पांच दिन, तीन रातें और कुल 310 विनाशक, विध्वंसक हमले….! क्या इन हमलों और बारूदी विस्फोटों के बाद किसी का अस्तित्व जिंदा रह सकता है? यकीनन ईरान अब भी तैनात, मोर्चाबंद है और अमरीकी सेना के हमलों के पलटवार में खाड़ी देशों में सक्रिय अमरीका के सैन्य अड्डों को तबाह भी कर रहा है। यदि अमरीकी हमलों ने चाबहार, सिरिक, असालुयेह, यासूज, कोनारक, बुशहर आदि बंदरगाहों, सैन्य और परमाणु संयंत्र के करीबी ठिकानों पर विनाशक प्रहार करके बुनियादी ढांचे को बर्बाद किया है, तो खाड़ी देशों में अमरीका के 17 सैन्य बेस ईरान ने इस कदर तबाह किए हैं कि आने वाले कुछ वक्त तक वहां से ऑपरेशन करना मुनासिब नहीं होगा। अब यह युद्ध अनैतिकता, अहंकार, सभ्यताओं के टकराव और ईसाई बनाम शिया मुसलमान का युद्ध बनता जा रहा है। युद्ध थोपने के अमरीका-इजरायल के जो मंसूबे, मकसद थे, वे नाकाम होकर काफी पीछे छूट गए हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग पर युद्ध केंद्रित हो गया है। ईरान ने ओमान तट पर एक कार्गो जहाज पर हमला किया। पलटवार में अमरीकी हमलों ने ईरान में धुआं-धुआं कर दिया। ईरान खंडहर में तबदील होता जा रहा है। राष्ट्रपति टं्रप ईरानी सभ्यता को ही मिटा देने पर आमादा हैं। वह ईरान को पाषाणकाल में धकेल देना चाहते थे, उन्होंने ऐसा बयान कई बार दोहराया था। अब टं्रप का दावा है कि होर्मुज खुला है, जहाज-टैंकर आ-जा सकते हैं, लेकिन ईरान के आईआरजीसी ने ऐलान किया है कि होर्मुज फिलहाल बंद है। वैसे भी जो जहाज होर्मुज पार कर निकलना चाहते हैं, वे ईरानी अथॉरिटी से इजाजत लें। यदि होर्मुज के बजाय ओमान रूट से जहाज-टैंकर गुजरना चाहेंगे, तो उन पर मिसाइल-ड्रोन हमले किए जाएंगे।

बीते 15 दिनों में 70-80 जहाज चीन की ओर निकले हैं, उन पर हमले क्यों नहीं किए गए? बीती 10 जुलाई को 19 जहाज होर्मुज से निकले थे, जाहिर है कि उन्होंने ‘ईरानी टोल’ दिया होगा! बहरहाल जिस जहाज पर ईरान ने हमला किया था और अमरीका ने पलटवार में 140 हमले किए, उस जहाज पर साइप्रस देश का झंडा लगा था, लेकिन चालक दल में 11 भारतीय भी थे। ओमान ने लाइफ बोट के जरिए 10 भारतीयों सहित कुल 23 नाविकों को बचाया, लेकिन एक भारतीय नाविक लगातार लापता बताया जा रहा है। असीम समंदर में ‘लापता’ के मायने समझे जा सकते हैं। इससे पहले, जून माह में ही, अमरीकी सेना ने हमला कर 3 भारतीय नाविकों की ‘हत्या’ कर दी थी। हम इसे ‘हत्या’ ही मानते हैं, क्योंकि आज के विकसित, तकनीकी सम्पन्न परिवेश में तमाम डाटा उपलब्ध होता है कि किस जहाज पर क्या माल लदा है? उसका गन्तव्य क्या है? उसके नाविकों में किस देश के नागरिक हैं? सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कार्गो जहाज को लगातार ‘चेतावनी’ दी जाती है और उसके जवाब की प्रतीक्षा की जाती है। एकदम जहाज के इंजन रूम पर मिसाइलें दागने का समुद्री आवागमन की कोई भी वैश्विक रणनीति नहीं है। इस युद्ध में सब कुछ अंधाधुंध चल रहा है। कोई नैतिकता नहीं, कोई युद्ध नीति और आचार संहिता नहीं। अंतरराष्ट्रीय संगठन और संस्थाएं तो मृृतप्राय: हैं। बहरहाल खाड़ी देशों में ही 18,000 से अधिक भारतीय विभिन्न जहाजों पर नाविक का दायित्व निभा रहे हैं। विश्व भर के समंदर पर 3 लाख से अधिक भारतीय नाविक जहाजों का संचालन कर रहे हैं।

क्या वे सभी मरने के लिए जहाजों पर नौकरी कर रहे हैं? यदि आंख मूंद कर मिसाइल-ड्रोन दागे जाएंगे, तो समुद्री मार्ग ही ‘जहाजविहीन’ होने लगेगा। वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन का क्या होगा? देश भूखों मरने लगेंगे, बीमारी की स्थिति में दवाइयां नसीब नहीं होंगी, रक्षा उत्पाद, कृषि के अन्न, मशीनरी, दुर्लभ खनिज कैसे आ-जा सकेंगे? करीब 90 फीसदी वैश्विक व्यापार समुद्री मार्ग से ही होता है। भारत का करीब 95 फीसदी व्यापार मात्रा में और 70 फीसदी मूल्य के हिसाब से समुद्री मार्गों से ही संचालित होता है। क्या अमरीका और ईरान ऐसे व्यापक व्यापार को ठप कर देने पर आमादा हैं? हमारे विदेश मंत्रालय ने रस्मी बयान देकर जहाज पर हमले की निंदा तो की है, लेकिन हम अमरीका और ईरान को चेतावनी देने की स्थिति में नहीं है। यदि ये नाविक चीन के होते, तो अभी तक गदर मच गया होता! टं्रप और अमरीका तो बहुत दूर स्थित हैं, लिहाजा होर्मुज उनके लिए संकट का जरिया नहीं है, लेकिन अब होर्मुज नाक और अहंकार की लड़ाई का अड्डा बन गया है। उस पर कौन लगाम कसेगा, यह प्रश्न है।

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