राम मंदिर चंदा-चढ़ावा चोरी की कथित जांच कर रहे विशेष जांच दल की ‘परम गोपनीय’ रपट सार्वजनिक हो गई। रपट पर साफ अक्षरों में लिखा है-‘परम गोपनीय।’ फिर यह अंतरिम रपट राम मंदिर ट्रस्ट के न्यासियों के पास कैसे पहुंची? वहां से कई टीवी चैनलों को रपट कैसे मिली? यकीनन यह कानूनन अपराध का मामला है। रपट को उप्र सरकार ‘सार्वजनिक’ करती या ट्रस्ट को सार्वजनिक करने की अनुमति देती, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। ‘परम गोपनीय’ रपट को चोर दरवाजे से सार्वजनिक किया गया, लिहाजा खुलासा हो गया कि विशेष जांच दल ने शुरुआती जांच में क्या पकड़ा, किन्हें ‘काली भेड़’ करार दिया गया और यह चोरी-डकैती कांड कैसे अंजाम दिया गया? ट्रस्ट के महासचिव रहे चंपत राय बंसल और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफों से ही राम मंदिर के भीतर के चोरी-डकैती कांड का पटाक्षेप नहीं हुआ है। विशेष जांच दल की सार्वजनिक रपट पर ही कई सवाल हैं। रपट में चंपत राय, कोषाध्यक्ष गोविंद देव, विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव आदि का उल्लेख क्यों नहीं है? चंपत राय तो ‘प्रमुख खलनायक’ के तौर पर सामने आए हैं, क्योंकि उनके हस्तक्षेप से ही, उनके ड्राइवर टिन्नू यादव को, हुंडियों की चाबियां दी गईं! टिन्नू को कोई प्राधिकार ट्रस्ट ने नहीं दिया था, फिर वह एक सक्षम अधिकारी की तरह व्यवहार क्यों करता रहा? हालांकि विशेष जांच दल अभी टिन्नू यादव की और जांच-पड़ताल करेगा। फिलहाल वह न्यायिक हिरासत में जेल के भीतर है। सवाल यह भी है कि ट्रस्ट ने राम मंदिर के व्यवस्थापक रहे गोपाल राव को अचानक बाहर का रास्ता क्यों दिखा दिया? चंपत और अनिल पर लगे गंभीर आरोप उन पर नहीं थे। वह भी राम मंदिर की व्यवस्था में आरएसएस के एक प्रमुख चेहरा थे।

वह ट्रस्ट की बैठक से पहले अचानक बेंगलुरु गए और संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबले से मिले। क्यों मिले, इसका कोई खुलासा नहीं है। विशेष जांच दल ने आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह से जो कागजात मांगे थे, वे जांच दल को सौंपे गए, लेकिन अंतरिम रपट में घोटालास्पद भूमि-सौदों का कोई जिक्र तक नहीं किया गया। क्या जांच दल ने मान लिया कि चंपत राय और अनिल मिश्रा ने बिल्कुल ईमानदार जमीन-सौदे किए थे? इंजीनियर दीनानाथ वर्मा ने यह तथ्य बेनकाब किया था कि अनिल मिश्रा निर्माण-कार्यों पर 40 फीसदी कमीशन मांगते थे, लिहाजा फर्जी बिल भी बनाए गए। महिपाल सिंह भी राम मंदिर में लेखाधिकारी थे, जिन्होंने चोरी और दूसरी गड़बडिय़ों को लेकर चंपत राय और अनिल मिश्रा को अवगत कराया था। उन्हें ही नौकरी से निकाल दिया गया। विशेष जांच दल ने इन दोनों के बयान भी दर्ज क्यों नहीं किए? वे चोरी-डकैती के सुराग खोलने में एक महत्वपूर्ण स्रोत साबित हो सकते थे। सार्वजनिक रपट में खुलासा है कि बीती 5 जून की छापेमारी में 78.94 लाख रुपए बरामद किए गए थे। यह नकदी बरामदगी 21 दिन तक कृष्ण मोहन के घर एक संदूक में रखी गई। कृष्ण मोहन को अब ट्रस्ट का अंतरिम महासचिव बनाया गया है। क्या कोई व्यक्ति बरामदगी को अपने पास रख सकता है? यकीनन ये अपराध का मामला है, लेकिन जांच दल ने इस दृष्टि से आकलन नहीं किया। रपट से ऐसा नहीं लगता कि चोरी-डकैती कांड में दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा, जैसा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया था। इसी बीच चंपत राय का राम-भक्तों के नाम एक पत्र भी सार्वजनिक हुआ है, जिसमें उन्होंने अनिल मिश्रा और भारतीय स्टेट बैंक के बीच करार को ‘अवैध’ करार दिया है। उनका कहना है कि इस करार की सम्यक जानकारी उन्हें नहीं दी गई और करार पर महासचिव के नाते उनके दस्तखत होने चाहिए थे। अब चंपत अनिल मिश्रा और बैंक को ‘खलनायक’ बनाने के मूड में लगते हैं। वैसे उन्होंने कहा है कि विशेष जांच दल की अंतिम रपट के बाद ही वह अपना पक्ष रखेंगे। रपट से साफ है कि चंपत राय और गोविंद देव के खिलाफ किसी भी तरह का केस बनाए जाने के आसार नहीं हैं और प्राथमिकी तो अभी तक दर्ज नहीं की गई है। अभी जांच दल को उन 113 करोड़ रुपए के हिसाब की भी जांच करनी है, जो प्राण-प्रतिष्ठा के मद्देनजर खर्च कर दिए गए। यह कोई सामान्य खर्च नहीं है। इस मामले में निष्पक्ष जांच की जरूरत है और इसमें जो दोषी पाया जाए, उस पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए, अन्यथा जांच का कोई लाभ नहीं मिलेगा और विपक्ष को एनडीए सरकार पर हमले का मौका मिल जाएगा। योगी सरकार बार-बार दावे कर रही है कि इस मामले में निष्पक्ष जांच की जाएगी, लेकिन व्यवहार में भी यह झलक मिलनी चाहिए।

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