पीढिय़ों से भारत का मध्यवर्गीय परिवार एक अटल आर्थिक सिद्धांत पर चलता आया है। प्रोफैशनल डिग्री मतलब खुशहाल जिंदगी। बच्चों को  इंजीनियरिंग, एम.बी.बी.एस., एम.बी.ए. की डिग्री के लिए मां-बाप ने बैंक की एफ.डी. तुड़वाई, सोना गिरवी रखकर कर्ज लिया। डिग्री सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक समझौता बन गया, जिसमें जिंदगी सफल होने का सपना था, जो अब धूमिल होता जा रहा है।

प्रोफैशनल डिग्री के लिए बैंक लोन 30 से 40 लाख रुपए तक पहुंच गए हैं। शुरुआती तनख्वाह 4 से 6 लाख रुपए सालाना पर अटकी है।  फाइनांस ग्लोबल इकोनॉमिक आऊटलुक 2026 के मुताबिक, तेजी से बदले हालात में भारतीय परिवारों को अब बच्चों की प्रोफैशनल डिग्री से उम्मीद बेमानी लगने लगी है। वह सवाल जो हर परिवार आज की शिक्षा व्यवस्था पर उठा रहा है, कि शिक्षा पर खर्च हर साल 10 से 15 प्रतिशत बढ़ रहा है, जबकि शुरुआती तनख्वाह में सालाना इतना इजाफा भी नहीं है। यह खाई खुद नहीं भरेगी, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था का नतीजा है, जिसकी उन लोगों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं, जिनकी वह सेवा करने का दावा करती है। 

डिग्री से गारंटिड नौकरी के सामाजिक समझौते का दौर खत्म हो गया। एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, जो खुद को इस बात से न नापे कि कितने छात्रों ने दाखिला लिया, बल्कि इस बात से नापे कि कितनों को सच में आगे बढऩे के काबिल बनाया। एक औसत दर्जे के कॉलेज से सॉफ्टवेयर डिवैल्पर बनाने की कुल लागत सोचिए। अकेले बी.टैक कोर्स की फीस 12 से 15 लाख रुपए। इससे पहले की 13 साल की स्कूली पढ़ाई जोड़ें तो कुल निवेश 20 लाख रुपए से ऊपर पहुंच जाता है, जबकि शुरुआती तनख्वाह मात्र 4 से 5 लाख रुपए सालाना। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और पुणे में हुए सर्वे में 1000 से ज्यादा नौकरी के विज्ञापनों के विश्लेषण से पता चला कि ए.आई. और डाटा साइंस की नौकरियां समान अनुभव स्तर पर परंपरागत आई.टी. से 20 से 40 प्रतिशत ज्यादा तनख्वाह दे रही हैं। डिग्री तेजी से बेमानी होती जा रही है और सब कुछ स्किल स्पैशलाइजेशन पर टिका है।

दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा, भारत में हर साल लगभग 15 लाख इंजीनियरिंग ग्रैजुएट पढ़ाई पूरी करके निकलते हैं, पर इतनी बड़ी संख्या में रोजगार नहीं। अनस्टॉप टैलेंट रिपोर्ट 2025 के सर्वे में 30,000 से ज्यादा लोगों से बात की गई। सर्वे में पाया गया कि 2025 बैच के 83 प्रतिशत इंजीनियरिंग ग्रैजुएट बिना नौकरी या इंटर्नशिप के नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं, 12 लाख से ज्यादा युवा और उनके परिवारों ने बड़ी आर्थिक कुर्बानियां दीं, पर नतीजा कुछ नहीं निकला। एम.बी.ए. की तस्वीर थोड़ी ही बेहतर है। 5,000 से ज्यादा संस्थान एम.बी.ए. या पी.जी.डी.एम. कोर्स करा रहे हैं। सप्लाई गुणवत्ता वाली नौकरियों से कहीं आगे निकल गई है। आई.आई.एम. इंदौर तक जहां फीस 20 से 25 लाख रुपए है, 2023 और 2024 के बीच औसत प्लेसमैंट सैलरी करीब 15 प्रतिशत गिरी। शीर्ष 30 बिजनैस स्कूलों में से हर चौथा ग्रैजुएशन तक बिना नौकरी के रहा।

मर्सर-मेट्टल इंडिया ग्रैजुएट स्किल इंडैक्स 2025 सबसे कड़ा फैसला सुनाता है कि केवल 42.6 प्रतिशत भारतीय ग्रैजुएट को उद्योग के मानकों के हिसाब से नौकरी के काबिल माना जाता है और यह आंकड़ा एक दशक में मुश्किल से सुधरा है। 20 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी लगभग 44.5 प्रतिशत है। हम रोजगार के ‘काबिल नहीं’ ग्रैजुएट इसलिए नहीं पैदा कर रहे कि ये बुरे छात्र हैं, हम इसलिए पैदा कर रहे हैं क्योंकि व्यवस्था जान-बूझकर बेमेल बनाई गई है। यह संकट बहुत ज्यादा ग्रैजुएट होने का नहीं है। यह पूरी तरह बेमेल शिक्षा का संकट है। सैंकड़ों इंजीनियरिंग कॉलेजों के पाठ्यक्रम 2000 की शुरुआत से नहीं बदले हैं। कई संस्थानों के शिक्षकों ने पूरा करियर अकादमिक दुनिया में बिताया है और उद्योग में कभी काम नहीं किया। प्लेसमैंट सैल आखिरी समैस्टर में कुछ ईमेल करके उसे इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देते हैं।

व्हीलबॉक्स इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 पुष्टि करती है कि केवल 45 प्रतिशत ग्रैजुएट को उद्योग के लिए तैयार माना जाता है। यह एक ऐसी व्यवस्था पर करारी चोट है जो 4 साल और 15 से 20 लाख रुपए खर्च करके युवाओं को उन नौकरियों के लिए तैयार करती है, जो वे कर नहीं सकते। यह बेमेल कोई हादसा नहीं है। यह एक ऐसी व्यवस्था का अनुमानित नतीजा है, जिसने दाखिलों को बिजनैस मॉडल की तरह बढ़ाया। प्रासंगिक पाठ्यक्रम, असली प्रोजैक्ट अनुभव या प्लेसमैंट की सख्ती को उसी तेजी से बढ़ाए बिना। भारत को नए हल नहीं खोजने, बल्कि उन्हें अपनाने की इच्छाशक्ति चाहिए। जर्मनी का दोहरा ट्रेनिंग मॉडल 300 से ज्यादा राज्य-मान्यता प्राप्त कार्यक्रमों में व्यावसायिक स्कूल और नौकरी पर वेतन सहित काम के बीच ट्रेनिंग देता है। जर्मनी की युवा बेरोजगारी यूरोप में सबसे कम है। प्रशिक्षु प्रशिक्षण के दौरान तनख्वाह पाते हैं, कर्ज का वह जाल, जो भारतीय शिक्षा में आम है, जर्मनी में नहीं है।

सिंगापुर की स्किल्स फ्यूचर पहल हर 25 साल से ऊपर के नागरिक को सरकार की तरफ से जीवन भर अपस्किलिंग के लिए क्रैडिट देती है। 2024 तक 24,000 कंपनियां हर साल 2.41 लाख कर्मचारियों को स्किल्स फ्यूचर ट्रेनिंग के लिए भेज रही थीं। साल 2024 तक सिंगापुर की करीब 80 प्रतिशत नौकरियों के लिए शैक्षणिक योग्यता की जरूरत ही नहीं रही। नियोक्ताओं ने स्किल और साबित की गई काबिलियत को भर्ती का पैमाना बना लिया है। दक्षिण कोरिया के मेइस्टर हाई स्कूलों ने बड़े एम्प्लॉयर्स के साथ मिलकर विशेष उद्योग कार्यक्रम बनाए, जिससे एक व्यावसायिक रास्ते को ऐसे रास्ते में बदल दिया, जहां ग्रैजुएट 90 प्रतिशत से ज्यादा रोजगार हासिल करते हैं और तनख्वाह यूनिवॢसटी ग्रैजुएट के बराबर है। भारत की शिक्षा व्यवस्था अभी भी एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए डिग्रीधारकों की फौज खड़ी कर रही है, जिसे बाकी दुनिया छोड़ रही है। इंजीनियरिंग और मैनेजमैंट कोर्स में अभी भी साल 2010 का सिलेबस पढ़ाया जा रहा है। इसे उद्योग भागीदारों के साथ मिलकर बनाया जाए और हर साल अपडेट किया जाए।(लेखक ओरेन इंटरनैशनल के संस्थापक एम.डी. हैं)-दिनेश सूद

Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31  
Exit mobile version