भारत सरकार को उर्वरक, खाद सबसिडी 3.42 लाख करोड़ रुपए करनी पड़ सकती है। यह सबसिडी कंपनियों को दी जाएगी, ताकि वे खाद का पर्याप्त बंदोबस्त कर सकें। बजट में इस सबसिडी का करीब 1.71 लाख करोड़ रुपए का अनुमान रखा गया था। खाद के संकट के साथ देश की खाद्य-सुरक्षा भी जुड़ी है। यदि कमजोर मॉनसून और अल नीनो के कारण, खाद के अभाव में, उपज कम हुई, तो खाद्यान्न की कमी के कारण देश में खाद्य-संकट के हालात भी बन सकते हैं। कृषि विशेषज्ञ गेहूं, चावल, दलहन की उपज कम आंक रहे हैं, लिहाजा उनके आकलन हैं कि दक्षिण एशिया में सूखे के गंभीर आसार बन रहे हैं। उन देशों में भारत भी शामिल है। फिलहाल सरकार दावा कर रही है कि खाद्यान्न के भंडार भरे हैं, लेकिन बुनियादी समस्या उर्वरक और एलएनजी की है। हमें दोनों का आयात करना पड़ता है। करीब 59 फीसदी एलएनजी खाड़ी देशों से आयात होती रही है, जिसमें करीब 43 फीसदी एलएनजी अकेला कतर हमें सप्लाई करता था। ईरान युद्ध के दौरान मिसाइल हमलों से कतर की रिफाइनरी, एलएनजी के ढांचे, तेल के अन्य ठिकाने नष्ट हुए हैं, लिहाजा कतर को उत्पादन बहुत कम करना पड़ा है, नतीजतन आपूर्ति बाधित है। भारत में अब खरीफ की फसलों की बुवाई का समय है। धान, ईख, मक्का आदि मुख्य फसलें हैं। खाद का भारत का आयात बिल करीब 74 लाख करोड़ रुपए है। सरकार के प्रतिनिधि किसानों को सलाह दे रहे हैं कि यूरिया, डीएपी खाद का इस्तेमाल कम करें। जैविक, प्राकृतिक खेती पर फोकस है, लेकिन सरकारी अधिकारी यह नहीं जानते कि प्राकृतिक खेती के लिए औसत खेत तीन साल में तैयार होता है। यह खेती छोटे भू-भाग पर भी नहीं की जा सकती। किसान जिस खाद का इस्तेमाल करते हैं, उसका एक मोटा हिस्सा जमीन के भीतर रिस कर और भूमिगत जल के साथ मिल कर आसपास के खेतों में चला जाता है। उससे जैविक खेती प्रभावित, खादयुक्त हो जाती है। फिर वह प्राकृतिक खेती रहती ही नहीं। भारत में करीब 6.01 करोड़ टन खाद की सालाना खपत होती है। बेशक 90 फीसदी एनपीके का उत्पादन देश में ही किया जाता है और 87 फीसदी यूरिया का उत्पादन भी हम करने में सक्षम हैं, लेकिन उर्वरक संयंत्रों को चलाने के लिए भी एलएनजी चाहिए।

खाड़ी, पश्चिम एशिया में अब भी युद्ध जारी है। बेशक राष्ट्रपति टं्रप समझौते और युद्धविराम के ढोंग करते रहें, लेकिन हकीकत यह है कि वह युद्ध खत्म करना ही नहीं चाहते। अमरीका का एक तबका युद्ध से डॉलर छाप रहा है। बमबारी जारी है। ईरान ने भी कुवैत, बहरीन, जॉर्डन के अमरीकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले कर उन्हें तबाह किया है। युद्ध के कारण तेल, गैस, खाद और खासकर एलएनजी के आयात और आपूर्ति दोनों ही बाधित हैं। इनके कारण और कमजोर मॉनसून, अल नीनो के प्रभाव से भारत के राजस्थान, गुजरात के कच्छ क्षेत्र, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल और कर्नाटक आदि राज्यों में सूखे, खाद्य-संकट के आसार बन रहे हैं। कम उत्पादन के कारण चावल, दालों, सब्जियों की आपूर्ति और उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। उससे खाद्य मुद्रास्फीति में भी बढ़ोतरी की आशंका है। विश्व में 26.6 करोड़ लोग सूखे और खाद्य-संकट के शिकार हो चुके हैं। उन देशों में एशिया के भी कई देश हैं, लेकिन शुक्र है कि भारत फिलहाल उस जमात में नहीं है। सरकारों ने सूखे से निबटने के लिए जिला स्तरीय समितियां बनाई हैं। फसल विविधीकरण के प्रयास भी जारी हैं, लेकिन किसान की उपज पर्याप्त नहीं होगी, तो वह बाजार में क्या बेचेगा? यदि व्यापार अच्छी तरह नहीं कर पाएगा, तो उसकी आय कैसे बढ़ेगी? औसत किसान आज भी 10,000 रुपए माहवार कमा पाता है। उसमें भी खेती की आमदनी कम और मजदूरी का मेहनताना ज्यादा है। बेशक प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के 12 साल पूरे करने का जश्न भाजपा-एनडीए मनाए, लेकिन देश का औसत किसान कब जश्न मना पाएगा, यह भी यक्ष-प्रश्न से कम नहीं है। खेती की लागत बढ़ रही है, जबकि किसानों की आमदनी में पर्याप्त इजाफा नहीं हो पा रहा है। गांवों के लोग अब खेती को छोड़ रहे हैं और मजदूर बनकर अपना गुजारा कर रहे हैं। खेती को लाभदायक बनाने की घोषणाएं होती हैं, पर हकीकत इससे दूर है।

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