पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी तनाव के बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका के सामने घुटने टेकने के मूड में बिल्कुल नहीं है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक इंटरव्यू में बेहद आक्रामक लेकिन कूटनीतिक रुख अपनाते हुए कहा है कि ईरान अमेरिका के साथ युद्ध को तभी खत्म करेगा, जब युद्ध के मैदान में उसकी स्थिति मजबूत होगी और पलड़ा ईरान के पक्ष में होगा। सरकारी समाचार एजेंसी IRNA को दिए इंटरव्यू में उन्होंने स्पष्ट किया कि जंग में जीत सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सही समय पर सही फैसले लेने से मिलती है।
रणनीतिक बढ़त के बिना बातचीत मंजूर नहीं
ईरानी विदेश मंत्री के मुताबिक, किसी भी संकट के समय सबसे बड़ी परीक्षा यह तय करना होती है कि जंग को कब रोका जाए और बातचीत की मेज पर कब आया जाए। उन्होंने कहा:
युद्ध का अंत या तो पूर्ण सैन्य विजय से होता है या फिर बातचीत के जरिए। लेकिन कूटनीति के मंच पर बैठने का सही समय वही है, जब आपने मोर्चे पर एक भरोसेमंद और रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली हो।”
अराघची ने साफ किया कि देश की जनता की जान और मुल्क की तकदीर के साथ कोई जुआ नहीं खेला जा सकता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर फैसला पूरी तरह से सटीक और मुकम्मल गणना (Calculations) के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।
नुकसान के बावजूद वैश्विक महाशक्ति बनने का दावा
राजनीतिज्ञों की जिम्मेदारी का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि नेताओं को लगातार इस बात का आकलन करना पड़ता है कि युद्ध को आगे खींचने से फायदा होगा या फिर देश को और भारी इंसानी व आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा संघर्ष में कुछ नुकसान उठाने के बावजूद ईरान एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी (Decisive International Player) के रूप में उभरा है और उसने दुनिया के सामने अपनी व्यवस्था की ताकत को साबित किया है।
क्यों सुलग रहा है अमेरिका-ईरान तनाव?
ईरान और अमेरिका के बीच यह तल्खी नई नहीं है, लेकिन हालिया क्षेत्रीय समीकरणों ने इसे और हवा दे दी है:
परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध: साल 2018 में अमेरिका के परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकलने के बाद से दोनों देशों के रिश्ते रसातल में चले गए थे। ईरान पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, लेकिन उसने अपने परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार को कम नहीं किया।
प्रॉक्सी वॉर और क्षेत्रीय प्रभाव: यमन के हूती विद्रोही, लेबनान का हिजबुल्लाह और गाजा में हमास इन सभी गुटों को ईरान का खुला समर्थन हासिल है। अमेरिका का मानना है कि ईरान इन प्रॉक्सी संगठनों के जरिए पूरे मिडिल ईस्ट की स्थिरता को चुनौती दे रहा है।
बदलता ग्लोबल ऑर्डर: ईरान अब चीन और रूस के ब्लॉक में अपनी जगह मजबूत कर चुका है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) में शामिल होने के बाद ईरान को एक नई कूटनीतिक ताकत मिली है, जिसके दम पर वह अमेरिका की धमकियों का डटकर मुकाबला कर रहा है।
ईरान का यह ताजा बयान साफ संकेत देता है कि वह किसी भी तरह के दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करेगा, बल्कि अपनी शर्तों पर ही शांति की बात करेगा।

