अब अल्पकालिक वृद्धि के पीछे भागने के बजाय, भारत को मध्यम अवधि की राजकोषीय और बाह्य स्थिरता को सुरक्षित रखना होगा। लंबे समय से लंबित सुधारों को आगे बढ़ाना होगा। एआई जैसे उच्च-स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना और नियामक बाधाओं को आसान बनाना होगा…

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्राओं के दौरान इन तीनों देशों के साथ हुई व्यापारिक वार्ताओं से निर्यात के नए अध्यायों की संभावनाएं आगे बढ़ी हैं। 6 से 8 जुलाई को इंडोनेशिया यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुबियांतो के साथ प्रभावी व्यापार वार्ता की। दोनों देशों ने आपसी व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करने पर सहमति जताई। भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं को इंडोनेशियाई बाजार में विस्तार देने पर बातचीत हुई। भारतीय जेनेरिक दवाओं के इंडोनेशिया में निर्यात को बढ़ाने के लिए नियामकीय बाधाओं को दूर करने पर समझौता हुआ। भारतीय कृषि उत्पादों और कृषि तकनीक के निर्यात के लिए नए रास्ते खोले गए। आस्ट्रेलिया में 8 से 10 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी के बीच मुख्य रूप से आर्थिक और व्यापारिक हितों पर चर्चा हुई। दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार को पूरी तरह लागू करने के लिए इस समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने की समयसीमा तय की गई। भारत के इलेक्ट्रॉनिक और घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती देने के लिए ऑस्ट्रेलिया से लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की निर्बाध आपूर्ति पर समझौता हुआ। परमाणु और हरित ऊर्जा के साथ-साथ भारत के कपड़ा, चमड़ा, आभूषण और इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात पर सकारात्मक बातचीत हुई।

प्रधानमंत्री मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा 10 से 11 जुलाई तक हुई। इस दौरान ऐतिहासिक व्यापारिक वार्ता हुई। 40 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा थी, जिसका मुख्य एजेंडा व्यापारिक गतिरोधों को तोडऩा था। दोनों देशों ने आगामी वर्षों के लिए व्यापार का एक स्पष्ट खाका तैयार किया। दोनों देशों के बीच व्यापार में आने वाली बाधाओं (टैरिफ और गैर-टैरिफ) को हटाने पर गंभीर चर्चा हुई। सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को आसान बनाने पर सहमति बनी ताकि भारत की सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं, दवाओं और प्रसंस्कृत खाद्य (कृषि उत्पादों) का न्यूजीलैंड में निर्यात तुरंत बढ़ाया जा सके। गौरतलब है कि इस समय जब वैश्विक निर्यात की वृद्धि दर में कमी आते हुए दिखाई दे रही है, तब भारत निर्यात बढ़ाने के साथ इस वर्ष निर्यात के ऊंचे लक्ष्य को प्राप्त करने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बोर्ड ऑफ ट्रेड की बैठक में सभी राज्यों के औद्योगिक संगठनों से कहा कि सरकार के द्वारा निर्यात की राह को आसान बनाया जा रहा है और भारत दुनिया के विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कुल एक लाख करोड़ डॉलर (एक ट्रिलियन डॉलर) के निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। चालू वित्त वर्ष में वस्तु निर्यात का लक्ष्य लगभग 530 अरब डॉलर (16-17 प्रतिशत वृद्धि) और सेवा निर्यात का लक्ष्य लगभग 470 अरब डॉलर (11-12 प्रतिशत वृद्धि) अनुमानित है। पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल निर्यात 863 अरब डॉलर था। यह बात महत्वपूर्ण है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में वस्तु निर्यात में 15 प्रतिशत और सेवा निर्यात में 11 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई है। इस समय सरकार के द्वारा जहां निर्यात बढ़ाने की रणनीति के तहत निर्यातकों को विभिन्न लाभ दिए जा रहे हैं, वहीं अब सरकार छोटे उद्योगों के अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन का खर्च ‘निर्यात संवर्धन मिशन’ के तहत उठाएगी।

सरकार के द्वारा सतत टेक्सटाइल, टेक्निकल टेक्सटाइल, परफॉर्मेंस टेक्सटाइल और मेडिकल टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में उभरते अवसरों को चिन्हित किया गया है। सरकार के द्वारा एफटीए के इस्तेमाल हेतु फ्रेमवर्क की निर्धारित नई रणनीति के तहत जिन क्षेत्रों में भारत पहले से ही उल्लेखनीय रूप से निर्यात कर रहा है, उन क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाना, तरजीह शुल्क मिले हुए सेक्टर में निर्यात का विविधीकरण करना, गैर शुल्क बाधाएं कम करना तथा आपूर्ति से जुड़ी कमियों को दूर करना शामिल हैं। पिछले माह भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (सीइटीए) की समीक्षा के बाद कहा गया है कि यह समझौता 15 जुलाई से कार्यान्वित होगा। इससे भारत और ब्रिटेन दोनों लाभान्वित होंगे। खासतौर से भारत से निर्यात बढ़ेंगे एवं भारतीय पेशेवरों के लिए ब्रिटेन के बाजार में अवसर बढ़ेंगे। विगत 17 जून को फ्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ द्विपक्षीय बैठक की। इस बैठक में ट्रंप ने कहा कि अमरीका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार समझौता जल्द आकार लेगा। यह भी महत्वपूर्ण है कि जी-7 सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री मोदी के साथ यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने वार्ता के दौरान कहा कि यूरोपीय संघ के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता जल्द ही कार्यान्वित होगा। नि:संदेह भारत एफटीए की डगर पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत और न्यूजीलैंड के बीच एक ऐतिहासिक एफटीए पर हस्ताक्षर हुए हैं और यह जल्द ही पूर्णतया लागू होगा। न्यूजीलैंड के साथ किए गए इस एफटीए का अत्यधिक मजबूत पक्ष भारत से सेवा निर्यात बढ़ाना और भारत से पेशेवरों को न्यूजीलैंड में अच्छे अवसरों के लिए आगे बढ़ाना भी है। यह एफटीए भारत की प्रतिभाओं, स्टार्टअप्स और नवाचार के लिए एक मजबूत बुनियाद प्रदान करता है। साथ ही अब ओमान, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टाइन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के साथ सफलतापूर्वक कार्यान्वित हो रहे एफटीए के और अधिक लाभ मिलते हुए दिखाई देंगे। यह भी कोई छोटी बात नहीं है कि इस समय दुनिया के विकसित और विकासशील देश तेजी से भारत के साथ कारोबार बढ़ाने के मद्देनजर आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में भारत को निर्यात बढ़ाने के लिए निर्यात के नए बाजार और निर्यात विविधता की रणनीति के साथ आगे बढऩा होगा। भारत के द्वारा निर्यात बढ़ाने के लिए विशेष रूप से चिन्हित किए गए नए देशों के निर्यात बाजारों में अपनी निर्यात पैठ बनाने के हरसंभव उपाय करने होंगे।

वर्तमान में भारत से कुल निर्यात का अधिकांश भाग अमरीका, यूएई, ब्रिटेन, सऊदी अरब और चीन जैसे कुछ प्रमुख देशों पर निर्भर है। अतएव अब ऐसे देशों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है, ताकि किसी एक या कुछ देशों में आर्थिक सुस्ती का सीधा असर भारत पर न पड़े। अब पारंपरिक बाजारों के अलावा, उत्तर पूर्व एशिया और पूर्वी अफ्रीका जैसे नए उभरते क्षेत्रों तक निर्यात पहुंच तेजी से बढ़ाना होगी। निर्यात विविधीकरण पर भी ध्यान देना होगा। हमें निर्यात बढ़ाने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ कई बातों पर ध्यान देना होगा। अब अल्पकालिक वृद्धि के पीछे भागने के बजाय, भारत को मध्यम अवधि की राजकोषीय और बाह्य स्थिरता को सुरक्षित रखना होगा। लंबे समय से लंबित सुधारों को आगे बढ़ाना होगा। एआई जैसे उच्च-स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना और नियामक बाधाओं को बहुपक्षीय प्रयासों के माध्यम से आसान बनाना होगा, जो सीमाओं के पार सेवा निर्यात को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकें। निर्यातकों की दिक्कतों को कम करना होगा। ये दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, वरन् निर्यात पर लगाए गए एंटी-डंपिंग शुल्क से भी संबंधित हैं। घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और गैर-टैरिफ बाधाएं दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।-डा. जयंती लाल भंडारी

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