जयपुर: नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट ने पहली बार नियमित पैरोल मंजूर की है। सोमवार 3 अगस्त को हाईकोर्ट आसाराम की पैरोल मंजूर की लेकिन मंगलवार शाम तक वे जेल से बाहर नहीं आ सके। उनके वकील एडवोकेट यशपाल सिंह राजपुरोहित का कहना है कि उन्होंने जेल प्रशासन से संपर्क किया लेकिन जेल प्रशासन फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश का अध्ययन करने की बात कह रहा है।
क्या औपचारिकताएं बाकी रह गई?
कैदी आसाराम जोधपुर जेल में बंद हैं। हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने आसाराम की पैरोल मंजूर की थी। पैरोल के आदेश के बाद जेल प्रशासन तय शर्तों को ध्यान में रखते हुए पैरोल पर रिहा करता है लेकिन आसाराम के केस में ऐसा नहीं हुआ। जेल प्रशासन फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश का अध्ययन करने और विधि विशेषज्ञों की राय लेने की बात कह रहा है।
जेल प्रशासन ने दिया यह तर्क
सूत्रों के मुताबिक जेल प्रशासन का कहना है कि आसाराम के खिलाफ गुजरात में भी नाबालिग से दुष्कर्म का केस दर्ज हुआ था और उस केस में भी उसे आजीवन कारावास का सजायाफ्ता हैं। ऐसे में संबंधित राज्य से आवश्यक अनुमति और औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही उन्हें रिहा किया जा सकेगा।
आसाराम के वकील ने दिया यह तर्क
आसाराम के वकील एडवोकेट यशपाल सिंह राजपुरोहित का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि यदि किसी कैदी के खिलाफ अन्य राज्यों में मामले लंबित या सजा लंबित भी हो, तो एक राज्य की जेल में बंद रहने की स्थिति में पैरोल का अधिकार दिया जा सकता है। उनके अनुसार पैरोल एक कानूनी अधिकार है, जिसे केवल आशंकाओं के आधार पर रोका नहीं जा सकता।
आशंकाओं को कोर्ट ने किया खारिज
सरकारी वकील ने आसाराम की पैरोल का विरोध किया था। सरकारी वकील ने आशंका जताई कि पैरोल पर जेल से बाहर आकर कैदी गवाह को प्रभावित कर सकता है या फरार भी हो सकता है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पैरोल का विरोध करने के लिए प्रस्तुत की गई आशंकाओं का कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर नहीं है।
एडवोकेट यशपाल सिंह राजपुरोहित के तर्क पर अदालत ने यह भी माना कि आसाराम पिछले 13 साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं। इस दौरान उन्हें कई बार मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत मिली, लेकिन उन्होंने किसी गवाह को प्रभावित नहीं किया। न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने या कानून व्यवस्था को बाधित करने जैसी कोई गतिविधि भी नहीं की। ऐसे में पैरोल के अधिकार को नहीं छिना जा सकता।

