खेतों में रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से व्यापक खतरों को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की कई योजनाओं पर कार्य कर रही हैं। यह सच है कि रासायनिक उर्वरकों के बेजा इस्तेमाल से धरती की उर्वरा शक्ति घट रही है। इस तरह की खेती के उत्पादों से मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। नतीजतन, लघु एवं मध्यम वर्ग के किसान खेती से किनारा कर रहे हैं।
आमतौर पर जैविक और प्राकृतिक खेती एक ही मानी जाती है, लेकिन इनमें मूलतः गहरा भेद है। रासायनिक खेती कम लागत में अधिक पैदावार देती है, पर पर्यावरण के लिए बहुत हानिकारक है। यह बड़े किसानों और व्यावसायिक खेती करने वालों के लिए अधिक पैदावार देने के कारण लाभदायक मानी जाती है। इसलिए खेती का यह स्वरूप इस समय सर्वाधिक प्रचलन में है।
वहीं, जैविक खेती कहने को पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के अनुकूल है, मगर इसमें लागत बहुत अधिक है, इसलिए मध्यम और छोटे किसान इसे अपनाने से कतराते हैं। इसी तरह प्राकृतिक खेती सस्ती और बहुत कम लागत वाली है, मगर उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होने से किसानों का इस ओर झुकाव भी बहुत कम है।
प्राकृतिक खेती और जैविक खेती दोनों ही रसायन-मुक्त कृषि पद्धतियां हैं। मगर दोनों के सिद्धांतों और तौर-तरीकों पर बात की जाए, तो भारतीय दृष्टि से जैविक खेती दीर्घकाल के लिए अपनी अधिक लागत के कारण ही नहीं, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति और पशुधन-उत्पादों के अधिकतम दोहन के कारण हानिकारक भी है।
गुजरात के राज्यपाल पिछले कुछ समय से प्राकृतिक खेती पर महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। इस संबंध में किए गए उनके प्रयोग छोटे और मध्यम किसानों के लिए उपयोगी हैं। हरियाणा में कुरुक्षेत्र के गुरुकुल में उन्होंने 180 एकड़ जमीन पर कम लागत वाली प्राकृतिक खेती के कारगर प्रयोग किए हैं, जिसमें शून्य लागत में अधिकतम पोषक पैदावार की कल्पना को साकार किया गया है।
प्राकृतिक खेती की पद्धति इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वह प्रकृति से जुड़े सिद्धांतों का अनुसरण करती है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे जंगलों में बगैर किसी प्रयास के फल-फूलों की पैदावार होती है। स्वाभाविक है कि इससे मिट्टी की उर्वरा क्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता और पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों के लिए ऐसी खेती लाभकारी भी है।
जैविक खेती के भारत में अव्यावहारिक होने के कई कारण हैं, जिनमें खाद के लिए विदेशी केंचुओं का प्रयोग, यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों की बहुत अधिक लागत तथा भारतीय जलवायु में इसके दीर्घकालिक हानिकारक प्रभाव शामिल हैं। बीज खरीद से लेकर खाद, कीटनाशक और इनके छिड़काव की लागत जैविक खेती में इतनी अधिक आती है कि लघु एवं मध्यम किसान इसे चाहकर भी अपना नहीं सकते।
मसलन, जैविक खेती में गाय के गोबर की इतनी अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है कि छोटा और मध्यम किसान इसके लिए पशुओं की व्यवस्था नहीं कर सकता। इसी तरह इसमें प्रयुक्त विदेशी केंचुआ भूमि के जिस तापमान में जीवित रहने में सक्षम होता है, वैसा तापमान हमारे यहां प्रायः नहीं होता।
इसके अलावा जैविक खेती में प्रयुक्त विदेशी केंचुआ अपने शरीर में शीशा, पारा, आर्सेनिक, कैडमियम, निकल, क्रोमियम इत्यादि को धारण करता है और ये तत्त्व मिट्टी के जरिए पौधों तक पहुंच जाते हैं। जाहिर है, इससे उपजने वाली फसल का मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
इसके अलावा विदेशी केंचुआ मिट्टी नहीं खाता, बल्कि गोबर और काष्ठ ही खाता है। खेतों को दी जाने वाली खाद के रूप में गोबर का अधिकांश हिस्सा तो यही ग्रहण कर लेता है। इससे जैविक खेती में गोबर की मात्रा की जरूरत प्राकृतिक खेती की तुलना में बहुत अधिक होती है। लंबे समय तक इस तरह की खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति प्रायः कम हो जाती है। हिसार स्थित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और लुधियाना के पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के शोध बताते हैं कि जैविक खेती से भूमि को कितना नुकसान हुआ है।
दूसरी ओर, प्राकृतिक खेती में सब कुछ सहज उपलब्ध होता है। यह मूलतः देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल-बेसन और पेड़ों के नीचे पत्तों से पोषित मिट्टी पर आधारित होती है। कीटनाशकों को बनाने के लिए भी देसी साधनों की जरूरत पड़ती है, जिन्हें किसान अपने स्तर पर तैयार कर सकता है।
कीटनाशक प्रायः विशेष औषधीय पौधों के पत्तों, तंबाकू, लहसुन और लाल मिर्च इत्यादि के अर्क से तैयार किए जाते हैं। इन्हें तैयार करने में लागत और समय भी बहुत कम लगता है। इन कीटनाशकों से भूमि को कोई नुकसान नहीं होता है।
प्राकृतिक खेती में देसी केंचुए का इस्तेमाल होता है, जो जमीन की उर्वरता को ताकत देता है। देसी केंचुआ शून्य से 52 डिग्री तक के तापमान में काम कर सकता है। यानी देश की जलवायु के लिए यह सर्वथा अनुकूल है। इसके अलावा भी यह मौसम एवं पर्यावरण के बदलाव के अनुरूप जमीन में पंद्रह फुट तक ऊपर-नीचे आता-जाता रहता है। इस दौरान यह नीचे की परतों से पोषक तत्त्व लाकर पौधों को देता रहता है।
यह केंचुआ जब भूमि में सुराख करता है, तो उसकी दीवारों को ‘वर्मीवॉश’ से लीपता रहता है। इससे लंबे समय तक ये सुराख धरती में बने रहते हैं। अधिक वर्षा या सूखे की स्थिति में इससे पौधे मरते नहीं हैं। भूमि को निरंतर ऑक्सीजन मिलती रहती है।
प्राकृतिक खेती प्रकृति और स्थानीय संसाधनों पर निर्भर करती है। इससे मिट्टी में सूक्ष्मजीवों और केंचुओं को पुनर्जीवित करके पौधों के लिए उनसे पोषक तत्त्व तैयार करने में मदद ली जाती है। इसलिए इस खेती की लागत भी कम आती है।
जबकि, जैविक खेती में खाद और कीटनाशक बाहर से खरीदने पड़ते हैं। इसलिए इसकी लागत ज्यादा होती है और चाहकर भी छोटे और मध्यम किसान इसे अपना नहीं सकते।
जैविक खेती को रसायन-मुक्त कहकर प्रचारित किया जाता है, मगर मूलतः यह ब्रिटिश सरकार की देन है। एलबर्ट हावर्ड को जैविक खेती का जनक कहा जाता है। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ ब्रिटेन में सबसे पहले जैविक खेती संस्थान की स्थापना की थी, मगर वे जब 1930 में भारत आए, तो यहां की प्राकृतिक खेती को देखकर बहुत प्रभावित हुए और ब्रिटेन में उसका प्रचार किया।
बाद में ब्रिटिश कृषि वैज्ञानिक लॉर्ड नॉर्थबोर्न ने 1940 में लिखी अपनी पुस्तक ‘लुक टू द लैंड’ में ‘जैविक खेती’ शब्द गढ़ा। इसी से ब्रिटेन और पूरे विश्व में जैविक खेती आंदोलन प्रारंभ हुआ। भारत में भी इसका असर हुआ और हमने अपनी पारंपरिक कृषि पद्धतियों को छोड़कर, जलवायु के अनुकूल नहीं होते हुए भी, इसे अपना लिया।
एक समय में जब देश में खाद्यान्न संकट हुआ, तो उससे मुक्ति पाने के लिए एम. एस. स्वामीनाथन के प्रयासों से हरित क्रांति हुई। उस समय उनका किया कार्य समय के अनुकूल था। देश को भुखमरी से बचाना था। धरती भी तब बहुत अधिक उपजाऊ थी।
मगर अब जबकि देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया है, ऐसे समय में जब हमारे देश की जमीन की उर्वरा शक्ति तेजी से क्षीण हो रही है, तो यह जरूरी है कि प्राकृतिक खेती की ओर लौटा जाए। इस संबंध में जागरूकता के साथ ही किसानों को प्राकृतिक खेती करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

