। नेता ने यह भी संकेत दिया कि DMK की ओर से कुछ मुद्दों पर समर्थन के संकेत मिले हैं, हालांकि इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

DMK सांसद ने अटकलों को किया खारिज

हालांकि, DMK के एक राज्य सभा सांसद ने NDA में शामिल होने की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि पार्टी केवल मुद्दों के आधार पर समर्थन देने पर विचार कर सकती है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में पार्टी का संगठन मजबूत है और भविष्य के चुनावों को लेकर कोई चिंता नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी के सांसदों का समर्थन NDA को मिलता है, तो सरकार के लिए परिसीमन और एक देश-एक चुनाव जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाना आसान हो सकता है।

भाजपा नेताओं का दावा है कि विपक्ष द्वारा परिसीमन विधेयक का विरोध राजनीतिक कारणों से किया गया था, जबकि सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया में सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का प्रावधान है और किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा।

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