भारत में हजारों गांव हैं और लगभग हर गांव की अपनी अलग पहचान, संस्कृति और परंपरा है. कहीं आज भी सदियों पुराने रीति-रिवाज निभाए जाते हैं, तो कहीं ऐसे नियम लागू हैं जिन्हें जानकर लोग हैरान रह जाते हैं. कई गांव अपनी अनोखी बोली, धार्मिक मान्यताओं, खानपान और सामाजिक व्यवस्था के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं. इन्हीं में से एक है हिमाचल प्रदेश का मलाना गांव (Malana Village), जिसे भारत के सबसे रहस्यमयी और अनोखे गांवों में गिना जाता है. यहां के नियम-कानून इतने अलग हैं कि पहली बार आने वाला हर पर्यटक हैरान रह जाता है.

गांव के लोगों को छूने पर देना पड़ता है जुर्माना
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित मलाणा गांव में बाहरी लोगों के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं. यहां आने वाले पर्यटकों को गांव की दीवारों, मंदिरों, घरों या किसी भी स्थानीय सामान को छूने की अनुमति नहीं होती. यहां तक की पर्यटकों को गांव के लोगों को भी छूना मना है. गांव के कई स्थानों पर साफ-साफ नोटिस लगे हैं कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति यहां की किसी भी चीज को छूता है, तो उस पर 1,000 रुपये से लेकर 2,500 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. यही वजह है कि यहां आने वाले लोग काफी सावधानी बरतते हैं. यहां तक कि अगर किसी पर्यटक को दुकान से कोई सामान खरीदना हो, तो वह सीधे सामान को हाथ नहीं लगाता. ग्राहक पैसे दुकान के बाहर रख देता है और दुकानदार सामान बाहर जमीन पर रख देता है, जिसे बाद में पर्यटक उठा लेता है.

सिकंदर के सैनिकों से जुड़ा है गांव का नाम
मलाणा गांव को लेकर एक बेहद दिलचस्प मान्यता भी है. कई शोधकर्ताओं का मानना है कि जब 326 ईसा पूर्व सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया, तब उसकी सेना के कुछ सैनिक यहीं आकर बस गए थे. इसी वजह से गांव के कुछ लोग खुद को सिकंदर के सैनिकों का वंशज मानते हैं. हालांकि, इस दावे के पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन गांव की बोली में कुछ ऐसे शब्द पाए जाते हैं, जिन्हें ग्रीक भाषा से मिलता-जुलता बताया जाता है.कहा जाता है कि सिकंदर के जमाने की एक तलवार भी इसी गांव के मंदिर में रखी हुई है. यही कारण है कि मलाणा को कई लोग “सिकंदर के सैनिकों का गांव” भी कहते हैं.

यहां नहीं चलता भारतीय कानून
मलाणा गांव की सबसे बड़ी खासियत इसकी अनोखी प्रशासनिक व्यवस्था है. कहा जाता है कि इस गांव का अपना संविधान है और यहां के लोग सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार गांव को चलाते हैं. गांव में अपनी संसद भी है, जिसमें दो सदन हैं- एक बड़ा और एक छोटा. बड़े सदन में कुल 11 सदस्य होते हैं. इनमें से 8 सदस्यों का चुनाव गांव के लोग करते हैं, जबकि 3 सदस्य स्थायी होते हैं, जिनमें कारदार, गुर और पुजारी शामिल हैं. छोटे सदन में गांव के प्रत्येक परिवार का सबसे बुजुर्ग सदस्य शामिल होता है. अगर बड़े सदन के किसी सदस्य का निधन हो जाए, तो पूरे सदन का दोबारा गठन किया जाता है. गांव में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने अधिकारी और स्थानीय व्यवस्था भी मौजूद है. इस गांव में किसी भी विवाद या महत्वपूर्ण मामले पर पहले संसद में चर्चा होती है. अगर संसद किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाती, तो अंतिम फैसला जमलू देवता के नाम पर लिया जाता है. गांव के लोग जमलू ऋषि को अपना आराध्य देव मानते हैं और उनका निर्णय सभी के लिए अंतिम माना जाता है.

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