भारत जहां लगातार दिन-प्रतिदिन हर क्षेत्र में तरक्की करता ही रहता है, चाहे वो शिक्षा क्षेत्र हो या स्वास्थ्य से जुड़ी हो. देश में लगातार हेल्थ सुविधाएं तो बढ़ती हैं, लेकिन इसका इलाज का खर्चा भी आसमान छूने लगता है. यानी जितना अच्छा इलाज उतना महंगा उसका बिल. हालांकि सरकारी अस्पतालों में ये परेशानी बहुत कम देखने को मिलती है, साथ ही सरकार भी कई सारी बीमारियों के लिए सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में इलाज भी करती है, लेकिन ज्यादातर लोग सरकारी अस्पतालों को छोड़कर प्राइवेट अस्पतालों में अपना इलाज करवाना पसंद करते हैं.
वे मानते हैं कि जितनी बड़ी बिल्डिंग होगी या फिर जितनी ज्यादा सुविधा मिलेगी उतना ही ज्यादा इलाज भी बेहतर होगा. हालांकि ये सोचना गलत भी नहीं है, क्योंकि हर आदमी बीमार में यही चाहता है कि उसका इलाज अच्छी जगह और अच्छी तरह से हो. लेकिन हाल ही में हुए एक सर्वे में सामने आया कि बड़ी संख्या में लोग प्राइवेट अस्पताल के बिल को लेकर और इलाज करने के तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं. लोगों का कहना है कि कई बार प्राइवेट अस्पतालों में ज्यादा पैसे लेने के लिए जरूरत से ज्यादा टेस्ट कराए जाते हैं और बिल में भी उसकी साफ जानकारी नहीं दी जाती है कि आखिर उनका टेस्ट किस चीज का हो रहा है. आइए जानते हैं कि क्या है ये पूरा मामला.
सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के खर्च में बड़ा अंतर
सरकारी सर्वे के आंकड़े भी यह साफ बताते हैं कि प्राइवेट अस्पतालों का खर्च सरकारी अस्पतालों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होता है. नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक एक ही बीमारी के इलाज पर सरकारी अस्पताल में औसतन 6,631 रुपए खर्च होते हैं, जबकि प्राइवेट अस्पताल में यह खर्च बढ़कर 50,508 रुपए तक पहुंच जाता है. यानी सामान्य इलाज भी सरकारी अस्पताल के मुकाबले प्राइवेट में 5 से 10 गुना महंगा पड़ता है. इसकी वजह है कि वे मरीज को डरा कर जरूरत से ज्यादा टेस्ट करवाते हैं ताकि मरीजों से ज्यादा पैसे लिए जा सके. लेकिन वहीं अगर बीमारी बड़ी हो तो मरीज पर और दबाव पड़ जाता है, जैसे कैंसर, दिल की बीमारी और किडनी जैसी गंभीर बीमारियों में तो प्राइवेट अस्पतालों का बिल लाखों रुपए तक पहुंच जाता है, जिससे आम आदमी और मिडिल क्लास आदमी के लिए इलाज करवाना मुश्किल हो जाता है.
क्यों नाराज हैं लोग, बिल में क्या है दिक्कत?
बात बस यहीं तक सीमित नहीं है, लोगों की सबसे बड़ी शिकायत ये भी है कि उन्हें इलाज करवाने के बाद मिलने वाली दवाइयों में भी कई सारी दवाइयां ऐसी होती हैं जिनकी असल में जरूरत भी नहीं होती है. साथ ही बिल में भी पूरी तरह से साफ-साफ जानकारी नहीं दी जाती है, केवल वही बातें लिखी जाती हैं जो अस्पताल मरीज को देना चाहता है, जिससे मरीज के परिवार समझ ही नहीं पाते कि इतने पैसे किस चीज पर मांगे जा रहे हैं. भारत में कम से कम 68% लोगों ने प्राइवेट अस्पतालों पर सवाल उठाते हुए यही कहा है कि कई बार तो बीमा होने के बावजूद अस्पताल पूरा क्लेम पास नहीं होने देते और मरीज को अपनी जेब से भी काफी पैसा भरना पड़ता है.

