पिछले एक दशक में, भारत ने ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजारों सहित 9 व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। भारतीय कंपनियों को अब विकसित देशों के अधिकांश बाजारों तक पहुंच प्राप्त होगी। हालांकि, केवल प्रतिस्पर्धी व्यवसाय ही इस अवसर को निर्यात, रोजगार और आजीविका में परिवर्तित कर सकते हैं। भारतीय उद्यमों को डिजिटल रूप से सक्षम होना होगा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) का उपयोग करना होगा, वैश्विक मांग को समझना होगा, वैश्विक मानकों को पूरा करना होगा और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (जी.वी.सी.) पर कब्जा करने के लिए गुणवत्ता, लागत और समयबद्धता के मानकों को पूरा करना होगा। भारत में निर्यात संबंधी चर्चा आमतौर पर व्यापक स्तर पर होती है-विनिमय दरें, रसद, ऋण, बिजली, भूमि, श्रम और व्यापार समझौते। ये सभी महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना कंपनियां प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकतीं। नए व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एम.एस.एम.ई.) के लिए वैश्विक बाजारों में अधिक गहराई से एकीकृत होने का अवसर प्रदान करते हैं।

हालांकि, बाजार तक पहुंच और बाजार में प्रवेश एक ही बात नहीं है। निर्यात उद्यम स्तर पर होता है। छोटे व्यवसायों के लिए, सबसे बड़ी बाधा अक्सर केवल उत्पादन क्षमता ही नहीं होती, बल्कि मांग को समझने, वैश्विक खरीदारों के सामने विश्वसनीय दिखने और सीमाओं के पार निर्बाध रूप से लेन-देन करने की क्षमता भी होती है। एक फर्म को खरीदार ढूंढना होता है, विश्वास का संकेत देना होता है, मानकों को पूरा करना होता है, अपने उत्पादों की सही कीमत तय करनी होती है, विश्वसनीय आपूर्ति करनी होती है और बार-बार मांग पैदा करनी होती है। भारत की निर्यात रणनीति में यही कमी है। यदि भारत चाहता है कि एम.एस.एम.ई. वैश्विक विक्रेता बनें, तो निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को फर्म के भीतर विकसित करना होगा, न कि केवल उसके आसपास।

प्रतिस्पर्धात्मक लाभ का निर्धारण तेजी से डिजिटलीकरण द्वारा हो रहा है। विश्व स्तर पर, डिजिटल खरीदारों की संख्या 2024 में 2.7 अरब तक पहुंच गई और इसके लगातार बढऩे की उम्मीद है। इसी संदर्भ में, आई.सी.आर. की एक हालिया रिपोर्ट में पाया गया है कि बाजार में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए डिजिटल रूप से एकीकृत कंपनियां अब अनिवार्य हैं। गैर-एकीकृत कंपनियां उपभोक्ता व्यवहार और रुझानों को समझने में संघर्ष करती हैं। अधिकांश उद्यमों को संपूर्ण डिजिटल सिस्टम की नहीं, बल्कि डिजिटल परिपक्वता की ओर बढऩे के मार्ग की आवश्यकता होती है। डिजिटल तत्परता एक ऐसी यात्रा है जो ए.आई. से शुरू नहीं होती, बल्कि ऑनलाइन उपस्थिति से शुरू होती है, जिसके बाद डिजिटल भुगतान और बुकिंग, ग्राहक संबंध प्रबंधन, डाटा-आधारित मार्केटिंग, ए.आई. सक्षम पूर्वानुमान और फिर रणनीतिक मूल्य निर्धारण और वैयक्तिकरण शामिल होते हैं।

वैश्विक व्यापार में, विश्वास ही आधारभूत संरचना है। खरीदार को ऑर्डर देने से पहले गुणवत्ता, विश्वसनीयता और अनुपालन का आकलन करने में सक्षम होना चाहिए। विश्वास का संकेत देने के लिए, सत्यापित समीक्षाएं, पारदर्शी मूल्य निर्धारण, विश्वसनीय वितरण समय-सीमा, प्रमाणन, उत्पाद की ट्रेसेबिलिटी, पेशेवर कैटालॉग और त्वरित संचार महत्वपूर्ण हैं। पर्यटन क्षेत्र यह दर्शाता है कि सेवाओं में डिजिटल एक्सपीरियंस रणनीति कैसे कारगर हो सकती है। चूंकि अब अधिकांश यात्रा संबंधी बुकिंग ऑनलाइन की जाती है, इसलिए डिजिटल सक्षमता के प्रमुख कारक एक तेज, अधिक पारदर्शी और अधिक विश्वसनीय आरक्षण अनुभव प्रदान करते हैं। इससे उद्यमों के लिए डिजिटल तत्परता पहला कदम बन जाती है।-अमिताभ कांत व प्रतीक गोयल

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