युद्ध का तनाव इतना बढ़ चुका है कि ईरान परमाणु बम बनाने की सोचने लगा है। वह परमाणु अप्रसार सन्धि (एनपीटी) से भी बाहर आ सकता है। फिलहाल ऐसी संभावनाएं और आशंकाएं जताई जा रही हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इन्हें ही परमाणु बम बनाने का आधार मान रहे हैं। रूस ने भी कई बार बयान दिया है कि हालात ईरान को एटम बम बनाने को बाध्य कर रहे हैं। इस संदर्भ में रक्षा विशेषज्ञ ईरान की तुलना उत्तर कोरिया से कर रहे हैं। उत्तर कोरिया 1985 में एनपीटी का सदस्य था। फिर भी उसने रहस्यमयी परमाणु परीक्षण किए और छोटे-छोटे बम भी बना लिए। उसने 2003 में एनपीटी को छोड़ दिया। आज वह सरेआम विनाशक मिसाइलों के परीक्षण कर रहा है। उसके पास कितने परमाणु बम हैं, उसका सत्यापित हिसाब किसी के पास भी नहीं है, लेकिन अमरीका और यूरोपीय देश उससे आशंकित रहते हैं। क्या ईरान युद्ध ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है कि ईरान ‘उत्तर कोरिया’ बन सकता है? वैसे ईरान के पास करीब 440 किग्रा. संवर्धित यूरेनियम बताया जाता है। यह संवर्धन 60 फीसदी से अधिक है, जिससे छोटे एटम बम बनाए जा सकते हैं! जब तक अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ईरान के परमाणु कार्यक्रम का निरीक्षण कर रही थी, उसके आधार पर अब भी आकलन किए जा रहे हैं कि ईरान ने परमाणु बम नहीं बनाया है। दिवंगत सुप्रीम लीडर खामेनेई भी घोषित रूप से परमाणु बम बनाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन मौजूदा सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की इस बाबत सोच अभी तक अस्पष्ट है। ईरान के सबसे बड़े और प्रमुख परमाणु केंद्र ‘नतांज’ सहित फोर्डो और इस्फहान परमाणु केंद्रों में यूरेनियम संवर्धन अब भी जारी है, ऐसी खबरें आती रही हैं। ये जमीन के बहुत नीचे और सुरक्षित परमाणु केंद्र हैं, जिन्हें अमरीका और इजरायल अभी तक नष्ट करने में नाकाम रहे हैं। अमरीकी सेना ने जिस बुशहर परमाणु प्लांट के निकट अभी हवाई हमले, बम विस्फोट किए हैं, वह ईरान का एकमात्र सक्रिय परमाणु बिजलीघर है। इस 1000 मेगावाट के संयंत्र को जर्मनी ने बनाना शुरू किया था, लेकिन वह अधूरा छोड़ कर भाग गया। फिर रूस ने इसे अंतिम रूप दिया। यह ईरान का सर्वाधिक संवेदनशील परमाणु प्लांट है।

राष्ट्रपति टं्रप ने बिजली संयंत्रों और महत्वपूर्ण पुलों पर हमले करने का ऐलान किया है। बीते गुरुवार को अमरीकी हमले में उन रेल पुलों को तबाह किया गया है, जो तेहरान और मशहद को जोड़ते हैं। मशहद में ही खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया गया है। अमरीकी हमलों में पहली बार चाबहार बंदरगाह के टै्रफिक कंट्रोल टॉवर और आईआरजीसी के इमाम अली बेस को निशाना बनाया गया है। जाहिर है कि नुकसान भी हुआ है। इस बंदरगाह को विकसित करने में भारत ने भी 1400 करोड़ रुपए का निवेश कर रखा है, लिहाजा हमारा भी नुकसान हुआ है। बहरहाल बीते दिनों एक खबर आई थी कि बुशहर में ही करीब 2100 किग्रा. प्लूटोनियम का भंडार है। बेशक इससे 200 परमाणु बम बनाए जा सकते हैं। यह खबर फोब्र्स के अलावा रॉयटर्स और गूगल ने भी जारी की थी। व्याख्या की गई कि ईरान यथाशीघ्र परमाणु शक्ति बनना चाहता है। अस्तित्व बचाने का यही आखिरी विकल्प उसे लगता है। इसे ईरान ‘आत्मरक्षा का कवच’ करार देता है, लिहाजा उसने परमाणु केंद्रों और ठिकानों पर सैन्य तैनाती करना भी शुरू कर दिया है। ‘नतांज’ केंद्र के तहत यूरेनियम जमीन के 300 फुट नीचे दबा है। जो सवंर्धित किया जा रहा है, उसे अन्यत्र शिफ्ट किया जा रहा है। यह खुलासा सेटेलाइट तस्वीरों से भी हुआ है। ईरान का दावा है कि प्लूटोनियम से भी खतरनाक, विनाशक हथियार बनाए जा सकते हैं। रिएक्टर ग्रेड प्लूटोनियम से भी एटम बम बनाया जा सकता है। इस तरह संवर्धित यूरेनियम और प्लूटोनियम को मिला कर ईरान के पास करीब 2550 किग्रा. विस्फोटक सामग्री है। इस मात्रा से वह व्यापक नरसंहार कर सकता है और परमाणु बम के विकिरण से कितनी पीढिय़ां ‘विकलांग’ होंगी, इसका अनुमान लगाना संभव नहीं है। क्या संयुक्त राष्ट्र और आईएईए ईरान को परमाणु बम बनाने से रोक सकते हैं? अब युद्ध का फोकस परमाणु कार्यक्रम ही है। होर्मुज तो आंशिक तौर पर आज भी खुला है और 10-12 जहाज-टैंकर ईरान ने गुजरने दिए हैं। टैंकर टै्रकर्स के मुताबिक, ईरान के सुपर टैंकर के जरिए करीब 1 करोड़ बैरल तेल सप्लाई किया गया है। इस तेल की कीमत 7500 करोड़ रुपए बताई जा रही है। ज्यादातर तेल चीन रवाना किया गया है। देर-सबेर होर्मुज का मुद्दा बिल्कुल सुलझना ही है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम-प्लूटोनियम का मुद्दा इतना पेचीदा हो गया है कि ईरान मानने को राजी नहीं है। अमरीका ही नहीं, इजरायल भी अड़े हैं कि किसी भी सूरत में ईरान को परमाणु बम बनाने नहीं देंगे। तो अमरीका-ईरान में कभी भी समझौता किन शर्तों पर होगा, यह बिल्कुल अनिश्चित है? बहरहाल, विश्व को शांति की जरूरत है।

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