प्रशांत किशोर बिहार में एक उपचुनाव लड़ेंगे, ताकि राजनीतिक जमीन का दावा किया जा सके। यह कदम उनकी नई पार्टी द्वारा विधानसभा चुनाव में पैर जमाने में विफल रहने के महीनों बाद उठाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में, चुनावी करारी हार के बाद, ममता बनर्जी की टी.एम.सी. बिखर रही है। यू.पी. में, जहां अगले साल के चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, सत्ताधारी भाजपा के आंतरिक झगड़े समाजवादी पार्टी की तुलना में अधिक सुर्खियां  बटोर रहे हैं, जो लगभग 2017 में सत्ता गंवाने के बाद से जनता की धारणा में निष्क्रिय है। ये छवियां हाल के समय की हैं-लंबे करियर वाले क्षेत्रीय दल/नेता शांत पड़े हैं, यहां तक कि जन सुराज जैसा नया दल, जो एक बिल्कुल नई शुरुआत के साथ आया था, उसे भी उसी अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है।  क्षेत्रीय पार्टी भाजपा की आक्रामक राजनीति के सामने बिखरती हुई दिखाई दे रही है, जिसे उसके ‘एक राष्ट्र’ के सिद्धांत, एकरूपता की ओर बढऩे के प्रयास और खेल के मैदान को अपने पक्ष में मोडऩे के लिए डर और प्रलोभन के उपयोग का समर्थन प्राप्त है।

संगठनात्मक मजबूती पर ध्यान न देने के कारण टी.एम.सी. ने अपनी महत्वपूर्ण निर्णय लेने की जगह राजनीतिक परामर्शदाता कंपनी आईपैक को सौंप दी। यह बदले में टी.एम.सी. के पुराने नेताओं द्वारा पार्टी छोडऩे के सिलसिले में योगदान दे रहा है। राष्ट्रीय पार्टियां भी इस क्षरण से प्रभावित हैं लेकिन क्षेत्रीय दलों की इसका सामना करने में असमर्थता अधिक स्पष्ट है। समस्या क्षेत्रीय दलों के अपने स्वयं के आत्मसमर्पण में भी निहित है, जो भाजपा के साथ उनके मुकाबले में अब उन्हें परेशान कर रही है। हाल ही में यू.पी. का दौरा करने पर इस बात से गहरा धक्का लगा कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा, 9 साल से अधिक समय से सत्ता से बाहर होने के बावजूद, अभी भी अपनी पुरानी छवि की कैदी बनी हुई है। अखिलेश को अभी भी व्यापक रूप से परिवार से घिरे नेता के रूप में देखा जाता है, सपा को उस मुस्लिम-यादव पार्टी के रूप में देखा जाता है, जो सत्ता में रहने पर कानूनविहीनता की अध्यक्षता करती है। 

ये असाधारण समय है, जब भाजपा विपक्ष की राजनीति के लिए जगहों को सिकोड़ रही है। लेकिन अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह, सपा इसके जवाब में एक असाधारण राजनीति पेश करने में असमर्थ रही है। यह सामान्य राजनीति के पैमाने पर भी कमतर साबित हुई है। इसने कोई नया राजनीतिक या आॢथक मॉडल सामने नहीं रखा। जमीन पर, एम.वाई (मुस्लिम-यादव) से पी.डी.ए. (पिछड़ा, दलित, अनुसूचित जाति/अल्पसंख्यक) की राजनीति में इसके घोषित बदलाव को एक पुराने, बहिष्कृत जातिगत अंकगणित के रूप के रूप में देखा जाता है। यह एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ है, जो एक स्तर पर व्यापक सामाजिक इंजीनियरिंग द्वारा इसे मात देता है और दूसरे स्तर पर ‘सबका साथ…’ का दावा करता है। 

भाजपा द्वारा तय नहीं की गई शर्तों पर भाजपा से लडऩे की असमर्थता, परिवार की राजनीति, एक जाति-एक समुदाय के जाल से बाहर निकलने में असमर्थता के अलावा, उन क्षेत्रीय दलों में आम है जो भाजपा के पक्ष में फीके पड़ते या उसकी ओर ङ्क्षखचते हुए दिखाई दे रहे हैं।फिलहाल, भले ही भाजपा के प्रभुत्व में दरारें दिखाई देने लगी हैं, लेकिन जिन पाॢटयों को राजनीतिक जगहों के खुलने से फायदा हो सकता था, वे दुर्भाग्य से इसके लिए तैयार नहीं हैं।-वंदिता मिश्रा

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