आज की बदलती वैश्विक भू-राजनीति में युद्ध केवल सीमाओं पर टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाते। इक्कीसवीं सदी का सबसे अमोघ हथियार ‘आर्थिक प्रतिबंध’, आयात शुल्क और आपूर्ति शृंखलाओं की नाकेबंदी बन चुका है। ऐसे अनिश्चित और अस्थिर दौर में किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना या विदेशी मुद्रा भंडार से अधिक इस बात से तय होती है कि वह संकट के समय अपने नागरिकों का पेट भरने में कितना आत्मनिर्भर है।
हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक कृषि व्यापार समझौते को लेकर सुगबुगाहट तेज हुई है, जिसके साथ ही किसानों का विरोध भी मुखर हो गया है। मुक्त व्यापार के पैरोकार इसे आर्थिक उदारीकरण का अगला चरण बता रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत, उत्पादन लागत और वैश्विक सामरिक उदाहरणों का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि कृषि को महज एक ‘व्यापारिक वस्तु’ मानना भारत के लिए एक आत्मघाती रणनीतिक भूल हो सकती है।
वर्तमान विरोध के संदर्भ को समझने के लिए साल 2026 के ऐतिहासिक वैश्विक व्यापार समझौतों पर गौर करना जरूरी है। इन समझौतों का कोई विरोध इसलिए नहीं हुआ कि भारत ने कृषि और डेयरी क्षेत्र को अपनी ‘रेड लाइन’ मानकर पूरी तरह सुरक्षित रखा था। जनवरी 2026 के ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ यानी भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते में यूरोप ने नब्बे फीसद भारतीय कृषि उत्पादों को शुल्क मुक्त कर दिया, लेकिन भारी दबाव के बावजूद भारत ने अपने डेयरी उत्पादों और मुख्य खाद्यान्नों को सुरक्षित रखा तथा अमेरिकी जीएम फसलों पर प्रतिबंध जारी रखा।
इसी तरह, फरवरी 2026 के भारत-अमेरिका समझौते ने भारत को तीस ट्रिलियन डॉलर के विशाल अमेरिकी बाजार तक तरजीही पहुंच दिलाई, लेकिन इसमें भी संवेदनशील कृषि क्षेत्र और डेयरी को बाहर रखा गया था। जुलाई 2026 के भारत-ब्रिटेन सीईटीए के तहत ब्रिटेन ने निन्यानबे फीसद भारतीय उत्पादों से शुल्क हटा लिया, लेकिन यहां भी भारत का कृषि और डेयरी क्षेत्र समझौते के दायरे से बाहर रहा। न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौते में भी भारत ने अपने मजबूत डेयरी उद्योग को पूरी तरह संरक्षित रखा और केवल अत्याधुनिक कृषि तकनीक के बदले कीवी और सेब जैसे फलों पर आंशिक छूट दी।
पूर्व के इन समझौतों पर कोई हंगामा नहीं हुआ, लेकिन भारत-अमेरिका के बीच संभावित ‘व्यापक कृषि व्यापार समझौते’ पर आशंका इसलिए है कि अब दबाव उन सीमा रेखाओं को पार करने का है। अमेरिका अपने जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों, मक्का, सोयाबीन, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को पूरी तरह खोलने का दबाव बना रहा है।
असमान ध्रुव
भारत और अमेरिका की कृषि पद्धति में जमीन-आसमान का अंतर है। अगर यह बाजार खुलता है, तो यह दो असमान व्यवस्थाओं के बीच का ऐसा मुकाबला होगा, जिसमें भारतीय किसानों का हारना तय है। भारत में छियासी फीसद किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है और वे मानसून, महंगे डीजल तथा सीमित पूंजी के सहारे खेती करते हैं। इसके विपरीत, अमेरिका में खेती एक कॉरपोरेट उद्योग है, जहां हजारों एकड़ के खेत, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन और जीपीएस आधारित मशीनों का उपयोग होता है।
दोनों देशों के बीच उत्पादकता का भारी अंतर है। उदाहरण के लिए मक्का, जो आज पोल्ट्री, एथेनॉल और खाद्य प्रसंस्करण की रीढ़ है, अमेरिका में एक एकड़ में एक सौ दस से एक सौ बीस क्विंटल पैदा होता है, जबकि भारत में यह औसत मात्र पंद्रह से बीस क्विंटल प्रति एकड़ है। इतनी कम प्रति इकाई लागत के साथ, अमेरिकी कॉरपोरेट आसानी से भारतीय बाजार में अपना सामान पेश कर सकता है, जिसके सामने दो एकड़ वाला भारतीय किसान कभी नहीं टिक पाएगा।
मुक्त व्यापार को लेकर एक भ्रम यह फैलाया जाता है कि अमेरिका में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी नहीं है और वहां किसान बाजार के भरोसे हैं। सच इसके बिल्कुल उलट है। भारत में किसान आज भी स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश (सी2 पचास फीसद) के आधार पर एमएसपी की कानूनी गारंटी मांग रहा है, जबकि सरकार ए2एफएल के आधार पर नीतियां तय करती है। वहीं, अमेरिका में किसानों को बचाने के लिए एक अभेद्य आय सुरक्षा चक्र है। ‘प्राइस लॉस कवरेज’ और ‘एग्रीकल्चर रिस्क कवरेज’ जैसे कार्यक्रमों के तहत बाजार मूल्य गिरने पर अमेरिकी सरकार किसानों को भारी सब्सिडी और सीधे नकद नुकसान की भरपाई करती है।
आयात से उपभोक्ताओं को सस्ता सामान मिलने का तर्क कृषि के संदर्भ में सबसे घातक है। शुरुआत में सस्ता अमेरिकी मक्का, सोयाबीन या खाद्य तेल बाजार में आएगा और प्रतिस्पर्धा न कर पाने के कारण भारतीय किसान घाटे में जाकर इन फसलों को उगाना बंद कर देंगे। कृषि कोई कारखाना नहीं है कि बटन दबाया और उत्पादन फिर शुरू हो गया। एक बार अगर किसान ने खाद्यान्न उगाना छोड़ दिया और देश का बीज चक्र, बुनियादी ढांचा और ज्ञान नष्ट हो गया, तो उसे दोबारा खड़ा करने में करीब तीस साल लग जाएंगे। स्थानीय उत्पादन खत्म होते ही विदेशी एकाधिकारवादी मनमानी कीमतें वसूलेंगे, जिससे न किसान बचेगा और न ही उपभोक्ता।
संवेदनशील पहलू
डेयरी और जीएम फसलों का संकट भी इस समझौते का एक बेहद संवेदनशील पहलू है। भारत का डेयरी क्षेत्र आठ करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों की आय का स्रोत है, जहां अधिकांश दूध उत्पादन दो-तीन पशुओं वाले छोटे किसानों द्वारा होता है। दूसरी ओर, अमेरिका में बड़े कॉरपोरेट डेयरी फार्म भारी सब्सिडी और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था के दम पर बेहद सस्ता दूध पाउडर बनाते हैं, जिनके आयात से भारतीय किसानों को दूध का सही दाम नहीं मिल सकेगा।
इसके साथ ही, अमेरिका लंबे समय से जीएम मक्का और जीएम सोयाबीन के लिए बाजार पहुंच की मांग कर रहा है। भारत अब तक खाद्य जीएम फसलों पर सतर्क रहा है, क्योंकि यह केवल व्यापार का नहीं, बल्कि जैव सुरक्षा, पर्यावरण, बीज संप्रभुता और उपभोक्ता विश्वास का प्रश्न है।
संरक्षण के समांतर
सरकार का दावा है कि इस व्यापार समझौते में भारतीय किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। सरकार के अनुसार, चाय, कॉफी, मसाले और नारियल जैसे कृषि उत्पादों को अमेरिकी बाजार में कम या ‘शून्य शुल्क’ का लाभ मिलेगा। भारतीय मसाले, बासमती चावल, बागवानी उत्पाद, प्रसंस्कृत खाद्य और जैविक उत्पादों की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है। अगर गुणवत्ता मानकों और ‘कोल्ड चेन’ को मजबूत किया जाए, तो भारतीय किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार से बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। भारत की अधिकांश व्यापार संधियों का अनुभव भी बताता है कि सरकार ने संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण देते हुए अन्य क्षेत्रों में बाजार खोलने की रणनीति अपनाई है।
अमेरिका के साथ वार्ता कहीं अधिक जटिल है, क्योंकि यहां कृषि सब्सिडी, डेयरी, जीएम फसलें, बाजार पहुंच और गैर-शुल्क बाधाएं एक साथ जुड़ी हुई हैं। अंतिम समझौते का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत किन उत्पादों पर शुल्क संरक्षण बनाए रखता है और किस प्रकार के सुरक्षा मानक तथा आयात कोटा लागू करता है। सरकार के सामने यह सबसे बड़ी परीक्षा है कि किसी भी समझौते का मूल्यांकन केवल आयात-निर्यात के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि इस कसौटी पर हो कि क्या इससे भारत का अन्नदाता मजबूत होगा, क्या भारतीय उपभोक्ता सुरक्षित रहेगा और क्या हमारी खाद्य संप्रभुता अक्षुण्ण रहेगी। अगर इसका उत्तर स्पष्ट नहीं है, तो अमेरिका के साथ किसी भी दबाव वाली कृषि सौदेबाजी से पीछे हटना ही हमारा राष्ट्रधर्म होगा।


