केवल सहमति की बाध्यता समाप्त होना पर्याप्त नहीं, राज्य के हित में धारा 49(6) का समाधान आवश्यक : वीरेन्द्र नामदेव
रायपुर-भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ, छत्तीसगढ़ प्रदेश ने कहा है कि मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 49(6) के संबंध में मध्यप्रदेश शासन की सहमति प्राप्त करने की बाध्यता समाप्त होने से पेंशनरों की एक बड़ी समस्या का समाधान हो गया है। अब पेंशन एवं महंगाई राहत संबंधी मामलों में अनावश्यक विलंब की स्थिति समाप्त होगी और पेंशनरों को राहत मिलने का मार्ग सुगम होगा।
महासंघ के प्रांताध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव ने कहा कि इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इससे पेंशनरों के हित प्रभावित होने वाली प्रशासनिक बाधा दूर हुई है। किन्तु इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि धारा 49(6) का मूल प्रावधान यथावत बना हुआ है, जिसके कारण छत्तीसगढ़ शासन पर वित्तीय भार और आर्थिक नुकसान की स्थिति बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था के अनुसार छत्तीसगढ़ शासन को मध्यप्रदेश के पेंशनरों के हिस्से की 26 प्रतिशत पेंशन देयता का भार वहन करना पड़ रहा है। परिणामस्वरूप राज्य को प्रतिवर्ष लगभग 2000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए सहमति की बाध्यता समाप्त होने से पेंशनरों की समस्या तो काफी हद तक दूर हो गई है, लेकिन राज्य सरकार की वित्तीय समस्या यथावत बनी हुई है।
श्री नामदेव ने कहा कि यह आर्थिक भार अंततः छत्तीसगढ़ के विकास, कर्मचारियों और पेंशनरों के कल्याण तथा अन्य जनहितकारी योजनाओं पर प्रभाव डालता है। यदि यह राशि राज्य के पास उपलब्ध रहे तो उसे प्रदेश के विकास और कर्मचारियों-पेंशनरों के हित में उपयोग किया जा सकता है।
महासंघ का मत है कि राज्य के हितों की पूर्ण सुरक्षा के लिए केवल प्रक्रिया संबंधी बाध्यता समाप्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धारा 49(6) के उस प्रावधान पर भी पुनर्विचार आवश्यक है जिसके कारण छत्तीसगढ़ को निरंतर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ ने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय से आग्रह किया है कि इस विषय पर केंद्र सरकार के समक्ष प्रभावी पहल करते हुए धारा 49(6) के स्थायी समाधान हेतु आवश्यक कार्रवाई की जाए, ताकि पेंशनरों के हितों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ राज्य के आर्थिक हितों की भी रक्षा सुनिश्चित हो सके।

