केन्द्र सरकार ने हाल ही में लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन बिल 2026 को संसद से पास करवा दिया, परंतु पेपर्स लीक के अलावा शिक्षा से जुड़े कुछ और अहम मुद्दे हैं जिनमें कोचिंग संस्थान, डमी स्कूल तथा डमी एडमिशन ने हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। वर्तमान स्कूल व्यवस्था को सुधारा जाना इस समय अति आवश्यक है। रैगुलर प्लस वन/प्लस टू की पढ़ाई के साथ ऑनलाइन कोचिंग लेना तो सही है, परंतु डमी एडमिशन लेकर कोचिंग करना स्कूली शिक्षा के उद्देश्य के विपरीत है। कोचिंग संस्थानों ने बच्चों को सिर्फ नीट, जेईई की मानकीकृत परीक्षा पास करने तक ही सीमित कर दिया है। जेईई और नीट के टैस्ट को पास करने के लिए बच्चों को भारी मानसिक दबाव से गुजरना पड़ता है, माता-पिता को कोचिंग के लिए कर्ज उठाना पड़ता है तथा पेपर लीक की घटनाएं भी इसी का हिस्सा हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना रह गया है जबकि विद्यालय के मूल उद्देश्य ज्ञान, संस्कार, व्यक्तित्व और सामाजिक विकास आदि हैं। हर चीज लाभ के लिए ही नहीं होती है, क्योंकि आज लोकतंत्र को मानवता की भी आवश्यकता है। हमारे समाज को अच्छे इंजीनियर और डाक्टर के अलावा देश को दिशा देने वाले भी चाहिएं। यही कारण है कि वर्तमान स्कूली व्यवस्था पर गंभीर नीति निर्धारण की आवश्यकता है।
दसवीं के बाद कौनसे विषय/संकाय चुनें, यह बहुत ही कठिन निर्णय होता है क्योंकि यही कैरियर की राह की पहली सीढ़ी होती है। विषय चुनने के लिए बच्चों से लेकर माता-पिता पसोपेश में रहते हैं। अंतत: बच्चे माता-पिता के सुझाए अनुसार या अपने शिक्षकों की सलाह पर या फिर दोस्तों की देखादेखी में विषय चुन लेते हैं। बच्चों के माता-पिता और बच्चे खुद विज्ञान संकाय को चुनना पसंद करते हैं। अगर वो विज्ञान संकाय को न चुनें तो ऐसा समझते हैं जैसे वो जीवन में असफल हो गए हैं। इंजीनियरिंग तथा डॉक्टरी पेशे के अलावा और भी कई क्षेत्र हैं, जिनमें जाने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि बच्चों तथा खुद उन पर जेईई और नीट की परीक्षा पास करने का मानसिक दबाव न रहे। कोचिंग संस्थानों को भी चाहिए कि कोचिंग में प्रवेश से पहले एक परीक्षा का आयोजन कर उन्हीं बच्चों को प्रवेश दें जो जेईई/नीट की परीक्षा पास करने की सामथ्र्य रखते हों। इससे उनका कोचिंग पर किया जाने वाला भारी भरकम खर्चा बच जाएगा, बच्चों पर मानसिक दबाव भी कम होगा और आत्महत्या करने जैसी वारदातें भी कम होंगी। परिस्थितियों का लाभ उठाकर कोचिंग सेंटर्स ही उन बच्चों को डमी एडमिशन दिला देते हैं। कोचिंग में पढऩे वाले 50 प्रतिशत बच्चों का स्कूलों में डमी एडमिशन होता है। यह बच्चे पूरा साल स्कूल नहीं जाते। डमी स्कूलों में से कुछ ही फिजिकली अस्तित्व में होते हैं, बाकी ऑन पेपर ही होते हैं। यह आज की बड़ी विडंबना है। इसलिए डमी एडमिशन व डमी संस्थान बंद होने चाहिएं।-सत्यपाल वशिष्ठ

