दूसरी ओर बेरोजगारी, कृषि आय, बढ़ती असमानता, महंगाई व सरकारी ऋण जैसे मसले हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत की आर्थिक प्रगति लोगों को सरकारी सहायता से आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही है अथवा सहायता पर निर्भर आबादी का दायरा लगातार बढ़ रहा है…
सत्ता के 12 वर्षों में मोदी सरकार ने स्वयं को गरीब कल्याण, अमृतकाल, पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था और विकसित भारत 2047 के नारों के साथ प्रस्तुत किया है। किंतु इस चमकदार दावे के पीछे एक दूसरा पक्ष भी दिखाई देता है। आलोचकों के अनुसार इस अवधि में लगभग 200 लाख करोड़ रुपए के सार्वजनिक ऋण और करीब 180 लाख करोड़ रुपए की विभिन्न कल्याणकारी एवं प्रत्यक्ष लाभ योजनाओं पर हुए व्यय, जिन्हें चुनावी रेवड़ी की उपमा से आर्थिक विषयों के विशेषज्ञों ने ही नवाजा है, जिसने देश में एक ऐसे आर्थिक मॉडल को जन्म दिया है जिसे वे ‘कर्ज लेकर घी पीने वाला विकास मॉडल’ यानी चार्वाक सिद्धांत कहते हैं। मुफ्त राशन, किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय निर्माण, महिला सशक्तिकरण सहायता तथा अन्य योजनाओं के माध्यम से करोड़ों लोगों तक सरकारी सहायता पहुंची है, परंतु सवाल यह है कि यदि भारत वास्तव में तीव्र गति से विकसित अर्थव्यवस्था बन रहा है, तो फिर 81 करोड़ लोगों को आज भी मुफ्त राशन की आवश्यकता क्यों है? क्या यह समृद्धि का संकेत है या उस आर्थिक संरचना का प्रमाण, जिसमें विकास के दावों के बावजूद बड़ी आबादी आत्मनिर्भर बनने के बजाय सरकारी सहारे पर निर्भर बनी हुई है। कल्याणकारी योजनाओं का व्यापक विस्तार हुआ है।
मोदी सरकार की सबसे बड़ी पहचान प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) और लक्षित सामाजिक सुरक्षा योजनाएं रही हैं। सरकार के अनुसार करोड़ों परिवारों को पहली बार बैंक खाते, गैस कनेक्शन, शौचालय, आवास, स्वास्थ्य बीमा और डिजिटल भुगतान जैसी सुविधाएं मिलीं। मुख्य लाभार्थी समूहों में शामिल हैं : लगभग 81 करोड़ लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत मुफ्त राशन प्राप्त कर रहे हैं। लगभग 11 करोड़ परिवारों को उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी कनेक्शन दिए गए। मगर इनमें से मात्र 3 करोड़ ही रिफिलिंग करवा पाए। सरकारी दावे के अनुसार 12 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत हुआ। लगभग 4 करोड़ परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना से लाभान्वित हुए बताए जाते हैं। किसान सम्मान निधि के अंतर्गत लगभग 11 करोड़ किसानों को प्रतिवर्ष 6000 रुपए की सहायता दी जा रही है। 14 करोड़ से अधिक लोगों को मुद्रा योजना के अंतर्गत ऋण उपलब्ध कराया गया। 32 करोड़ महिलाओं के खातों में 3000 रुपए की राशि सीधे डाली जा रही है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाखों महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा गया तथा 3 करोड़ से अधिक लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य रखा गया। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत 56 करोड़ से अधिक लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा कवच मिला। 70 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को भी स्वास्थ्य बीमा दायरे में लाने की पहल की गई। स्टार्टअप इंडिया के माध्यम से लाखों युवाओं और उद्यमियों को प्रोत्साहन मिला। इसके अतिरिक्त विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, दिव्यांग सहायता, छात्रवृत्तियां, अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण कार्यक्रम, महिला एवं बाल विकास योजनाएं तथा अनेक राज्य-केंद्र संयुक्त योजनाएं भी चल रही हैं। क्या यह सब ‘मुफ्त रेवडिय़ां’ हैं? यदि केवल इन सरकारी योजनाओं के कुल लाभार्थियों की संख्या का अवलोकन करें तो यह देश की कुल आबादी से बढ़ जाएगी। तो क्या 2014 से जिस विकसित भारत का डंका पीटा जा रहा है, वह मुफ्त की रेवडिय़ां वोट बैंक के सहारे छद्म लोकतांत्रिक व्यवस्था का पिटारा है?
राजनीतिक विमर्श में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या ये योजनाएं मुफ्त रेवडिय़ां हैं या सामाजिक निवेश? समर्थकों का तर्क है कि भोजन, आवास, स्वास्थ्य, स्वच्छता और ऊर्जा जैसी बुनियादी सुविधाएं नागरिक अधिकारों के दायरे में आती हैं। यदि गरीब परिवारों को शौचालय, गैस, आवास या स्वास्थ्य सुरक्षा मिलती है तो इससे उनकी उत्पादकता और जीवन स्तर बढ़ता है। विरोधियों का कहना है कि अत्यधिक सबसिडी और मुफ्त वितरण से सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ता है तथा लोगों की निर्भरता बढ़ सकती है। उनका तर्क है कि रोजगार सृजन और आय वृद्धि पर अधिक बल दिया जाना चाहिए। वास्तविकता यह है कि अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में सामाजिक सुरक्षा पर बड़े पैमाने पर सरकारी खर्च किया जाता है। प्रश्न केवल इतना है कि उसका वित्तपोषण किस प्रकार किया जाता है और उसका दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव क्या होता है। बढ़ता सार्वजनिक ऋण : पिछले दशक में भारत का कुल सार्वजनिक ऋण लगातार बढ़ा है। इसके पीछे कई कारण रहे हैं : कोविड-19 महामारी के दौरान राहत पैकेज और मुफ्त राशन। बुनियादी ढांचा निर्माण पर भारी निवेश। रक्षा आधुनिकीकरण। राज्यों को वित्तीय सहायता। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार। यह कहना कि पूरा ऋण केवल विश्व बैंक या आईएमएफ से लिया गया है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। भारत का अधिकांश सार्वजनिक ऋण घरेलू स्रोतों- सरकारी बॉन्ड, बैंकिंग प्रणाली और वित्तीय संस्थानों- से आता है।
विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं का योगदान कुल ऋण का सीमित हिस्सा है। और यदि वह 200 लाख करोड़ है तो फिर कुल कर्ज कितना होगा, अनुमान लग सकता है। उपलब्धियां और चुनौतियां : इन 12 वर्षों में भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ है। डिजिटल भुगतान, जीएसटी, आधार आधारित डीबीटी, राजमार्ग, एक्सप्रेसवे, रेलवे आधुनिकीकरण, हवाई अड्डों का विस्तार, रक्षा उत्पादन और स्टार्टअप इकोसिस्टम में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। दूसरी ओर बेरोजगारी, कृषि आय, बढ़ती असमानता, महंगाई व सरकारी ऋण जैसे मसले हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत की आर्थिक प्रगति लोगों को सरकारी सहायता से आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही है अथवा सहायता पर निर्भर आबादी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। लाभार्थियों की संख्या नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर नागरिक सही पैमाना है।-डा. राकेश कपूर

