राजनीतिक आंदोलनों ने अक्सर सरकारों की दिशा बदल दी है। कुछ आंदोलनों ने सत्ता को उखाड़ फैंका है, कुछ ने नीतियों में उलटफेर किया है और कुछ ने शक्तिशाली सरकारों को जनता के गुस्से को शांत करने के लिए मंत्रियों की बलि देने पर मजबूर किया है। यही कुछ इस सप्ताहांत नई दिल्ली में देखने को मिला। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक प्रशासनिक फेरबदल से कहीं अधिक है। यह 12 वर्षों में पहली बार है कि निरंतर जन आंदोलन, जिसे विपक्ष के लगातार दबाव से बल मिला, नरेंद्र मोदी सरकार में किसी कैबिनेट मंत्री के इस्तीफे का कारण बना।
जैसी कि उम्मीद थी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इस्तीफे को ‘भारत के युवाओं की जीत’ बताया। भाजपा ने इस व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि सरकार ने छात्रों के व्यापक हित में काम किया है। इन परस्पर विरोधी राजनीतिक बयानों के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है-क्या यह इस्तीफा एक अलग-थलग रियायत है, या इसने मोदी सरकार द्वारा एक दशक से सावधानीपूर्वक बनाए गए राजनीतिक अजेयता के आभास को परास्त कर दिया है? या इसने राहुल गांधी के नेतृत्व वाले हतोत्साहित विपक्ष को फिर से सक्रिय कर दिया है?
दिल्ली की भीषण गर्मी में, राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ प्रधानमंत्री आवास के बाहर पालथी मारकर धरने पर बैठे थे, जबकि जंतर-मंतर से, जो उनसे बस एक किलोमीटर दूर था, ‘प्रधान हटाओ’ के नारे गूंज रहे थे। हफ्तों से यही दृश्य दोहराया जा रहा था-कोचिंग सैंटर के छात्रों की भीड़ पर आंसू गैस के गोले दागे जा रहे थे, संसद के पास प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया जा रहा था और विपक्षी नेताओं का एक समूह बारी-बारी से माइक पर आकर नीट-यूजी पेपर लीक कांड को लेकर प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा था। शनिवार को यह मांग पूरी हुई। एक ऐसी सरकार के लिए जिसने 12 साल तक कभी पीछे न हटने की कला में महारत हासिल की थी, यह एक दुर्लभ और शर्मनाक कदम था। मनमोहन सिंह के नेतृत्व में, यू.पी.ए. के 10 साल के कार्यकाल में लगभग आधा दर्जन मंत्रियों ने इसी तरह के दबाव में इस्तीफा दिया था।
प्रधान का इस्तीफा एक अटूट सिलसिले को तोड़ता है और जिसे एक असामान्य तालमेल के माध्यम से हासिल किया गया-राहुल गांधी और कांग्रेस ने धरने और संसदीय व्यवधान का नेतृत्व किया, समाजवादी पार्टी से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक के क्षेत्रीय सहयोगियों ने उनका साथ दिया, शिक्षा कार्यकत्र्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिनों की भूख हड़ताल की और काक्रोच जनता पार्टी नामक एक युवा-संचालित विरोध आंदोलन ने उन छात्रों को लामबंद किया जिन्होंने पहले कभी पार्टी की राजनीति में भाग नहीं लिया था।
एक इस्तीफे से 12 वर्षों का चुनावी वर्चस्व खत्म नहीं हो जाता और सरकार का अपना तर्क इसके विपरीत एक अलग कहानी पेश करता है-प्रधान ने अपने शब्दों में ‘छात्रों के व्यापक हित में’ इस्तीफा दिया, न कि किसी अपराध को स्वीकार करते हुए। मोदी ने परीक्षा प्रणाली में किसी भी गहरी व्यवस्थागत विफलता को स्वीकार नहीं किया है। सी.बी.आई. की मौजूदा जांच, रद्द हुई परीक्षा और दोबारा परीक्षा, खबरों के शांत होने के बाद शायद सरकार की हार मानने की बजाय निर्णायक कदम के रूप में सामने आ सकती है। आलोचकों का कहना है कि भाजपा ने इससे कहीं बड़े विवादों का सामना बिना झुके किया है और एक इस्तीफा, चाहे वह कितना भी प्रतीकात्मक क्यों न हो, राष्ट्रीय विपक्ष को पुनर्जीवित करने का कमजोर आधार है। मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा की संगठनात्मक क्षमता, ज्यादातर मामलों में, काफी हद तक बरकरार है।
फिर भी, राजनीतिक विश्लेषक इस क्षण को मात्र प्रतीकात्मक नहीं मान रहे। राहुल गांधी के उस करियर में यह पहली ठोस जीत है, जो नारों से अधिक परिणामों से परिभाषित हुआ है। कांग्रेस रणनीतिकारों के लिए सबक यह है कि शिकायत की राजनीति, जब मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले किसी मुद्दे, जैसे धांधली वाली परीक्षा, छीना गया भविष्य, के साथ जोड़ दी जाए, तो यह अन्यथा प्रभावशाली भाजपा के खिलाफ निर्णायक साबित हो सकती है। क्या यह आगामी राज्य चुनावों में कारगर साबित होगी? अब असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। अखिलेश यादव और उनकी पत्नी ङ्क्षडपल पहले ही इन विरोध प्रदर्शनों में राहुल और प्रियंका के साथ खड़े हो चुके हैं और उन्होंने पहले के चुनाव प्रचारों के ‘यू.पी. के लड़के, यू.पी. की लड़कियां’ नारे को फिर से जीवित कर दिया है, जिनसे चुनाव में निराशाजनक परिणाम मिले थे। कांग्रेस के रणनीतिकार अब प्रधान के इस्तीफे को एक उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे-यह साबित करना कि सरकार को झुकाया जा सकता है और उन्हीं छात्र और मध्यमवर्गीय मतदाताओं को एकजुट करना, जो नीट घोटाले से खुद को ठगा महसूस कर रहे थे।
राजनीतिक सत्ता का क्षरण तब शुरू नहीं होता जब कोई मंत्री इस्तीफा देता है, बल्कि तब शुरू होता है, जब नागरिकों को पता चलता है कि सबसे शक्तिशाली सरकार भी जन दबाव के आगे झुकने को विवश हो सकती है। राहुल और उनके सहयोगी उस एक कठिन संघर्ष से मिली जीत को स्थायी राजनीतिक पूंजी में बदल पाते हैं या नहीं, खासकर उत्तर प्रदेश में, यह तय करेगा कि 25 जुलाई, 2026 को विपक्ष के अंतत: मजबूत होने के क्षण के रूप में याद किया जाएगा या भाजपा के निरंतर वर्चस्व के दौर में एक दुर्लभ अपवाद के रूप में।-प्रभु चावला

