उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पति की ओर से भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की है कि पत्नी को गरिमा के साथ जीने और पति की आर्थिक स्थिति के अनुसार जीवन का आनंद लेने का अधिकार है. आर्थिक रूप से अपनी पत्नी को सहारा देने का विधिक दायित्व पति का है.ये मामला हल्द्वानी के निवासी भारतीय सेना के एक सिपाही से जुड़ा हुआ है. इसमें जवान की तरफ से हल्वानी कोर्ट के आदेश को आर्थिक आधार पर चुनौती दी गई थी. इसमें  अलग रह रही पत्नी को भरणपोषण के लिए कोर्ट ने 10 हजार रुपये प्रति महीना देने का आदेश दिया था.

जवान ने बतायी थी ये मजबूरी

इस पर याचिकाकर्ता जवान ने कहा था कि वह फिलहाल हाई रिस्क वाले क्षेत्र में तैनात है और उसकी सैलरी 92 हजार रुपये है. उन्होंने कहा कि पीएफ, बीमा और लोन की किस्तों जैसी कटौतियों के बाद उसके पास सीमित राशि ही बचती है. उसने ये भी बताया कि हाई रिस्क वाली पोस्टिंग से हटने के बाद उसका वेतन घटकर करीब 72 हजार रुपये रह जाएगा.

कोर्ट ने कहा- 10 हजार की रकम बड़ी नहीं

जवान ने आगे बताया कि आर्थिक उत्तरदायित्व के रूप में अपनी मां और भाई की मदद करने का जिम्मा भी उसी पर है. परिवार न्यायलय ने उनके इन तथ्यों पर विचार नहीं किया. जस्टिस आलोक मेहरा की एकलपीठ ने परिवार न्यायालय के आदेश को यथावत रखते हुए माना कि जवान की मानी गई कमाई को देखते हुए अंतरिम भरणपोषण के 10 हजार रुपये की राशि अधिक या मनमानीपूर्ण नहीं लगती. पत्नी के भरण पोषण मांगने का अधिकार सही है.

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