पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी के हालिया बयानों ने पाकिस्तान की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। मोहसिन नकवी, जो फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के करीबी माने जाते हैं और बहुत छोटी उम्र में ही उन्हें इंटीरियर मिनिस्ट्री मिल गई है, उन्होंने एक कॉन्फ्रैंस को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान का सिस्टम जर्जर हो गया है और पाकिस्तान के लोगों को सुविधाएं देने तथा युवाओं की आकांक्षाएं पूरी करने में नाकाम रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ बहुत मेहनत से काम करते हैं लेकिन अगर वह 18-18 घंटे भी काम करें तो भी पाकिस्तान का कुछ नहीं संवार सकते। इस बयान से उन्होंने पाकिस्तान में प्रशासनिक फेरबदल की ओर इशारा किया और यह भी कहा कि पाकिस्तान के 4 सूबों को बांटकर और प्रशासनिक ब्लॉक, जिन्हें सूबे या कुछ और नाम दें, बनाने की जरूरत है, ताकि ताकत निचले स्तर तक लोगों तक पहुंच सके। उन्होंने अपने बयानों में पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमैंट यानी सेना की बड़ी भूमिका का भी जिक्र किया।
इस कॉन्फ्रैंस के बाद जब पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता डी.जी.आई.एस.पी.आर. अहमद शरीफ चौधरी से नकवी के इन बयानों के बारे में सवाल किए गए, तो उन्होंने साधारण रूप से तो कहा कि वे राजनीतिक बयानों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते लेकिन फिर उन्होंने नकवी द्वारा जताए गए सभी विचारों का समर्थन किया और राजनीतिक नेतृत्व की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सुरक्षा को तब तक यकीनी नहीं बनाया जा सकता, जब तक प्रशासन अपना कार्यभार अच्छी तरह नहीं संभालता, जहां से यह स्पष्ट इशारा मिल गया कि पाकिस्तान की मिलिट्री एस्टैब्लिशमैंट, जिसके प्रमुख आज के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर हैं, वह अब अपनी ताकत को और बढ़ाना चाहते हैं और यह भी हो सकता है कि वह मिलिट्री के साथ-साथ राजनीतिक नेतृत्व भी खुद संभाल लें, जिसे एक तरह का तख्तापलट ही माना जा सकता है। पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमैंट के साथ जुड़े विभिन्न मीडिया संस्थान और अन्य प्रवक्ता भी इस बयान के बाद तुरंत सक्रिय हो गए हैं और उन्होंने राजनीतिक पाॢटयों के खिलाफ अपने-अपने विचार देने शुरू कर दिए हैं, जहां से लगता है कि आसिम मुनीर साहब अब रावलपिंडी से इस्लामाबाद तक का फासला तय करने का मन बना चुके हैं।
पाकिस्तान में यह पहली बार नहीं हो रहा कि किसी सैन्य जनरल ने सत्ता अपने हाथों में ली हो, लेकिन आज जो क्षेत्र के हालात बने हुए हैं उनके मद्देनजर आसिम मुनीर का इस तरह सत्ता हथियाने की ओर बढऩा बहुत मायने रखता है। एक तरफ अमरीका ईरान के साथ युद्ध में उलझा हुआ है, जिसमें पाकिस्तान अमरीका को फायदे पहुंचाकर अपना रास्ता साफ करना चाहता है। जिससे साफ है कि बहती गंगा में अब आसिम मुनीर भी हाथ धोना चाहते हैं, हालांकि पाकिस्तान की मिलिट्री पहले ही राजनीति को कंट्रोल करती है और अपनी मर्जी की पार्टियों को जिताना-हराना और सरकारें बनवाना एक आम बात है लेकिन अब प्रशासनिक फेरबदल के नाम पर आसिम मुनीर क्या करना चाहते हैं, यह भविष्य में देखने वाली बात होगी।
इससे पहले सैन्य तानाशाहों जनरल अयूब खान, जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ की सदर बनने की ख्वाहिश तो पूरी हुई, पर उसके बाद वे सत्ता पर काबिज नहीं रह सके। क्योंकि फील्ड मार्शल होने के नाते आज सेना की सारी ताकत आसिम मुनीर के हाथों में है लेकिन अगर वह राष्ट्रपति बन जाते हैं और सेना का कार्यभार किसी अन्य जनरल को सौंप देते हैं, तो क्या पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमैंट उनकी सदारत को ताकतवर रहने देगी या फिर वह अपने नए चीफ के आदेशों की ओर देखेगी? क्या आसिम मुनीर आर्मी चीफ और सदर दोनों ही पदों पर बने रह सकते हैं? अगर बात सूबों के पुनर्गठन की करें तो भारत और पाकिस्तान एक ही समय पर आजाद हुए। भारत में भाषा के आधार पर सूबे बनाने का पहले बहुत विरोध था लेकिन फिर सरकार ने यह अहसास किया कि भाषा के आधार पर सूबे बनाने से देश और मजबूत होगा, इसलिए भाषा के आधार पर कई सूबे बनाए गए और सूबों का पुनर्गठन समय-समय पर होता रहा। लेकिन पाकिस्तान में 1947 के समय 3 सूबे थे, चौथे बलूचिस्तान को सैन्य ताकत के जरिए धक्के से हथिया लिया गया और देश का चौथा सूबा बनाया गया। बीते 75 सालों में सूबों का किसी भी तरह का पुनर्गठन नहीं हुआ।
विभिन्न समय पर यह मांग उठती रही कि पाकिस्तानी पंजाब के दक्षिणी हिस्से, जिसे साऊथ पंजाब कहा जाता है, बहावलपुर का इलाका, जो कि विकास के पक्ष से बहुत पिछड़ा हुआ है, को उत्तरी पंजाब से अलग करके एक नया सूबा बना दिया जाए या जो सराइकी इलाका है उसे अलग सूबा बना दिया जाए। लेकिन क्या पंजाब की डोमिनैंट कम्युनिटी, जो कि पाकिस्तानी आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा है और पाकिस्तान में हर तरफ छाई हुई है, अपने राजनीतिक रुतबे में कमी स्वीकार करेगी?
इसी तरह सिंध में, जहां सिंधु देश की मांग बार-बार उठती रही है, क्या सिंधी लोग यह बर्दाश्त करेंगे कि उनके प्रमुख शहर कराची को सिंध से अलग कर दिया जाए? यह किस तरह की एडमिनिस्ट्रेटिव ऑर्गेनाइजेशन होगी? इसका खाका अभी जनता के सामने नहीं आया है। अगर बात बलूचिस्तान की करें तो वह बिल्कुल ही अलग है, बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ अलगाव का संघर्ष लगातार चल रहा है। खैबर पख्तूनख्वा के लोग, जो नस्ली रूप में पख्तून हैं, वे अपनी समानता अफगानिस्तान की पख्तून आबादी के साथ देखते हैं। अत: पाकिस्तान को क्या सिर्फ प्रशासनिक आधार पर ही ऑर्गेनाइज किया जाएगा, जिस तरह अंग्रेजों के जमाने में किया जाता था या पाक सरकार अपने देश के भाषाई, सांस्कृतिक और विकास के मानकों को ध्यान में रखते हुए अपने मुल्क को ऑर्गेनाइज करेगी? जो भी होने जा रहा है, इससे पाकिस्तान में एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल की संभावनाओं से लगता है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले मकबूजा कश्मीर में संवैधानिक बदलाव कराने के लिए एक बड़ी तंजीम चल रही है, जिस पर पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने बहुत अत्याचार किया है, गोली चलने से कई लोगों की मौत की खबर भी आ रही है।
क्या आसिम मुनीर राष्ट्रपति ट्रम्प से पाकिस्तान की मुकम्मल सत्ता हथियाने के लिए हरी झंडी ले चुके हैं? क्या वह ईरान पर हुए अमरीकी हमले से बने राजनीतिक हालात को अपने हक में इस्तेमाल कर सकते हैं? यह अब समय ही बताएगा लेकिन एक बात जरूर है कि आसिम मुनीर के हाथों में बेतहाशा सत्ता का आना इमरान खान के समर्थकों के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है। खैर, पाकिस्तान में उथल-पुथल दक्षिण एशिया के लिए कोई अच्छी खबर नहीं, क्योंकि दक्षिण एशिया के मुल्कों नेपाल, बंगलादेश और श्रीलंका में पहले ही राजनीतिक उथल-पुथल चल रही है और भारत में भी जेन-काी आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी की सत्ता पर पकड़ को कमजोर किया है। इस दौरान अगर पाकिस्तान में भी राजनीतिक उथल-पुथल होती है तो इसका असर पूरे साऊथ एशिया के क्षेत्र में पहुंच जाएगा।-मनिंदर सिंह गिल

