How Childhood Trauma Affects Adult Health: बचपन की तकलीफें हमेशा सिर्फ यादों तक सीमित नहीं रहतीं. कई बार उनका असर इंसान के शरीर और दिमाग पर इतने लंबे समय तक बना रहता है कि सालों बाद भी लोग समझ नहीं पाते कि उनकी परेशानी की शुरुआत आखिर कहां से हुई थी. अब नई रिसर्च यह बताने लगी हैं कि बचपन में झेला गया डर, हिंसा, उपेक्षा या इमोशनल अस्थिरता बड़े होने के बाद शारीरिक और मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाल सकती है.
तमाम बीमारियों का जड़ है पुराना अनुभव
कई लोग सालों तक माइग्रेन, पेट की परेशानी, नींद न आना, लगातार थकान, एंग्जायटी या शरीर में दर्द जैसी समस्याओं का इलाज करवाते रहते हैं, लेकिन असली वजह उनके बचपन के अनुभव हो सकते हैं. आधुनिक साइंस अब यह मानने लगा है कि बचपन का ट्रॉमा सिर्फ इमोशनल समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के नर्वस सिस्टम, हार्मोन, इम्यूनिटी और लंबे समय तक बीमारी के खतरे को भी प्रभावित कर सकता है.
बचपन में हुई हिंसा के शिकार का क्या होता है असर?
एक्सपर्ट डॉ. प्रितिका सिंह ने TOI को बताया कि कई मरीज ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट सामान्य आती है, लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी कुछ और कहती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक 40 साल की महिला लगातार पीठ दर्द, पेट की समस्या और एंग्जायटी से जूझ रही थी. कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी उसकी परेशानी की वजह समझ नहीं आई, जबकि उसके बचपन में घरेलू हिंसा और इमोशनल उपेक्षा जैसी घटनाएं जुड़ी थीं.
हमारे शरीर पर क्या होता है असर?
एक्सपर्ट के मुताबिक, जब कोई बच्चा लंबे समय तक डर या असुरक्षा वाले माहौल में रहता है तो उसका शरीर लगातार फाइट या फ्लाइट मोड में रहने लगता है. इससे स्ट्रेस हार्मोन लंबे समय तक बढ़े रहते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों पर असर डालते हैं. यही वजह है कि कई लोगों में आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ऑटोइम्यून बीमारियां, डिप्रेशन, मोटापा और नींद से जुड़ी समस्याएं देखने को मिलती हैं.
बचपन की हिंसा के शिकार लोगों के हेल्थ पर क्या होता है असर?
इस विषय पर सबसे चर्चित रिसर्च अमेरिका में हुई एसीई मानी जाती है, जिसे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और कैसर परमानेंटे ने किया था. इस स्टडी में 17 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था. रिसर्च में सामने आया कि जिन लोगों ने बचपन में हिंसा, उपेक्षा, घरेलू तनाव या नशे जैसी परिस्थितियां झेली थीं, उनमें बड़े होने के बाद गंभीर बीमारियों का खतरा ज्यादा पाया गया.
जेएएमए पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च में भी बचपन के ट्रॉमा और ऑटोइम्यून बीमारियों के बीच संबंध देखा गया. इन स्टडी ने डॉक्टरों के सोचने का तरीका बदल दिया. अब ट्रॉमा को सिर्फ मानसिक याद नहीं बल्कि शरीर पर असर डालने वाली बॉयोलॉजिकल स्थिति माना जा रहा है.

