आज जिसे गालियां कहा जा रहा है, वे गालियां हैं ही नहीं, गालियां तो भारतीय परम्परा में सहज स्वाभाविक स्वीकार्य रही हैं। मिथिला में राम विवाह के समय की परंपरागत गारियां अभी भी गाई जाती हैं। आज भी विवाह के समय गारी गीतों का विशेष महत्व है। जैसे विवाह गीतों में पंडित-पुरोहित ही निशाने पर रहते हैं लेकिन कोई बुरा नहीं मानता। इन गीतों का मुख्य स्वर उपहास का रहता है, कहीं-कहीं ये अश्लीलता की दहलीज पर भी पांव रखते दिखाई देती हैं लेकिन जिन परिस्थितियों और विवाह के जिस वातावरण में ये गीत गाए जाते हैं, वर्षों से भारतीय परंपरा में स्वीकार्य रहे हैं। कुछ उसी तरह की बिहार के कई क्षेत्रों में गाली सामान्य बातचीत में टेक की तरह आती है। लेकिन ये गालियां इतने सहज भाव से आती हैं कि देने वाले को आभास ही नहीं हो पाता कि वह गाली भी दे रहा है। खास बात यह कि इन गालियों में सैक्सुअल कंटैंट अंतॢनहित होते हैं, वे उच्चारण में नहीं आते, जैसे बिहार के कई हिस्सों में ‘मततोरी माय’ सहज भाव से कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में ‘बरगाही भाय’ बातचीत में आते रहते हैं। कोई इनके गूढ़ार्थ में नहीं जाता, उच्चारण में अश्लीलता नहीं दिखती तो कोई आपत्ति भी कभी नहीं होती।
हां, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मामला जब लड़ाई-झगड़ों का हो तो गालियों के भी तेवर बदल जाते हैं, खास कर झगड़ों के दौरान कुछेक समूहों में गालियों में नवाचार भी देखा जाता है। बावजूद इसके सच यही है कि गालियों में नवाचार हमारे आम स्वभाव में नहीं। वैसे भी अमूमन घरों में तो आज भी बच्चों को ‘साला’ बोलने तक की इजाजत नहीं मिलती। गालियां अमूमन दोस्तों के साथ सीखी जाती हैं और फिर दोस्तों के साथ यह थोड़ी रच-बस भी जाती हैं। आमतौर पर ङ्क्षहदी समाज में जो गालियां आज भी प्रचलित हैं, वे एक शब्द की होती हैं, अमूमन 5 अक्षर, जो उच्चारण के समय घटते-घटते 3 अक्षरों में, कभी कभी तो 2 अक्षरों में सिमट जाती हैं। शायद इसलिए कि कोशिश रहती है कि गालियां पहुंच भी जाएं और उन शब्दों के उच्चारण से बचे भी रहें। यहां गालियां शुरू होते ही खत्म हो जाती हैं।
इसके बरक्स जंतर-मंतर के पोस्टरों को देखें, जो प्रदर्शनकारी अपने हाथों में उठाए और सीने पर लगाए कैमरे के लिए प्रदॢशत कर रहे थे। उनमें कोई सीधी गाली तो कभी देखी ही नहीं जा सकी, जो भारतीय समाज में प्रचलन में है। अधिकांश पोस्टरों पर कुछ वैसा ही बना-लिखा दिख रहा था, जो पहले रेलगाडिय़ों और सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों पर देखने को मिलता था। विकृत वीभत्स सैक्स वर्णन को हम गाली की श्रेणी में रख ही नहीं सकते। प्रदर्शनकारी जिस विस्तार से और मजे लेकर ब्लो जाब और हैंड जाब को वॢणत कर रही थी, वह सैक्सुअल परवर्सन की अभिव्यक्ति ही कही जा सकती है। गालियां देते हुए कोई आनंदित नहीं होता लेकिन उन्हें परवर्टेड इसीलिए कहा जा सकता है कि वे अपने बारे में कहते हुए आनंदित हो रहे थे। और बाकी तो जो-जो प्रधानमंत्री से आह्वान किया जा रहा था, उसे किसी अखबार के पन्ने पर तो जगह ही नहीं मिल सकती। सब कुछ विद्रूप। क्या हजारों की भीड़ के सामने नंगे इशारे सहज हैं, मनोचिकित्सक बताएं फिर परवर्सन क्या है? क्या हम किसी को इजाजत देंगे कि किसी मॉल में नंगा खड़ा हो जाए।
कुछ ज्ञानी जन सवाल उठा रहे हैं कि लोगों को आपत्ति इसलिए हो रही है कि गालियां लड़कियों ने दीं। अजीब है समझ। कुछ वर्ष पहले एक फिल्म आई थी, ‘पाच्र्ड’। अपने कथित बोल्ड विषय और नग्नता के कारण काफी चर्चा में रही थी। उस फिल्म में आजादी की तलबगार 3 महिलाएं पहाड़ी की चोटी पर बैठ कर विचार करती हैं कि सारी गालियां महिलाओं को लेकर ही क्यों दी जाती हैं। वे तय करती हैं कि अब वे पुरुषों को लेकर गालियां देंगी। फिल्म देखे वर्षों बीत गए लेकिन मैं आज तक नहीं समझ सका कि इस बदलाव से गाली कैसे बदल गई? वास्तव में जैंडर मुक्त गाली जैसी बात इसी तरह की अनर्गल निरर्थक परिकल्पना है, जो मानसिक बीमारों के परवर्सन को संतुष्ट कर सकती है, बस। जो भी जंतर-मंतर पर देखा-सुना गया, उसे कौन-जी की भाषा, या क्रांति की भाषा, या गुस्से की अभिव्यक्ति कह कतई न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, न ठहराया जाना चाहिए। जो इसे कौन-जी की भाषा बोल रहे हैं, वास्तव में वे कौन-जी को जानते ही नहीं। यह मानसिक बीमारों की भाषा है, इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए।-विनोद अनुपम

