पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट को लेकर चल रही SIR की प्रक्रिया अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। मामला सिर्फ वोटर लिस्ट में नाम जुड़ने या हटने का नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों का है, जिनकी अपीलों पर अभी तक फैसला नहीं हो पाया है। मामलों की धीमी सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अब ट्रिब्यूनलों के कामकाज पर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की है कि SIR से जुड़े मामलों की सुनवाई जल्द की जाए। उनका कहना है कि कई जिलों में इतने ज्यादा मामले हैं कि मौजूदा ट्रिब्यूनल से समय पर फैसला होना मुश्किल है। इसलिए मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में और ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की गई है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है।
कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा पूरा ब्योरा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि अब तक ट्रिब्यूनलों ने कितने मामलों का निपटारा किया है। कोर्ट का कहना है कि पहले यह देखना जरूरी है कि ट्रिब्यूनल ने अब तक कितना काम किया है और कितने मामले अभी बाकी हैं। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इन ट्रिब्यूनलों को अदालत के आदेश के बाद बनाया गया था। इनका काम लोगों को सही प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का मौका देना है। इसलिए अब यह देखना जरूरी है कि ये ट्रिब्यूनल कितनी तेजी से काम कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर मामलों की संख्या और उन्हें निपटाने में लगने वाले समय को देखकर लगता है कि व्यवस्था धीमी है, तो फिर ट्रिब्यूनलों के पूरे सिस्टम को दोबारा देखने की जरूरत पड़ सकती है।
ऑनलाइन सिस्टम से बढ़ सकती है रफ्तार
सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि अगर ट्रिब्यूनल की सुनवाई और केस की स्थिति ऑनलाइन देखने की सुविधा हो, तो काम में तेजी लाई जा सकती है। इससे यह भी पता चल सकेगा कि किस ट्रिब्यूनल के पास कितने मामले हैं और कितने मामलों का फैसला हो चुका है।
दरअसल, पहले अदालत को बताया गया था कि SIR से जुड़े करीब 34 लाख मामले ट्रिब्यूनलों के सामने लंबित हैं। इसके मुकाबले अब तक बहुत कम मामलों का निपटारा हुआ है। इसी धीमी रफ्तार पर कोर्ट ने चिंता जताई।
‘ऐसे चला तो अगला चुनाव आ जाएगा’
सुप्रीम कोर्ट की सबसे ज्यादा चर्चा में आने वाली टिप्पणी इसी मामले से जुड़ी है। कोर्ट की चिंता साफ है कि अगर मामलों की सुनवाई इसी रफ्तार से चलती रही तो लोगों को अपने नाम और वोट देने के अधिकार को लेकर फैसला मिलने में बहुत लंबा समय लग सकता है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने नाम वोटर लिस्ट में जोड़े या हटाए गए। सवाल यह भी है कि जिस व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ गलत हुआ है, उसे अपनी बात रखने और समय पर फैसला पाने का मौका कब मिलेगा। अब चुनाव आयोग को अदालत के सामने ट्रिब्यूनलों के काम का पूरा आंकड़ा रखना है। इसके बाद यह साफ हो सकेगा कि इतने बड़े पैमाने पर लंबित मामलों को मौजूदा व्यवस्था से निपटाया जा सकता है या फिर और ट्रिब्यूनल बनाने और प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत पड़ेगी।
फिलहाल बंगाल SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट की नजर अब सिर्फ वोटर लिस्ट पर नहीं, बल्कि लाखों अपीलों की सुनवाई कितनी तेजी से हो रही है, इस पर भी है।

