भारतीय परिस्थितियों को देखते हुए स्पष्ट है कि न तो पूर्ण स्वतंत्रता उपयुक्त होगी और न ही वर्तमान व्यवस्था की सभी कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता है। लोकतंत्र की सफलता केवल कानूनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि राजनीतिक नैतिकता, जन-जागरूकता और संस्थागत निष्पक्षता पर भी आधारित होती है। अंतत: दलबदल का प्रश्न केवल सांसदों-विधायकों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के विश्वास का प्रश्न है…

भारतीय लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का दायित्व केवल चुनाव जीतकर सदन तक पहुंचना नहीं होता, बल्कि उस जनादेश और विश्वास का सम्मान करना भी होता है जिसके आधार पर मतदाता उन्हें चुनते हैं। किंतु पिछले कुछ वर्षों में देश की राजनीति में दलबदल की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ी हैं, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों, राजनीतिक नैतिकता और जनमत की गरिमा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हाल के महीनों में पंजाब, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में बड़ी संख्या में सांसदों और विधायकों द्वारा पार्टी बदलने की घटनाओं ने इस बहस को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। राजनीतिक दलों के बीच नेताओं का आना-जाना कोई नई घटना नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय राजनीति में दलबदल होता रहा है, लेकिन वर्तमान दौर में इसकी प्रकृति और स्वरूप बदल गया है। पहले व्यक्तिगत स्तर पर दलबदल होता था, जबकि अब बड़ी संख्या में सांसदों और विधायकों को एक साथ संगठित करके कानूनी प्रावधानों का लाभ उठाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। राजनीतिक विश्लेषक इसे ‘सामूहिक दलबदल’ या ‘स्मार्ट मर्जर’ की राजनीति के रूप में देख रहे हैं।

दलबदल के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। सत्ता के निकट पहुंचने की इच्छा, धन पिपासा, मंत्री पद या संगठनात्मक जिम्मेदारियों की आकांक्षा, चुनावी टिकट की अनिश्चितता, पार्टी नेतृत्व से असंतोष, वैचारिक मतभेद अथवा क्षेत्रीय विकास के नाम पर सत्तारूढ़ दल से निकटता, ये सभी कारण अक्सर सामने आते हैं। किंतु लोकतांत्रिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या कोई जनप्रतिनिधि उस राजनीतिक दल को छोड़ सकता है जिसके चुनाव चिन्ह और विचारधारा के आधार पर जनता ने उसे चुना था। इसी समस्या को रोकने के लिए वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की दसवीं अनुसूची में दलबदल विरोधी कानून लागू किया गया था। इसका उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और व्यक्तिगत लाभ के लिए होने वाले दलबदल को रोकना था। इस कानून के अनुसार यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है अथवा पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है। हालांकि समय के साथ इस कानून की सीमाएं भी सामने आईं। प्रारंभ में एक-तिहाई सदस्यों के टूटने पर छूट का प्रावधान था, जिसे 91वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा समाप्त कर दिया गया। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक सामूहिक रूप से किसी अन्य दल में विलय करते हैं तो उन्हें अयोग्यता से संरक्षण मिल जाता है। यही प्रावधान आज सबसे अधिक विवाद का विषय बना हुआ है। आलोचकों का तर्क है कि यह व्यवस्था व्यक्तिगत दलबदल को तो दंडित करती है, लेकिन सामूहिक दलबदल को वैधता प्रदान कर देती है। 2023 में महाराष्ट्र से जुड़े सुभाष देसाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल विधायकों या सांसदों का समूह स्वयं को मूल पार्टी नहीं मान सकता। वैध विलय के लिए मूल राजनीतिक दल और विधायी दल दोनों स्तरों पर निर्धारित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है। दलबदल का मुख्य कारण यह है कि राजनीतिक दल और नेता कानून की उन खामियों का लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं जो सामूहिक विलय को संरक्षण प्रदान करती हैं। यही कारण है कि आज संविधान विशेषज्ञ, विधि आयोग और चुनाव सुधारों के पक्षधर व्यापक संशोधन की मांग कर रहे हैं। कई विशेषज्ञों का मत है कि यदि कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है तो उसकी सदस्यता स्वत: समाप्त हो जानी चाहिए और उसे पुन: जनता के बीच जाकर चुनाव लडऩा चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि उसके निर्णय को वास्तव में जनता का समर्थन प्राप्त है या नहीं। कुछ विशेषज्ञ ऐसे नेताओं पर पांच वर्ष तक चुनाव लडऩे अथवा मंत्री बनने पर रोक लगाने की भी वकालत करते हैं। इससे राजनीतिक लाभ के लिए किए जाने वाले अवसरवादी दलबदल में कमी आ सकती है। एक अन्य महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि दलबदल संबंधी मामलों का निर्णय स्पीकर के बजाय किसी स्वतंत्र न्यायिक अधिकरण अथवा चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था को सौंपा जाए। वर्तमान व्यवस्था में अक्सर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं क्योंकि स्पीकर स्वयं किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं। दुनिया के अन्य लोकतंत्रों के अनुभव भी इस बहस को नई दिशा देते हैं। ब्रिटेन में सांसदों को पार्टी बदलने की स्वतंत्रता है, लेकिन वहां राजनीतिक नैतिकता और मतदाताओं की जवाबदेही इतनी मजबूत है कि दलबदल करने वालों को अक्सर जनता चुनाव में दंडित कर देती है। अमरीका में भी दलबदल विरोधी कानून नहीं है।

भारतीय परिस्थितियों को देखते हुए स्पष्ट है कि न तो पूर्ण स्वतंत्रता उपयुक्त होगी और न ही वर्तमान व्यवस्था की सभी कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता है। लोकतंत्र की सफलता केवल कानूनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि राजनीतिक नैतिकता, जन-जागरूकता और संस्थागत निष्पक्षता पर भी आधारित होती है। अंतत: दलबदल का प्रश्न केवल सांसदों और विधायकों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के विश्वास का प्रश्न है। यदि मतदाता किसी विशेष विचारधारा, नेतृत्व और चुनाव चिन्ह को ध्यान में रखकर अपना मत देता है, तो उस जनादेश का सम्मान होना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता परिवर्तन जनता के मत से हो, न कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के सामूहिक पाला बदलने से। जनता को भी चाहिए कि वह चुनाव के समय दलबदलू नेताओं को हराकर अच्छा सबक सिखाए। यह समय की मांग है कि दलबदल विरोधी कानून की समीक्षा कर उसे अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनहितकारी बनाया जाए, ताकि लोकतंत्र की आत्मा और मतदाता के विश्वास, दोनों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।-अनुज आचार्य

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