इटली  की प्रधानमंत्री मेलोनी के लिए नेता प्रतिपक्ष के सामने जिस तरह से एक कांग्रेसी सदस्य ने अभद्र शब्द कहे, वह बेहद शर्मनाक है। यह महोदय भूल गए कि उनकी मां देश की राजधानी की कई बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी हैं। बहुत से कहने वाले यह कह रहे हैं कि पहले सुनंदा पुष्कर के लिए 50 लाख की गर्लफ्रैंड कहा गया। इंदिरा गांधी के लिए भी अपशब्दों की भरमार की गई। इसीलिए जो विवेकवान लोग हैं, उन्होंने इन सभी बातों का विरोध किया। आपको न दिखा हो, यह अलग बात है, क्योंकि इन दिनों के चश्मे सिर्फ वही बात देखने देते हैं, जो अपने पक्ष में हो। फिलहाल अपने देश में चलाए जा रहे नैरेटिव्स का यह हाल है कि या तो आप पक्ष में हैं या विपक्ष में। अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने के दिन लद चुके हैं। इसी को सच्चा लोकतंत्र भी  बताया जा रहा है। इसीलिए मेलोनी के प्रति कहे गए सैक्सिस्ट वाक्यों को भी सराहने और बचाव करने में न केवल पुरुष, बल्कि बहुत-सी महिलाएं भी दिखाई दे रही हैं। 

क्या यही वह स्त्री विमर्श है, जो दुनिया की स्त्रियों की एकता की बात और उनके अपमान  का विरोध करता है? क्या अब आपको पुरुष वर्चस्व दिखाई नहीं देता? यदि किसी स्त्री पर वश न चले, तो वही घिसा-पिटा हथियार इस्तेमाल में लाया जाता है, जहां उसे चरित्र के कोड़े से पीटा जाता है। माना जाता है कि स्त्री के चरित्र पर उंगली उठाते ही वह काबू में आ जाती है। इसका फैसला वे लोग करते हैं, जो कभी अपने गिरेबान में नहीं झांकते। आज स्त्रियों ने इन सब बातों को ठिकाने लगा दिया है। कानूनों ने भी उनकी मदद की है। लेकिन क्या वाकई? जो दल रात-दिन स्त्रियों का ठेका उठाए फिरते हैं, उनके आॢथक सशक्तिकरण और विकास की बात करते हैं, क्या यही उनकी सच्चाई है कि विरोधी से निपटने के लिए वे किसी विदेशी महिला नेता का इस तरह से अपमान करें? आप कौन होते हैं, इस तरह की बकवास करने वाले? आप साबित कर रहे हैं कि आपको मन ही मन सिर्फ इस देश की स्त्रियों से ही नहीं, विदेशी स्त्रियों से भी नफरत है। आप स्त्री को उसी शुचिता के कोड़े से पीटना चाहते हैं, जिसकी जगह खुद स्त्रियों ने खत्म कर दी है। आश्चर्य तो यह है कि मामूली बातों पर बोलने वाला महिला आयोग, स्त्रीवादी और अदालतें इस बारे में मौन हैं। 

यूं कहने को इटली, नेता प्रतिपक्ष का ननिहाल है। सोनिया गांधी वहीं की हैं। क्या वह भी इस तरह की ओछी मानसिकता का समर्थन करती हैं? स्त्रियां बड़े पदों पर हों, तो यह भाता क्यों नहीं? आपकी उंगली इसी बात पर क्यों उठती है कि न जाने क्या-क्या करके कोई स्त्री इस पद पर पहुंची होगी। यह तय करने वाले आप कौन हैं? एक स्त्री का अपना जीवन है, अपनी पसंद-नापसंद है, अपने करियर के चुनाव हैं। लेकिन जरा-सा खरोंचें, तो वही सोच निकल कर सामने आ जाती है कि अच्छा यह महिला बहुत इतरा रही है, अब बताते हैं इसे। और सारे अपमान करने वाले एक सुर में बोलने लगते हैं। आप शायद भूल गए हैं कि मेलोनी इटली की नेता हैं। वह एक मां भी हैं। इटली यूरोप का देश है। किसी से हाथ मिलाना या गले मिलना,  गाल से गाल मिलाना उनकी संस्कृति का हिस्सा है। आप उन्हें अपने नर्क में क्यों घसीट रहे हैं?

जब प्रधानमंत्री मोदी ने मेलोनी को ‘मैलोडी’ भेंट की थी, तब उनका एक संदेश देखा था, जिसमें वह कह रही थीं कि प्रधानमंत्री मोदी उन्हें अपनी बेटी कहते हैं। यह भी कहते हैं कि याद रखना तुम्हारा पिता भारत का है। क्या इन वाक्यों में कुछ भी अशोभनीय है? या कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान और स्नेह से भरा है। लेकिन आपको और आपके समर्थकों को इससे क्या, उन्हें तो वह एजैंडा चलाना है, जहां से सत्ता का शिखर कुछ नजदीक दिखता हो। सोचें कि कल आप भी सत्ता में हो सकते हैं। आपके खिलाफ अगर इस तरह का चरित्र हनन अभियान बिना किसी प्रमाण के चलाया जाए तो कैसा लगेगा। वैसे ही यूरोप और अमरीका में भारत के बारे में माना जाता है कि यहां के लोग बहुत पिछड़े विचारों के हैं। आप लोग इसे साबित भी कर रहे हैं। अपने देश की छवि कितनी नकारात्मक रूप में जा रही है, इसकी भी कोई ङ्क्षचता नहीं है। जिस ब्रज प्रदेश से आती हूं, वहां एक कहावत कही जाती है-बुड्ढा मरे या जवान, मोय हत्या ते काम। यानी कि कुछ भी हो, मेरा स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए। 

कल को मेलोनी के समर्थक आप पर मुकद्दमा कर दें, तो क्या करिएगा? और कुछ हो न हो, अंतर्राष्ट्रीय बेइज्जती तो जरूर होगी। इसमें आपका ही नहीं, इस देश का नाम भी बदनाम होगा। पर समझा शायद यह जा रहा है कि बदनाम हुए तो क्या, नाम तो होगा। मेलोनी का बड़प्पन है कि अभी तक उन्होंने इस तरह के नीच अभियान पर रिएक्ट नहीं किया है। लेकिन अपने देश में बहुत से स्त्री-पुरुष सोशल मीडिया पर इन बातों की ङ्क्षनदा कर रहे हैं। यह एक शुरुआत भर है।-क्षमा शर्मा

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