पाकिस्तान की राजनीति में सैन्य वर्चस्व ने वहां की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया है, आर्थिक सुधारों को बाधित किया है और कट्टरपंथी संगठनों के प्रति दोहरी नीति को जन्म दिया है। इसके कारण पाकिस्तान आज राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह स्थिति भारत के लिए अनेक रणनीतिक अवसर प्रस्तुत करती है।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में वहां की हुकूमत के खिलाफ प्रदर्शन की आवाज के बीच भारत का समर्थन देखा जा रहा है। वहीं, बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान को भारत से सीखने की नसीहत दे रहे हैं और खैबर पख्तूनख्वा में पश्तूनी नागरिक पाकिस्तान से ज्यादा भारत के करीब नजर आते हैं।

विरोध के मुखर होते स्वर

पाकिस्तान औपचारिक रूप से पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों को मिलाकर संघीय गणराज्य है। गिलगित-बाल्टिस्तान तथा पीओके अलग प्रशासनिक इकाइयां हैं। पिछले एक दशक में खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान तथा पीओके में राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मसलों को लेकर असंतोष लगातार बढ़ा है। पीओके तथा गिलगित-बाल्टिस्तान में उभरते राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक असंतोष भारत के लिए कूटनीतिक, रणनीतिक और वैचारिक स्तर पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करते हैं। भारत लंबे समय से इन क्षेत्रों को अपने अभिन्न अंग के रूप में मानता है। ऐसे में भारत को यहां की मौजूदा परिस्थितियों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तथ्यों और मानवाधिकार संबंधी चिंताओं के आधार पर प्रभावी ढंग से उठाने का प्रयास करना चाहिए।

भारत की लोकतांत्रिक साख को पाकिस्तान पर स्वाभाविक बढ़त हासिल है और यही भारत की असल ताकत भी है। लोकतांत्रिक संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका, नियमित चुनाव, स्थानीय स्वशासन और संवैधानिक अधिकार किसी भी क्षेत्र की स्थिरता और विकास के लिए अनिवार्य होते हैं। भारत का लोकतांत्रिक शासन मॉडल और विकास-आधारित दृष्टिकोण दुनिया के सामने है। पाकिस्तान में नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

भारत अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के सार्वभौमिक सिद्धांतों के संदर्भ में इसे पुरजोर तरीके से उठाने के साथ विकास, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और लोकतांत्रिक भागीदारी के क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर में हुए परिवर्तनों को वैश्विक समुदाय के समक्ष अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर दोनों ओर की प्रशासनिक व्यवस्थाओं की तुलना का एक वैकल्पिक विमर्श दुनिया के सामने ला सकता है।

भारत के लिए अवसर

भारत के लिए इस अवसर को कश्मीर को लेकर भ्रम फैलाने की पाकिस्तान की नीति की हकीकत को दुनिया के सामने लाने के एक बड़े मौके के रूप में देखा जाना चाहिए। गिलगित-बाल्टिस्तान का सामरिक महत्त्व भी है। यह क्षेत्र चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का प्रमुख प्रवेश मार्ग है। यह परियोजना उस क्षेत्र से होकर गुजरती है, जो भारत की जमीन है और चीन का वहां अवैध कब्जा है। भारत अपने प्रमुख साझेदार देशों के साथ आतंकवाद, सीमा-पार आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाकर अपनी रणनीतिक स्थिति को और सुदृढ़ कर सकता है।

भारत की नीति का आधार संयम, कूटनीतिक सक्रियता, राष्ट्रीय सुरक्षा की तैयारी और क्षेत्रीय स्थिरता होना चाहिए। पीओके में विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं और आकांक्षाएं मौजूद हैं। इसलिए भारत के लिए सबसे प्रभावी रणनीति यह होगी कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों, विकास, सुशासन और संवैधानिक व्यवस्था की अपनी उपलब्धियों को सशक्त रूप से प्रस्तुत करे तथा कूटनीतिक स्तर पर अपने दावों और हितों को तथ्य एवं अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप आगे बढ़ाए।

बलूचिस्तान में जारी असंतोष, मानवाधिकार संबंधी चिंताएं तथा राजनीतिक अस्थिरता भारत के लिए अपनी कूटनीतिक सक्रियता और वैश्विक विश्वसनीयता को मजबूत करने का अवसर प्रदान करती है। भारत लंबे समय से आतंकवाद के खात्मे, क्षेत्रीय स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करता रहा है। किसी भी बहु-जातीय और बहुभाषी समाज में दीर्घकालिक स्थिरता केवल सैन्य उपायों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों, न्यायपूर्ण प्रशासन और समावेशी विकास से सुनिश्चित होती है।

पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही से लोगों का उत्पीड़न हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र में बलूचिस्तान में गुमशुदगी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चिंता सामने आई है। भारत इन विषयों पर सिद्धांत आधारित और तथ्यपरक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपनी कूटनीतिक स्थिति स्पष्ट कर सकता है। इससे भारत की यह छवि मजबूत होगी कि वह मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्त्व देता है।

रणनीतिक तकाजा

बलूचिस्तान की अस्थिरता यह दर्शाती है कि केवल सैन्य दृष्टिकोण से जटिल राजनीतिक समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है। भारत इस अनुभव के आधार पर आतंकवाद के खिलाफ व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कट्टरपंथ के विरुद्ध साझा रणनीति और क्षेत्रीय स्थिरता की आवश्यकता पर बल दे सकता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सुरक्षा संबंधी चुनौतियां यह संकेत देती हैं कि बड़े अवसंरचनात्मक निवेश तभी सफल हो सकते हैं, जब स्थानीय समुदायों की भागीदारी और राजनीतिक स्वीकार्यता सुनिश्चित हो।

भारत अपने संपर्क और विकास संबंधी परियोजनाओं में स्थानीय भागीदारी, पारदर्शी शासन और साझेदारी-आधारित मॉडल को प्रमुखता देकर स्वयं को एक विश्वसनीय विकास साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। पाकिस्तान में दीर्घकालिक अस्थिरता का प्रभाव सीमा-पार सुरक्षा, आतंकवाद, शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग पर भी पड़ सकता है। इसलिए भारत के हित में यही होगा कि वह मजबूत सीमा सुरक्षा, प्रभावी कूटनीति, वैश्विक साझेदारियों और लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन के माध्यम से अपनी स्थिति को सुदृढ़ करे।

भारत के लिए कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां

भारत के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण सावधानियां भी आवश्यक हैं। खैबर पख्तूनख्वा में अस्थिरता से आतंकवादी संगठनों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं, जिनका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसलिए भारत को सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, खुफिया समन्वय तथा क्षेत्रीय कूटनीति को निरंतर मजबूत बनाए रखना होगा।

खैबर पख्तूनख्वा की जटिल परिस्थितियां, अफगानिस्तान के साथ इसके ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध तथा पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां भारत के लिए प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के साथ कूटनीतिक, रणनीतिक और क्षेत्रीय सहयोग के नए अवसर प्रस्तुत कर रही हैं। भारत की नीति परंपरागत रूप से क्षेत्रीय स्थिरता, आतंकवाद का विरोध और विकास में सहयोग पर केंद्रित रही है। इसलिए इन परिस्थितियों में वह अपनी रणनीति को और प्रभावी बना सकता है।

दीर्घकालिक दृष्टि से भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक बढ़त किसी पड़ोसी देश की आंतरिक कमजोरियों पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि अपनी राष्ट्रीय शक्ति के सभी आयामों को निरंतर सुदृढ़ करने में निहित है। मजबूत अर्थव्यवस्था, तेज विकास, तकनीकी नवाचार, रक्षा आधुनिकीकरण, कुशल कूटनीति और विश्वसनीय लोकतांत्रिक संस्थाएं भारत की वास्तविक रणनीतिक पूंजी हैं।

भारत जब अपनी आर्थिक क्षमता, सैन्य प्रतिरोध शक्ति, कूटनीतिक प्रभाव और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को समान गति से आगे बढ़ाएगा, तब वह केवल दक्षिण एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी अधिक प्रभावशाली और निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में होगा।

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