केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और एनसीपी (एसपी) के अध्यक्ष शरद पवार ने अपने-अपने स्तर पर ‘चाणक्य’ साबित कर दिया है। गृहमंत्री का ‘ऑपरेशन दो-तिहाई’ लगभग अंजाम तक पहुंच चुका है और पवार ने ‘परिसीमन संशोधन बिल’ को समर्थन का संकेत देकर अपने 8 सांसदों का दलबदल बचा लिया है। संभावनाएं बन रही हैं कि पवार एनडीए में भी शामिल हो सकते हैं, लेकिन उसके लिए प्रधानमंत्री मोदी के निर्देशानुसार गृहमंत्री शाह का आग्रह है कि एनसीपी के दोनों गुट आपस में विलय कर एक संगठित पार्टी बनाएं और फिर एनडीए का हिस्सा बनें। एनसीपी का जो गुट दिवंगत अजित पवार के नेतृत्व में टूटा था, वह महाराष्ट्र और केंद्र में एनडीए का हिस्सा है। चुनाव आयोग ने भी इसी गुट को ‘असली एनसीपी’ की मान्यता दी है, लेकिन मामला अब भी सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है। बहरहाल ‘ऑपरेशन दो-तिहाई’ प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और भाजपा के लिए ‘नाक का सवाल’ है, क्योंकि बीती 17 अप्रैल को ‘परिसीमन संशोधन बिल’ लोकसभा में परास्त हो गया था। मोदी सरकार के 12-साला कार्यकाल में यह पहली अत्यंत महत्वपूर्ण संसदीय पराजय थी, लिहाजा सरकार अब तभी यह संशोधन बिल संसद में लाएगी, जब लोकसभा में उसका दो-तिहाई बहुमत निश्चित हो जाएगा। संविधान संशोधन बिल को पारित कराने की यह संवैधानिक शर्त है कि दो-तिहाई बहुमत का समर्थन होना चाहिए। लोकसभा में फिलहाल 540 सदस्य हैं, जिसका दो-तिहाई 360 सांसद बनता है, लेकिन बिल पारित कराने की संवैधानिक, संसदीय व्यवस्था यह है कि मतविभाजन के समय जितने सांसद सदन में हैं, उनका दो-तिहाई बहुमत होना लाजिमी है, लेकिन सदन में कमोबेश 50 फीसदी सदस्य उपस्थित होने चाहिए।

लोकसभा में भाजपा के 240 सांसद हैं, लेकिन एनडीए के पक्ष में कुल 293 सांसद हैं। पिछली बार छोटे दलों के 5 सांसदों ने भी संविधान संशोधन बिल के समर्थन में मतदान किया था, लिहाजा एनडीए के 298 सांसद माने जा सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस के जिन 20 सांसदों ने बगावत कर पालाबदल किया था, उसके बाद अब वे ‘नेशनल सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) के सांसद हैं। त्रिपुरा और बंगाल की यह बौनी-सी, गुमनाम पार्टी पहले से ही एनडीए की घटक है, लिहाजा ‘ऑपरेशन दो-तिहाई’ के तहत इन 20 सांसदों को गिनते हुए एनडीए को 318 सांसदों का समर्थन हो जाता है। ‘असली शिवसेना’ (एकनाथ शिंदे वाली) ने उद्धव गुट में सेंध लगाई और ‘चाणक्य भाजपा’ की सहायता से 6 सांसदों को तोड़ कर पार्टी में शामिल भी कर लिया गया। नतीजतन एनडीए के 324 सांसद हो गए। अब ‘गिद्ध-दृष्टि’ तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी द्रमुक पर है। पार्टी अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन परिसीमन के साथ-साथ चुनाव आयोग के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के भी घोर विरोधी रहे हैं। तमिलनाडु में द्रमुक सत्ता के बाहर हो चुकी है। लोकसभा में उसके 22 सांसद हैं। गौरतलब यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में, तत्कालीन द्रमुक अध्यक्ष करुणानिधि की सहमति से, एनडीए और भारत सरकार में भाजपा-द्रमुक साथ-साथ रहे हैं। ऐसा कोई वैचारिक विभाजन नहीं है। दोनों के बीच कोई ‘लक्ष्मण-रेखा’ भी नहीं है। हालांकि द्रमुक के कुछ नेताओं ने ‘सनातन’ के लिए बेहद अभद्र, अश्लील, अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया था। राजनीति में ऐसे आचरण, दुव्र्यवहार अक्सर भुला दिए जाते हैं। यदि द्रमुक के 22 सांसद लोकसभा में संशोधन बिल को समर्थन देते हैं, तो एनडीए के पक्ष में 346 सांसद हो सकते हैं। शरद पवार की पार्टी के 8 सांसदों का समर्थन लगभग तय माना जा रहा है, लिहाजा सत्ता-पक्ष के 354 सांसद हो सकते हैं। यह कोई सामान्य संख्या नहीं है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ठीक ही कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी 2029 तक देश का ‘राजनीतिक नक्शा’ बदल देना चाहते हैं। चूंकि महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए देश में परिसीमन करना अनिवार्य है, लिहाजा नए बिल में ऐसा प्रावधान हो सकता है कि सभी राज्यों की 50 फीसदी लोकसभा सीटें बढ़ाई जाएंगी। परिसीमन उसी आधार पर किया जाएगा। इसमें किसी भी दल को क्या आपत्ति हो सकती है? विपक्ष की बात अलग है। बहरहाल भाजपा का ऑपरेशन तो कामयाब लगता है।

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