अष्टानिका पर्व,इसे शाश्वत पर्व भी कहा जाता है यह एक तीर्थ यात्रा का पर्व है। यह पर्व जैन धर्म के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। आठ दिन का यह पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है, आषाढ़ (जून-जुलाई), कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) एवं फ़ाल्गुन माह (फरवरी-मार्च) में इस पर्व को मनाया जाता है। इस पर्व के दौरान कई जगहों पर जैन तीर्थों और मंदिरों में सिद्धचक्र विधान भी आयोजित किए जाते हैं। ऐसा ही एक तीर्थ मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में है। आगामी 21 जुलाई से शुरू होने वाले आठ दिवसीय अष्टान्हिका महापर्व के दौरान यहीं पर सभी प्रमुख धार्मिक विधान संपन्न होंगे, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपवास, पूजा व आत्म-साधना करेंगे।

नंदीश्वर द्वीप का है खास महत्व

वीरांगना रानी दुर्गावती की राजधानी गढ़ा की पर्वतमालाओं के बीच स्थित पिसनहारी मड़िया जैन तीर्थ का नंदीश्वर द्वीप अपनी भव्य शिल्पकला, अनूठे स्थापत्य और धार्मिक महत्व के कारण देशभर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। जैन समाज का दावा है कि बिना किसी आधार स्तंभ (पिलर) के निर्मित इतना विशाल नंदीश्वर द्वीप देश में अन्यत्र नहीं है।

आचार्यश्री के सान्निध्य में हुआ था पंचकल्याणक

पिसनहारी मढ़िया ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष सुबोध जैन ने बताया कि नंदीश्वर द्वीप के निर्माण का संकल्प वर्ष 1982 में जैन समाज के धर्मप्रेमी श्रेष्ठिजनों के सहयोग से लिया गया था। इसके बाद आचार्यश्री विद्यासागर के सान्निध्य में वर्ष 1992 में पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव का आयोजन हुआ। तभी से यह स्थल श्रमण संस्कृति, साधना और जैन आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

बिना पिलर का विशाल डोम है विशेष आकर्षण

नंदीश्वर द्वीप की सबसे बड़ी विशेषता इसका विशाल डोम है। सुबोध जैन के अनुसार ग्रेनाइट और सफेद संगमरमर से निर्मित इस डोम का दक्षेत्रफल करीब 12 हजार वर्ग फीट है। भूतल से शिखर कलश तक इसकी ऊंचाई 121 फीट है, जबकि मंदिर की सतह से डोम की ऊंचाई 65 फीट है। भवन के चारों ओर 32 सुंदर मंदरियां चार भव्य तोरण द्वार और बाहरी गलियारे में ग्रेनाइट के 63 खम्भे इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं।

132 जिनबिंब और पांच मेरू की रचना

जैन शास्त्रों के अनुसार नंदीश्वर द्वीप आठवां द्वीप माना गया है, जहां केवल बेव-वेवांगनाएं ही चैत्यालयों की वंचना करते हैं। इसी विव्य अवधारणा को पिसनहारी मढ़िया में मूर्त रूप दिया गया है। यहां संगमरमर की वेदियों पर काले, सफेद और लाल पर्वतों के स्वरूप में जिनालय बनाए गए हैं। चारों वेवियों के मध्य सुमेरु, विजय मेरू, मंदर मेरू अचल मेरू और विद्युतमाली मेफ सहित पांच मेरू पर्वत निर्मित हैं। प्रत्येक मेरू पर 16-16 जिन प्रतिमाएं स्थापित हैं और पूरे परिसर में कुल 132 जिनबिंब विराजमान हैं।

अष्टान्हिका पर्व और नंदीश्वर द्वीप का महत्व

मढ़ियाजी की ब्रह्मचारिणी बबली दीदी ने बताया कि जैन धर्म की मान्यता के अनुसार अष्टान्हिका पर्व के दौरान स्वर्ग के देव भी नंदीश्वर द्वीप जाकर अष्लान्हिका विधान और पूजा करते हैं। चूंकि मनुष्य वहां साक्षात नहीं जा सकते, इसलिए पिसनहारी मढ़िया में निर्मित इस कृत्रिम नंदीश्वर द्वीप में समाज के लोग एकत्रित होकर आठ दिनों तक उपवास, नियम और संयम का पालन करते हुए अष्टान्हिका पर्व के सभी धार्मिक विधान संपन्न करेंगे। सुबह-शाम होने वाली महाआरती, संगीतमय पूजन और संतों के प्रवचनों से मढ़िया जी क्षेत्र गुंजायमान रहेगा।

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