14वें पासपोर्ट सेवा दिवस पर विदेश मंत्रालय ने एक ऐसा वक्तव्य जारी किया, जिसे शायद वे एक सामान्य प्रशासनिक स्पष्टीकरण समझ रहे थे, कि भारतीय पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं। इसने एक ऐसी सार्वजनिक बहस छेड़ दी, जिसकी शायद सरकार को उम्मीद नहीं थी। जावेद अख्तर ने पूछा-क्या किसी ऐसे व्यक्ति को यात्रा दस्तावेज जारी करना, जिसकी नागरिकता की जांच नहीं हुई, स्वयं में हास्यास्पद नहीं है? आदित्य ठाकरे ने पूछा-पासपोर्ट देने से पहले पुलिस क्या जांचती है, यदि परिणाम नागरिकता का दस्तावेज नहीं है? और आम नागरिकों ने वह प्रश्न पूछा जो सबसे गहरा था-यदि पासपोर्ट नहीं, आधार नहीं, मतदाता पहचान पत्र नहीं, तो फिर क्या?

ईमानदार उत्तर, जो सरकार ने अभी तक नहीं दिया, यह है-भारत के पास इस समय कोई सार्वभौमिक, मानकीकृत, निर्णायक नागरिकता प्रमाण दस्तावेज नहीं है। विदेश मंत्रालय ने बता दिया कि क्या नागरिकता सिद्ध नहीं करता। यह नहीं बताया कि क्या करता है। यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर देश को चाहिए।

कानून बेतुका नहीं, बस अपरिचित है : पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के अंतर्गत, केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में किसी ऐसे व्यक्ति को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है, जो नागरिक नहीं है। यह एक प्रावधान ही यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त है कि भारतीय पासपोर्ट रखना कानूनी दृष्टि से नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने 27 मई, 2026 के अपने निर्णय में, जिसमें चुनाव आयोग की विशेष गहन संशोधन (एस.आई.आर.) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया, इस ङ्क्षबदू पर स्पष्ट रूप से कहा-चुनाव आयोग का अधिदेश मतदाता सूचियों में पात्रता की जांच तक सीमित है, वह नागरिकता का निर्णय करने तक विस्तारित नहीं होता। आधार पहचान और निवास स्थापित करता है, नागरिकता नहीं। मतदाता पहचान पत्र पूर्व नामांकन स्थापित करता है, नागरिकता नहीं। और अब विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट को भी उन दस्तावेजों की सूची में जोड़ दिया है, जो कानूनी अर्थ में नागरिकता का उत्तर नहीं देते।

बदला कानून नहीं, बदला है कि किससे पूछा जा रहा है : स्वतंत्र भारत के अधिकांश इतिहास में, दस्तावेजी प्रमाण और कानूनी नागरिकता के बीच की खाई अधिकांश जनता को दिखाई नहीं दी, क्योंकि कोई प्रमाण मांग ही नहीं रहा था। असम में एन.आर.सी., जो 2019 में पूर्ण हुआ, पहला ऐसा अभ्यास था जिसमें साधारण निवासियों से दस्तावेजी साक्ष्य के माध्यम से नागरिकता स्थापित करने को कहा गया। इसने खाई को स्पष्ट रूप से उजागर किया-लाखों लोग जो पीढिय़ों से भारत में रहते आए थे, मतदान करते, कर देते, आधार, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र रखते, वे प्रक्रिया द्वारा मांगे गए विशिष्ट दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। एस.आई.आर. यद्यपि कम कठोर अभ्यास है, पंजाब और बिहार में भी वैसी ही चिंता उत्पन्न कर रहा है।

गहरी वैधानिक समस्या यह है कि भारत ने 2 संसदीय संशोधनों, 1986 और फिर 2003 में, के माध्यम से जन्मसिद्ध नागरिकता को क्रमश: संकुचित किया है, जिसे जनता ने पूरी तरह आत्मसात नहीं किया। 1 जुलाई, 1987 से पहले भारत में जन्मा बच्चा माता-पिता की स्थिति से निरपेक्ष होकर स्वत: नागरिक था। 1 जुलाई, 1987 से 2 दिसम्बर, 2004 के बीच जन्मे बच्चे के लिए कम से कम एक भारतीय नागरिक माता-पिता होना आवश्यक था। 3 दिसम्बर, 2004 के बाद जन्मे बच्चे के लिए या तो दोनों माता-पिता का भारतीय नागरिक होना, या एक का नागरिक और दूसरे का अवैध प्रवासी न होना अनिवार्य है। भारत ने वास्तव में वंश-आधारित नागरिकता मॉडल की ओर कदम बढ़ा लिया है, परंतु पुराने प्रादेशिक मॉडल की प्रशासनिक संरचना, सार्वजनिक समझ और दस्तावेज जारी करने की प्रथाएं अभी भी बनी हुई हैं। यही विसंगति इस भ्रम की जड़ है।

पुलिस वास्तव में क्या सत्यापित करती है : पुलिस सत्यापन प्रक्रिया के माध्यम से यह जांचती है कि आवेदक दिए गए पते पर निवासी है, उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और उसने एक भारतीय नागरिक के अनुरूप दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। वे नागरिकता का निर्णय नहीं करते। आवेदक स्वयं नागरिकता घोषित करता है। पुलिस अयोग्यता-संकेतकों की जांच करती है, पासपोर्ट कार्यालय दस्तावेज जारी करता है। यह प्रक्रिया एक यात्रा दस्तावेज के लिए पर्याप्त है। यह नागरिकता-निर्धारण नहीं है। भ्रम इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि अधिकांश भारतीयों के लिए अधिकांश परिस्थितियों में पासपोर्ट नागरिकता के प्रमाण के रूप में काम करता रहा है, भले ही वह कानूनी दृष्टि से निर्णायक प्रमाण नहीं है।

सरकार को अब तीन कदम उठाने होंगे : पहला, गृह मंत्रालय को यह स्पष्ट, सुलभ मार्गदर्शन प्रकाशित करना चाहिए कि कोई नागरिक मतदाता सूचियों, एन.आर.सी. प्रकार के अभ्यासों और किसी भी भावी नागरिकता रजिस्टर के प्रयोजन से नागरिकता स्थापित करने के लिए कौन से दस्तावेज या दस्तावेजों का संयोजन उपयोग कर सकता है। असम एन.आर.सी. में विरासत दस्तावेजों, 1971 से पूर्व की मतदाता सूचियां, भूमि अभिलेख, विद्यालय प्रमाण-पत्र का उपयोग किया गया। उन श्रेणियों को मानकीकृत और राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है। दूसरा, संसद को विचार करना चाहिए कि क्या भारत को एक नागरिकता रजिस्टर की आवश्यकता है, जो जनसंख्या रजिस्टर से, आधार से और मतदाता सूची से अलग हो, जिसके साथ एक ऐसा दस्तावेज हो, जिसे नागरिक अपनी स्थिति के निर्णायक प्रमाण के रूप में रख सकें। सरकार 2003 से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की बात करती आई है। दो दशक से अधिक समय बाद भी, वह रजिस्टर असम के बाहर अस्तित्व में नहीं है। 

तीसरा और सबसे आवश्यक, संसद को 2003 के संशोधन से उत्पन्न राज्यविहीनता के जोखिम को दूर करना होगा। भारत में एक नागरिक माता-पिता और एक अवैध प्रवासी माता-पिता के यहां जन्मे बच्चे को जन्म से कोई नागरिकता प्राप्त नहीं होती। यदि दूसरे माता-पिता का गृह देश भी बच्चे को मान्यता न दे, तो बच्चा राज्यविहीन हो जाता है, अपनी किसी गलती से नहीं, बल्कि माता-पिता की कानूनी स्थिति के कारण। भारत न तो 1954 के राज्यविहीन व्यक्तियों की स्थिति संबंधी कन्वैंशन का और न ही 1961 के राज्यविहीनता की कमी संबंधी कन्वैंशन का पक्षकार है। उसे कम से कम एक ऐसा घरेलू प्रावधान बनाना चाहिए जो भारतीय भूमि पर जन्मे बच्चों को राज्यविहीनता से बचाए। कानून, जैसा वह अभी है, कोई एकल दस्तावेज नहीं देता, जो इस प्रश्न का निर्णायक उत्तर दे। सरकार ने अब यह सार्वजनिक रूप से कह दिया है, जिसके बाद वह देश को कम से कम यह तो बता सकती है कि उत्तर क्या है।(लेखक 1984 बैच के पंजाब कैडर के सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी हैं, जो पंजाब सरकार के विशेष मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए।)-के.बी.एस. सिद्धू 

Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31  
Exit mobile version