पाकिस्तान एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है, अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन निराशाजनक है, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में अशांति साफ दिखाई दे रही है, वहीं अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष एक स्थायी सुरक्षा चुनौती बन गया है। फिर भी, पाकिस्तान पतन के कगार पर खड़ा राष्ट्र नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के लिए पाकिस्तान को एक महत्वहीन रणनीतिक चिंता के रूप में देखना अनुचित होगा।

भौगोलिक दृष्टि से ही पाकिस्तान विश्व के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों में से एक है। दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों के मिलन बिंदू पर स्थित होने के कारण, यह देश आंतरिक अव्यवस्थाओं के दुष्परिणामों से बार-बार बचा रहा है। शीत युद्ध के दौरान पश्चिम के लिए इसका महत्व था, अफगानिस्तान पर सोवियत कब्जे के दौरान यह अपरिहार्य बन गया, 9/11 के बाद इसने फिर से केंद्रीय भूमिका निभाई और अब, ईरान और अफगानिस्तान में नई अनिश्चितता और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच, यह एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है। भारत को अब पाकिस्तान की घरेलू अशांति से नहीं, बल्कि जिस तरह से चीन पाकिस्तान की रणनीतिक क्षमताओं को लगातार बढ़ा रहा है, उससे चिंतित होना चाहिए। महज 16 महीनों के भीतर पाकिस्तान द्वारा चीन समॢथत 6 निगरानी उपग्रहों के प्रक्षेपण की खबरों की हमारे रणनीतिक हलकों में गहन जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह मामूली आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि रणनीतिक क्षमता में एक संरचनात्मक छलांग है। 

खुफिया, निगरानी और टोही तंत्र आधुनिक युद्ध में तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। आज वास्तविक समय में युद्धक्षेत्र की जानकारी, जमीनी स्तर पर सैन्य बलों के अनुपात के साथ-साथ परिचालन सफलता को भी निर्धारित करती है, खासकर बहु-क्षेत्रीय अभियानों में। इससे भी अधिक ङ्क्षचताजनक बात यह है कि इस उभरते तंत्र के कुछ हिस्सों को भारत के उत्तरी परिचालन क्षेत्र की बार-बार और केंद्रित निगरानी के लिए डिजाइन किया गया प्रतीत होता है। 

पाकिस्तान की विकसित होती साइबर क्षमता पर भी गहन और निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। वर्षों तक, साइबर टकराव काफी हद तक छिटपुट हमलों और मामूली व्यवधान तक ही सीमित रहा। वह दौर अब बदल गया है। पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान अब साइबर क्षमता को एक ऐसे असममित उपकरण के रूप में देखता है, जो पारंपरिक कमियों की भरपाई करने में सक्षम है। चीनी तकनीकी सहायता के साथ मिलकर, साइबर अभियान इस्लामाबाद को संकट के समय महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, सूचना प्रणालियों और जनविश्वास को निशाना बनाने के लिए एक कम लागत वाला लेकिन अत्यधिक विघटनकारी उपकरण प्रदान करते हैं। अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र अब निर्णायक मोर्चे बन गए हैं, जहां पारंपरिक सैन्य संघर्ष शुरू होने से बहुत पहले ही रणनीतिक लाभ को आकार दिया जा सकता है।

अमरीका अब पाकिस्तान को अफगानिस्तान युद्ध के दौरान जैसी नजरों से नहीं देखता लेकिन इतिहास गवाह है कि क्षेत्रीय संकट गहराने पर वाशिंगटन समय-समय पर पाकिस्तान की ओर रुख करता है। साथ ही, पाकिस्तान पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंध कायम रखने का सावधानीपूर्वक प्रयास कर रहा है। भारत की प्रतिक्रिया में संतुलन और स्पष्टता की जरूरत है। पाकिस्तान को केवल इसलिए एक मामूली खतरा नहीं माना जा सकता क्योंकि हाल के वर्षों में भारत द्वारा उसे लगातार सैन्य रूप से मिली हार से उसकी कमजोर क्षमता की धारणा बन गई है। 

भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा नियोजन में नागरिक-सैन्य एकीकरण को गति देनी चाहिए। इस क्षेत्र में पहले से ही काफी प्रगति हो रही है। रणनीतिक प्रौद्योगिकियों को अब नागरिक संस्थानों, निजी उद्योग और रक्षा प्रतिष्ठानों के बीच अलग-अलग नहीं रखा जा सकता। अंतरिक्ष क्षमता, साइबर रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, खुफिया एकीकरण और निगरानी तंत्र के लिए वर्तमान स्तर से कहीं अधिक एकीकृत राष्ट्रीय प्रयास की आवश्यकता है। भारत के हितों के विरुद्ध रणनीतिक सांझेदारियों का दुरुपयोग करने की पाकिस्तान की क्षमता को लगातार कमजोर करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 

भारत के लिए चुनौती केवल पाकिस्तान ही नहीं है। बल्कि यह बाहरी शक्तियों द्वारा पाकिस्तान के चारों ओर निर्मित किए जा रहे तकनीकी, साइबर और रणनीतिक समर्थन प्रणालियों का बढ़ता हुआ तंत्र है। संकर युद्ध में दशकों के अनुभव से उसे रणनीतिक रूप से अप्रत्याशित हमले करने की पूरी क्षमता प्राप्त होगी। यह वास्तविकता हमारे लिए पूर्ण ध्यान देने योग्य है, न कि उस भ्रामक धारणा पर विश्वास करने की, जिसमें भ्रमित होकर हम यह मान सकते हैं कि हमारा शत्रु पतन की ओर अग्रसर है। (लेखक बिहार के राज्यपाल और श्रीनगर स्थित चिनार कोर के पूर्व कमांडर हैं / ‘टी.एन.आई.ई.’ से साभार)-लै. ज. सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)

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