विरोध करने का अधिकार किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। यह हमारे संविधान द्वारा संरक्षित एक अधिकार है और उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों से अर्जित किया गया है, जिन्होंने ऐसे भारत का सपना देखा था, जहां हर नागरिक खुलकर बोल सके और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल कर सके। इतिहास गवाह है कि शांतिपूर्ण विरोधों ने अन्याय को सुधारा है, लोकतंत्र को मजबूत किया है और बेजुबानों को आवाज दी है। लेकिन आज, कोई भी खुद से यह दर्दनाक सवाल पूछे बिना नहीं रह सकता-क्या विरोध प्रदर्शन अपने वास्तविक उद्देश्य को खोने लगे हैं? क्या राजनीतिक स्वार्थ इन विरोधों के आड़े आ रहे हैं? कई राज्यों में चुनाव नजदीक हैं, उम्मीद है कि यह हड़ताल विपक्ष के लिए कोई मंच नहीं बनेगी। केवल तमाशा बनाने के लिए अनुचित मांगें रखना और मूल कारण को भुलाकर फिर से इस मंच का उपयोग करना।

न्याय के लिए जो गरिमापूर्ण लड़ाई होनी चाहिए, वह अक्सर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन, गुस्से भरे टकराव, जाम सड़कों, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और पुलिस के साथ झड़पों में बदल जाती है। वास्तविक जन सरोकार राजनीतिक नारों, टैलीविजन कैमरों और सोशल मीडिया की लड़ाई के नीचे दबते जा रहे हैं। मुद्दा खुद पृष्ठभूमि में चला जाता है और अराजकता केंद्र में आ जाती है।

सबसे बड़े पीड़ित राजनेता नहीं, वे आम नागरिक और वे लोग होते हैं जो सिर्फ अपने मुद्दे के लिए वहां मौजूद होते हैं। यह वह चिंतित मां है जो अपने बच्चे को अस्पताल ले जाने की कोशिश कर रही है। यह वह छात्र है जो ऐसी परीक्षा के लिए यात्रा कर रहा है, जो जीवन भर के अवसरों को निर्धारित कर सकती है। यह वह दिहाड़ी मजदूर है जो पूरा दिन की कमाई खो देता है क्योंकि बसें चलना बंद हो जाती हैं या सड़कें जाम हो जाती हैं। यह वह दुकानदार है, जिसे अपना व्यवसाय बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, यह जाने बिना कि वह अपने बिलों का भुगतान कैसे करेगा। इन लोगों की विवाद में कोई भूमिका नहीं, फिर भी वे अक्सर सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं। हर जाम सड़क का मतलब है कि कोई अवसर चूक जाता है। हर देरी से पहुंचने वाली एम्बुलैंस जीवन को अधिक खतरे में डाल सकती है। हर बंद स्कूल बच्चे की शिक्षा में बाधा डालता है। हर व्यवसाय, जिसे बंद करने के लिए मजबूर किया जाता है, वह एक ऐसे परिवार को चोट पहुंचाता है, जो घर चलाने के लिए संघर्ष कर रहा है। क्या लोकतंत्र का यही इरादा था?

और भी अधिक परेशान करने वाली बात तब होती है जब शांतिपूर्ण विरोध हिंसा में बदल जाते हैं। पत्थर फैंके जाते हैं, बसें जलाई जाती हैं, दुकानें तोड़ी जाती हैं और सार्वजनिक संपत्ति नष्ट की जाती है। पुलिस को कठिन परिस्थितियों में डाल दिया जाता है, जिससे कभी-कभी लाठीचार्ज और टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। एक बार हिंसा शुरू हो जाने पर, हर कोई हार जाता है। मूल कारण अपनी विश्वसनीयता खो देता है, संवाद की जगह डर ले लेता है और राष्ट्र एकजुट होने की बजाय विभाजित हो जाता है। लोग अंतत: सार्वजनिक हित के नाम पर की गई तबाही की कीमत चुकाते हैं। भारत सिर्फ एक और राष्ट्र नहीं है। भारत एक सभ्यता है, जिसने हजारों वर्षों से दुनिया को शांति, सहिष्णुता, करुणा और आत्म-संयम के मूल्य सिखाए हैं।

यह भगवान बुद्ध, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और उन अनगिनत संतों की भूमि है, जिन्होंने माना कि स्थायी परिवर्तन सत्य, धैर्य और संवाद से आता है, नफरत या हिंसा से नहीं। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का हमारा दर्शन हमें याद दिलाता है कि दुनिया एक परिवार है। उस भावना को हमारे सार्वजनिक जीवन का मार्गदर्शन करना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है कि दोनों पक्ष तर्क के साथ प्रतिबद्ध हों। गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे गंभीर राष्ट्रीय बातचीत के हकदार हैं। उन पर संसद में बहस होनी चाहिए, विशेषज्ञों द्वारा चर्चा की जानी चाहिए, जहां आवश्यक हो अदालतों द्वारा जांच की जानी चाहिए और नागरिकों तथा सरकारों के बीच संवाद के माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिए। लोकतंत्र तब सबसे मजबूत होता है जब विचार टकराते हैं, न कि जब गुस्से टकराते हैं।

हर मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे विचार करें कि क्या यह निष्पक्ष, वैध, आर्थिक रूप से संभव है और व्यापक जनहित में है? समान रूप से, सरकारों को सार्वजनिक चिंताओं को ईमानदारी से सुनना चाहिए। लोगों को नजरअंदाज करना केवल निराशा को गहरा करता है। सम्मानजनक संवाद हमेशा चुप्पी से अधिक मजबूत होता है। राजनीतिक दलों की भी एक जिम्मेदारी है। हर सार्वजनिक मुद्दा राजनीतिक अंक बटोरने का अवसर नहीं बनना चाहिए। नागरिक ऐसे नेतृत्व के हकदार हैं जो भावनाओं को शांत करे, चर्चा को प्रोत्साहित करे और विभाजन को गहरा करने की बजाय समाधान खोजे। मीडिया को भी अपने प्रभाव को पहचानना चाहिए। हालांकि लोकतंत्र में रिपोर्टिंग आवश्यक है लेकिन सनसनीखेज खबरें कभी-कभी तनाव को भड़का सकती हैं।

सबसे ऊपर, हम में से प्रत्येक की नागरिकों के रूप में एक जिम्मेदारी है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हमारे कार्य किसी समस्या को हल करने में मदद करते हैं या केवल लाखों निर्दोष लोगों के लिए जीवन को कठिन बनाते हैं? लोकतंत्र हमें अधिकार देता है लेकिन यह जिम्मेदारी की भी अपेक्षा करता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी भी धमकी, हिंसा या व्यवधान का बहाना नहीं बननी चाहिए। विरोध की ताकत सड़कों के जाम होने या इससे होने वाली व्यवधान की मात्रा से नहीं मापी जाती। यह इसके तर्कों की ताकत, इसके प्रतिभागियों के अनुशासन और इसके उद्देश्य की नैतिक शक्ति से मापी जाती है।

आइए विरोध करने के पवित्र अधिकार की रक्षा करें लेकिन हम उन सभी निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की भी रक्षा करें, जो बस शांति से अपना दैनिक जीवन जीना चाहते हैं। आइए टकराव को बातचीत से, गुस्से को तर्क से और व्यवधान को संवाद से बदलें। भारत का भविष्य जोर-जोर के नारों या बड़ी भीड़ से नहीं बनेगा। यह विचारशील नागरिकों, जिम्मेदार नेताओं और उन संस्थानों द्वारा बनाया जाएगा, जो निष्पक्षता के साथ सुनते हैं। हमारा लोकतंत्र अंतहीन संघर्ष का थिएटर बनने के लिए बहुत कीमती है। हर विरोध उस गरिमा, शांति और बुद्धिमत्ता को प्रतिबिंबित करे, जो हमेशा से भारत की सबसे बड़ी ताकत रही है। तभी हमारी आवाजें वास्तव में बदलाव को प्रेरित करेंगी, न कि डर को।-देवी एम. चेरियन

Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
July 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
2728293031  
Exit mobile version